भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

१४ नारदीयपुराणम् शेषशक्तिः परा विष्णोर्जगत्सर्गादिकारिणी । व्यक्ताव्यक्तस्वरूपेण जगद्व्याप्य व्यवस्थिता ॥१६॥ प्रकृतिश्च पुमांश्चैव कालश्चेति विधिस्थितः । सृष्टिस्थितिविनाशानामेकः कारणतां गतः ॥१७॥ येनेदमखिलं जातं ब्रह्मरूपधरेण वै । तस्मात्परतरो देवो नित्य इत्यभिधीयते ॥१८॥ रक्षां करोति यो देवो नित्य इत्यभिधीयते ॥१९a॥ रक्षां करोति यो देवो जगतां परतः पुमान् । तस्मात्परतरं यत्तदव्ययं परमं पदम् ॥२०॥ ॥१९b॥ अक्षरो निर्गुणः शुद्धः परिपूर्णः सनातनः । यः परः कालरूपाख्यो योगिध्येयः परात्परः ॥२१॥ परमात्मा परानन्दः सर्वोपाधिविवर्जितः । ज्ञानैकवेद्यः परमः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥२२॥ योऽसौ शुद्धोऽपि परमो ह्यहंकारेण संयुतः । देहीति प्रोच्यते मूढैरहोऽज्ञानविडम्बनम् ॥२३॥ स देवः परमः शुद्धः सत्त्वादिगुणभेदतः । मूर्तित्रयं समापन्नः सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ॥२४॥ योऽसो ब्रह्मा जगत्कर्ता यन्नाभिकमलोद्भवः । स एवानन्दरूपात्मा तस्मान्नास्त्यपरो मुने ॥२५॥ अन्तर्यामी जगद्व्यापी सर्वसाक्षी निरञ्जनः । भिन्नाभिन्नस्वरूपेण स्थितो वै परमेश्वरः ॥२६॥ यस्य शक्तिर्महामाया जगद्विलम्भधारिणी । विश्वोत्पत्तेर्निदानत्वात्प्रकृतिः प्रोच्यते बुधैः ॥२७॥ आदिसर्गे महाविष्णुर्लोकान्कर्त्तुं समुद्यतः । प्रकृतिः पुरुषश्चेति कालश्चेति त्रिधा भवेत् ॥२८॥ पश्यन्ति भावितात्मानो यं ब्रह्मेत्यभिसंज्ञितम् । शुद्धं यत्परमं धाम तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२९॥ एवं शुद्धोऽक्षरोऽनन्तः कालरूपी महेश्वरः । गुणरूपी गुणाधारो जगतामादिकृद्विभुः ॥३०॥


प्रकृति और परा भी कहते हैं । विष्णु की परा शेष शक्ति जगत् की सृष्टि आदि का कारण है जो कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस सृष्टि में व्याप्त होकर रहती है । प्रकृति, पुरुष, काल और विधि स्थिति इनमें एक ही विश्व की सृष्टि, स्थिति और विनाश का कारण माना जाता है । जिस ब्रह्मा रूपधारी आदि पुरुष से यह अखिल लोक उत्पन्न हुआ है उससे पर देव नित्य कहे जाते हैं, जो देव रक्षा करते हैं वे भी नित्य कहे जाते हैं। जो देव जगत् की रक्षा करते हैं वे पुरुष पर हैं और उससे भी परतर जो हैं वे परमपद अव्यय कहे जाते हैं। जो योगियों के एक- मात्र ध्येय कालरूप नामक परात् पर पुरुष है, वह अक्षर, निर्गुण, शुद्ध, परिपूर्ण, सनातन, परमात्मा, परानन्द, और सब उपाधियों से रहित है ॥१५-२१॥ वह ज्ञान से ही एकमात्र जानने योग्य परम और सच्चिदानन्द स्वरूप है। जो मूढ़ शुद्ध परम देव को 'अहंकार से युक्त देही' इस नाम से पुकारते हैं उनका यह ज्ञान एकमात्र विडम्बना है और आश्चर्य है उनके इस थोथे ज्ञान पर । वह परम शुद्ध देव सत्व, रज और तम भेद से तीन रूपों में अपने को विभक्त कर देता है और इस प्रकार पृथक्-पृथक् एक-एक रूप से सृष्टि, स्थिति और प्रलय करता है । जगत् के कर्त्ता ब्रह्मा जिसके नाभि कमल से उत्पन्न हुए हैं वही आनन्द रूप परमात्मा है । मुनि ! उससे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है ॥२२-२५॥ वह परमेश्वर अन्तर्यामी, जगद्व्यापक, सबका साक्षी, निरंजन और भिन्न-भिन्न रूपों से स्थित रहता है उसकी शक्ति महामाया संसार को निश्चित रूप से धारण किये रहती है । बुधगण उसको संसार की उत्पत्ति का आदि कारण होने के कारण 'प्रकृति' कहा करते हैं ।२६-२७। सृष्टि के आदि में जब महाविष्णु लोक-सृष्टि करने को उद्यत होते हैं, तब वे प्रकृति, पुरुष और काल इन तीन रूपों में विभक्त हो जाते हैं । योगीजन जिस ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध शुद्ध परमधाम को देखते हैं या जानते हैं वही विष्णु का परम पद है। इस प्रकार शुद्ध, अक्षर, अनन्त, कालरूपी महेश्वर, विभु, गुणरूपी, गुणों के आधार और लोकों के भादि कर्त्ता हैं। जब पुरुष नामक