भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 1008 में से

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द्वितीयोऽध्यायः ६ नारद उवाच सर्वज्ञाः स्थ मुनिश्रेष्ठाः भगवद्भक्तितत्पराः । यूयं सर्वे जगन्नाथा भगवन्तः सनातनाः ॥१६॥ लोकोद्धारपरान्युष्मन्दीनेषु कृतसौहृदान् । पृच्छे ततो वदत मे भगवल्लक्षणं बुधाः ॥१७॥ येनेदमखिलं जातं जगत्स्थावरजङ्गमम् । गङ्गापादोदकं यस्य स कथं ज्ञायते हरिः ॥१८॥ कथं च विविधं कर्म सफलं जायते नृणाम् । ज्ञानस्य लक्षणं ब्रूत तपसश्चापि मानदाः ॥१९॥ अतिथेः पूजनं वापि येन विष्णुः प्रसीदति । एवमादीनि गुह्यानि हरितुष्टिकराणि च । अनुगृह्य च मां नाथास्तत्त्वतो वक्तुमर्हथ ॥२०॥ शौनक उवाच नमः पराय देवाय परस्मात्परमाय च । परावरनिवासाय सगुणायागुणाय च ॥२१॥ अमायायात्मसंज्ञाय मायिने विश्वरूपिणे । योगीश्वराय योगाय योगगम्याय विष्णवे ॥२२॥ ज्ञानाय ज्ञानगम्याय सर्वज्ञानैकहेतवे । ज्ञानेश्वराय ज्ञेयाय ज्ञात्रे विज्ञानसंपदे ॥२३॥ ध्यानाय ध्यानगम्याय ध्यातृपापहराय च । ध्यानेश्वराय सुधिये ध्येयध्यातृस्वरूपिणे ॥२४॥ आदित्यचन्द्राग्निविधातृदेवाः सिद्धाश्च यक्षासुरनागसङ्घाः । यच्छक्तियुक्तास्तमजं पुराणं सत्यं स्तुतीशं सततं नतोऽस्मि ॥२५॥ यो ब्रह्मरूपी जगतां विधाता स एव पाता द्विजविष्णुरूपी । कल्पान्तरुद्राख्यतनुः स देवः शेतेऽङ्घ्रिपानस्तमजं भजामि ॥२६॥ नारद बोले—मुनिश्रेष्ठ ! आप लोग सर्वज्ञ और सर्वदा भगवद् भक्तों में ही लीन रहने वाले महात्मा हैं। आप सभी संसार के स्वामी, सनातन और भगवद्रूप हैं। आप लोकोद्धार में सर्वदा निरत रहने वाले और दीन जनों पर कृपा करने वाले हैं। अतः हे बुधवृन्द ! आप से मैं भगवद्-विभूति के विषय में पूछ रहा हूँ कृपाकर बतलाइये। जिन भगवान् से इस स्थावर जंगमात्मक अखिल विश्व की सृष्टि हुई है और गंगा जिनके चरणोदक (चरणों से निकली हुई) हैं, वे किस प्रकार जाने जा सकते हैं ? ज्ञान और तपस्या के लक्षण क्या हैं ? वह बताइये । अतिथि-पूजन, जिससे विष्णु प्रसन्न होते हैं वह तथा इसी प्रकार के अन्य रहस्य एवं विष्णु को प्रसन्नता के उपाय कहिए। नाथ ! आप मेरे ऊपर अनुग्रह करके इन प्रश्नों को यथार्थ रूप से समझाइये ॥१६-२०॥ शौनक बोले—श्रेष्ठ देव तथा श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतम देव को नमस्कार है। क्षुद्र से क्षुद्र और महान् से महान् पदार्थों में रहने वाले, सगुण, अगुण, मायारहित, आत्मज्ञ, माया स्वरूप और विश्वरूप को नमस्कार है। योगीश्वर, योगिरूप, योग द्वारा प्राप्त करने योग्य विष्णु को नमस्कार है। ज्ञानरूप, ज्ञान द्वारा जानने योग्य, सब ज्ञानों के एकमात्र कारण, ज्ञानेश्वर, ज्ञेय, ज्ञाता और विज्ञान सागर को नमस्कार है। ध्यानरूप, ध्यान से प्राप्त करने योग्य, ध्यान करने वालों के पाप को हरने वाले, ध्यानेश्वर, सुधी, ध्येय और ध्याता स्वरूप को नमस्कार है। जिसकी शक्ति से आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि, विधाता, सब देवता, सिद्ध, यक्ष, असुर और नाग समूह शक्तिमान् हैं उस अज, पुराण, सत्य और सब स्तुतियों के एकमात्र ईश को सतत नमस्कार हैं। जो ब्रह्मारूप से विश्व का निर्माण करता, द्विज विष्णु के रूप में रक्षा करता और कल्पान्त में रुद्र रूप धारणकर विश्व का संहार करता २—ना० पु०

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