भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः १३ सृष्ट्यर्थं तु पुरा देवो दक्षिणाङ्गात्प्रजापतिम् । मध्ये रुद्राख्यमीशानं जगदन्तकरं मुने ॥४॥ पालनायास्य जगतो वामाङ्गाद्विष्णुमव्ययम् । तमादिदेवमजरं केचिदाहुः शिवाभिधम् । केचिद्विष्णुं सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदूचिरे ॥५॥ तस्य शक्तिः परा विष्णोर्जगत्कार्यप्रवर्तिनी । भावाभावस्वरूपा सा विद्याविद्येति गीयते ॥६॥ यदा विश्वं महाविष्णोर्भिन्नत्वेन प्रतीयते । तदा ह्यविद्या संसिद्धा भवेद्दुःखस्य साधनम् ॥७॥ ज्ञातृज्ञेयाद्युपाधिस्ते यदा नश्यति नारद । सर्वैकभावनाबुद्धिः सा विद्येत्यभिधीयते ॥८॥ एवं माया महाविष्णोभिन्ना संसारदायिनी । अभेदबुद्ध्या दृष्टा चेत्संसारक्षयकारिणी ॥६॥ विष्णुशक्तिसमुद्भूतमेतत्सर्वं चराचरम् । यस्माद्भिन्नमिदं सर्वं यच्चेङ्गेयच्च नेङ्गति ॥१०॥ उपाधिभिर्यथाकाशो भिन्नत्वेन प्रतीयते । अविद्योपाधियोगेन तथेदमखिलं जगत् ॥११॥ यथा हरिर्जगद्व्यापी तस्य शक्तिस्तथा मुने । दाहशक्तिर्यथांगारे स्वाश्रयं व्याप्य तिष्ठति ॥१२॥ उमेति केचिदाहुस्तां शक्तिं लक्ष्मीं तथा परे । भारतीत्यपरे चैनां गिरिजैत्यम्बिकेति च ॥१३॥ दुर्गेति भद्रकालीति चण्डी माहेश्वरीत्यपि । कौमारी वैष्णवी चेति वाराह्यैन्द्री च शाम्भवी ॥१४॥ ब्राह्मीति विद्याविद्येति मायेति च तथा परे । प्रकृतिश्च परा चेति वदन्ति परमर्षयः ॥१५॥ और उन गुणों के ही आधार पर त्रिमूर्ति की सृष्टि की । आदि देव ने सबसे पहले सृष्टिकार्य सम्पन्न करने के लिए अपने दाहिने अंग से प्रजापति ब्रह्मा को उत्पन्न किया । मुने ! मध्य भाग से जगत् के संहार करने वाले ईशान रुद्र को और वाम भाग से इस जगत् का पालन करने के लिए विष्णु को उत्पन्न किया । उस अजर आदि देव को कुछ लोग शिव कहते हैं, कुछ उनको विष्णु और कुछ सदा सत्य स्वरूप ब्रह्मा कहा करते हैं। उस विष्णु की जगत् रूप कार्यकर्त्री पराशक्ति है, जो भावाभाव स्वरूप और विद्या एवं अविद्या रूप कही जाती है। जब विश्व महाविष्णु से भिन्न प्रतीत होता है उस समय अविद्या का अधिकार या सिद्धि समझनी चाहिये । उस समय दुःखों के साधन (मार्ग) प्रस्तुत हो जाते हैं। नारद ! जिस समय तुम्हारी ज्ञाता, ज्ञेय आदि उपाधि (भिन्नता या विशेषता) से सम्बद्ध बुद्धि नष्ट हो जाती है (अर्थात् त्वम् अहम् आदि की भावना दूर होकर अद्वैत भावना हो जाती है) और सब पदार्थों में समभाव या एकभाव हो जाता है उस समय की बुद्धि (या ज्ञान) विद्या कहलाती है । । ३-८। इस प्रकार महाविष्णु की माया भिन्न रूप से देखी जाने पर संसार में ढकेलती है और अभेद की तरह देखी जाने पर संसार का क्षय कर देती है । अर्थात् भेद बुद्धि से ईश्वर की उपासना करने पर संसार में आना पड़ता है और अभेद बुद्धि से की गई उपासना मोक्ष प्रदान करती है । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् विष्णु-शक्ति से उत्पन्न हुआ है । जिससे यह सम्पूर्ण जगत् भिन्न है, जो यह सब है और जो तुम्हें प्रतीत हो रहा है । जैसे (घट, पट आदि) उपाधियों के कारण (एक ही) आकाश विभिन्न रूपों में दिखाई पड़ता है उसी तरह अविद्या रूप उपाधि के सम्बन्ध से यह सम्पूर्ण जगत् भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है । मुनि नारद ! जिस प्रकार हरि जगत्-व्यापक हैं उसी प्रकार उनकी शक्ति भी विश्वव्यापक है। जिस प्रकार अंगारों की दाह शक्ति (जलाने की शक्ति) अपने आश्रय (अंगार में) को व्याप्त करके (अर्थात् अंगार के अणु-अणु में) विद्यमान रहती है उसी प्रकार हरि तथा उसकी शक्ति भी जगत् में व्याप्त रहती है । कोई उसको उमा, कोई शक्ति, कोई लक्ष्मी, कोई भारती और कोई गिरिजा कोई अम्बिका, कोई दुर्गा, भद्रकाली, चण्डी और महेश्वरी नाम से पुकारते हैं । कुछ लोग उसी शक्ति को कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐन्द्री, शाम्भवी, ब्राह्मी, विद्या और अविद्या भी कहते हैं और दूसरी कोटि के लोग इसको माया कहते हैं ॥६-१४॥ परम ऋषिगण इसी को

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