भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 29

१० नारदीयपुराणम् यन्नामसंकीर्त्तनतो गजेन्द्रो ग्राहोग्रबन्धन्मुमुचे स देवः । विराजमानः स्वपदे पराख्ये तं विष्णुमाद्यं शरणं प्रपद्ये ॥२७॥ शिवस्वरूपो शिवमक्तिभाजां यो विष्णुरूपी हरिभावितानाम् । संकल्पपूर्वात्मकदेहहेतुस्तमेव नित्यं शरणं प्रपद्ये ॥२८॥ यः केशहन्ता नरकान्तकश्च बालो भुजाग्रेण दधार गोत्रम् । देवं च भूभारविनोदशीलं तं वासुदेवं सततं नतोऽस्मि ॥२६॥ लेभेऽवतीर्याग्रनृसिंहरूपी यो दैत्यवक्षः कठिनं शिलावत् । विदार्य संरक्षितवान्स्वभक्तं प्रह्लादमीशं तमजं नमामि ॥३०॥ व्योमादिभिर्भूतमात्मसंज्ञं निरञ्जनं नित्यममेयतत्त्वम् । जगद्विधातारमकर्मकं च परं पुराणं पुरुषं नतोऽस्मि ॥३१॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रानिलवायुमर्त्यगन्धर्वयक्षासुरदेवसंधैः । स्वमूर्तिभेदैः स्थित एक ईशस्तमादिमात्मानमहं भजामि ॥३२॥ यतो भिन्नमिदं सर्वं समुद्भूतं स्थितं च वै । यस्मिन्नेष्यति पश्चाच्च तमस्मि शरणं गतः ॥३३॥ यः स्थितो विश्वरूपेण सङ्गीवात प्रतीयते । असङ्गो परिपूर्णश्च तमस्मि शरणं गतः ॥३४॥ हृदि स्थितोऽपि यो देवो मायया मोहितात्मनाम् । न ज्ञायेत परः शुद्धस्तमस्मि शरणं गतः ॥३५॥ सर्वसंगनिवृत्तानां ध्यानयोगरतात्मनाम् । सर्वत्र भाति ज्ञानात्मा तमस्मि शरणं गतः ॥३६॥ दधार मंदरं पृष्ठे निरोदेऽमृतमन्थने । देवतानां हितार्थाय तं कूर्मं शरणं गतः ॥३७॥ और अन्त में स्वयं क्षीर सागर में शयन करता है ऐसे अज का मैं भजन करता हूँ । जिसके नाम के स्मरण मात्र से गजेन्द्र ग्राह के कठोर बन्धन से मुक्त हो गया, जो देव सर्वदा अपने परम पद पर विराजमान रहते हैं, उस आदि विष्णु की शरण में मैं आया हूँ । जो शिव भक्तों के लिये शिव स्वरूप और वैष्णवों के लिए विष्णु स्वरूप हैं जो पूर्व संकल्प के अनुरूप शरीर धारण करते हैं उसी देव की शरण में मैं नित्य रहता हूँ । जिसने केशो का नाश किया, नरकासुर को यमलोक पहुँचाया, बालक होते हुए भी जिसने अंगुली पर पर्वत को उठा लिया, जिसने पृथ्वी के भार को दूर करने का स्वभाव-सा बना लिया है उस वासुदेव को सतत नमस्कार है ॥२१-२६॥ जिसने सिंह रूप में अवतार लेकर शिला के समान कठिन हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल को नखों से फाड़ डाला और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा की उस अज ईश को नमस्कार करता हूँ। जो आकाश आदि पंच तत्त्वों से विभूषित, आत्मा नाम से प्रसिद्ध, निर्गुण, नित्य, रहस्यमय, जगत् के स्रष्टा और कर्मशून्य है उस परमपुराण पुरुष को नमस्कार करता हूँ ॥३०-३१॥ जो एक होते हुए भी ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, असुर और देव समूह आदि अनेक रूपों में स्थित है उस आदि आत्मा को मैं भजता हूँ । जिससे ये सारे भिन्न लोक उत्पन्न हुए, जिसमें स्थित हैं और अन्त में जिसमें लीन भी होंगे उस देव की शरण में मैं प्राप्त हूँ । जो विश्व रूप में स्थित होकर इसमें लिप्त-सा जान पड़ता है, उस निर्लिप्त और परिपूर्ण देव की शरण में प्राप्त हूँ । जो पर और शुद्ध ब्रह्म सब प्राणियों के हृदय में रहता हुआ भी माया- बद्ध जीवों से नहीं जाना जाता है उस ईश की शरण में प्राप्त हूँ । जो ज्ञानरूप परमात्मा सब प्रकार की आस- क्तियों से विरत और ध्यान योग में रत रहने वाले महापुरुषों को सर्वत्र प्रकाशरूप में दिखायी पड़ता है उस ज्ञान रूप भगवान् की शरण में प्राप्त हूँ । जिसने अमृत के लिये किये गये समुद्र मन्थन के समय देवों के हित के लिए मेरु को अपनी पीठ पर धारण किया उस कूर्म की शरण में प्राप्त हूँ ॥३२-३७॥ जिस अनन्त ने अपने दाँतों के अग्र भाग से

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