भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१२ नारदीयपुराणम् यद्भूतं यच्च वै भव्यं स्थावरं जङ्गमं जगत् । दशाङ्गुलं योऽत्यतिष्ठत्तमेशमजरं भजे ॥५३॥ अणोरणीयांसमजं महतश्च महत्तरम् । गुह्याद्गुह्यतमं देवं प्रणमामि पुनः पुनः ॥५४॥ ध्यातः स्मृतः पूजितो वा श्रुतः प्रणमितोऽपि वा । स्वपदं यो ददातीशस्तं वन्दे पुरुषोत्तमम् ॥५५॥ इति स्तुवन्तं परमं परेशं हर्षाश्रुसंरुद्धविलोचनास्ते । मुनीश्वरा नारदसंयुतास्तु सनन्दनाद्याः प्रमुदं प्रजग्मुः ॥५६॥ य इदं प्रातरुत्थाय पठेद् वै पौरुषं स्तवम् । सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥५७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सनत्कुमारनारदसंवादे नारदकृतविष्णुस्तुतिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

तृतीयोऽध्यायः नारद उवाच कथं ससर्ज ब्रह्मादीनादिदेवः पुरा विभुः । तन्ममाख्याहि सनक सर्वज्ञोऽसि यतो भवान् ॥१॥ श्रीसनक उवाच नारायणोऽक्षरोऽनन्तः सर्वव्यापी निरञ्जनः । तेनेदमखिलं व्याप्तं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥२॥ आदिसर्गे महाविष्णुः स्वप्रकाशो जगन्मयः । गुणभेदमधिष्ठाय मूर्त्तित्रिकमवासृजत् ॥३॥

की वन्दना करता हूँ। जो भूत, भविष्य, स्थावर तथा जंगम रूप जगत् को दश अंगुल के परिमाण में व्याप्त करके रहता है उस वृद्धावस्था रहित प्रभु को प्रणाम करता हूँ। अणु से भी अणु (अत्यन्त सूक्ष्म) महान् से भी महान्, गुहा से भी गुह्यतम (अत्यन्त गूढ़) देव को पुनः प्रणाम करता हूँ। जो व्यक्ति उनका स्मरण, ध्यान, पूजा, नाम- श्रवण और प्रणाम करता है उसको वे ईश अपना लोक दे देते हैं, ऐसे पुरुषोत्तम ईश की वन्दना करता हूँ। मुनिगण ! इस प्रकार नारद सहित सनक, सनन्दन आदि मुनि परेश परम ब्रह्म की स्तुति करते हुए आनन्द मग्न हो गये। उनके नेत्रों से, आनन्दाश्रु बहने लगे। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इस वैष्णव स्तोत्र का पाठ करता है, वह सब पापों के मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है ॥५२-५७॥ श्रीनारदीयपुराण में सनत्कुमार और नारद के संवाद-प्रकरण में नारद कृत विष्णु स्तुति नामक दूसरा अध्याय समाप्त ॥२॥

अध्याय ३ भूगोल-वर्णन नारद बोले—सनक जी ! सृष्टि के आदि में विभु आदि देव ने किस प्रकार ब्रह्मा आदि को उत्पन्न किया, यह मुझे बतलाइये; क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥१॥ श्री सनक बोले—भगवान् नारायण अव्यय, अनन्त, सर्व व्यापक और निरंजन हैं, वे इस अखिल स्थावर जंगमात्मक जगत् में व्याप्त हैं ॥२॥ सृष्टि के आदि में जगन्मय, स्वप्रकाश, महाविष्णु ने तीनों गुणों को विभक्त किया