भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

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८ नारदीयपुराणम् सूत उवाच सनकाद्या महात्मानो ब्रह्मणो मानसाः सुताः । निर्ममा निरहंकाराः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥३॥ तेषां नामानि वक्ष्यामि सनकश्च सनन्दनः । सनत्कुमारश्च विभुः सनातन इति स्मृतः ॥४॥ विष्णुभक्ता महात्मानो ब्रह्मध्यानपरायणाः । सहस्रसूर्यसंकाशाः सत्यसन्धा मुमुक्षवः ॥५॥ एकदा मेरुशृङ्गं ते प्रस्थिता ब्रह्मणः सभाम् । इष्टं मार्गेऽथ ददृशुः गङ्गां विष्णुपदीं द्विजाः ॥६॥ तां निरीक्ष्य समुद्युक्ताः स्नातुं सीताजलेऽभवन् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवर्षिर्नारदो मुनिः ॥७॥ आजगाम द्विजश्रेष्ठा दृष्ट्वा भ्रान्तॄन्स्वकाग्रजान् । तान्दृष्ट्वा स्नातुमुद्युक्तान्नमस्कृत्य कृतांजलिः ॥८॥ गृणन्नामानि सप्रेमभक्तियुक्तो मधुद्विषः । नारायणाच्युतानन्त वासुदेव जनार्दन ॥९॥ यज्ञेश यज्ञपुरुष कृष्ण विष्णो नमोऽस्तु ते । पद्माक्ष कमलाकान्त गङ्गाजनक केशव ॥ क्षीरोदशायिन्देवेश दामोदर नमोऽस्तु ते ॥१०॥ श्रीराम विष्णो नरसिंह वामन प्रद्युम्न संकर्षण वासुदेव । अजानिरुद्धामलरुङ् मुरारे त्वं पाहि नः सर्वभयादजस्रम् ॥११॥ इत्युच्चरन्हरेर्नाम नत्वा तांस्वाग्रजान्मुनीन् । उपासीनश्च तैः सार्द्धं सस्नौ प्रीतिसमन्वितः ॥१२॥ तेषां चापि तु सीताया जले लोकमलापहे । स्नात्वा संतर्प्य देवर्षिपिटून्विगतकल्मषाः ॥१३॥ उत्तौर्य संध्योपास्त्यादि कृत्वाचारं स्वकं द्विजाः । कथां प्रचक्रुर्विविधा नारायणगुणाश्रिताः ॥१४॥ कृतक्रियेषु मुनिषु गङ्गातीरे मनोरमे । चकार नारदः प्रश्नं नानाख्यानकथान्तरे ॥१५॥ सूत बोले—महात्मा सनक आदि ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं वे सभी अतिविनीत, मायारहित और ऊर्ध्व- रेता हैं । उन लोगों का नाम कहता हूँ । वे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और विभु सनातन नाम से प्रसिद्ध हैं । वे विष्णुभक्त, महात्मा ब्रह्मोपासना में निरत रहने वाले, सहस्र सूर्यों के समान कान्तिमान्, सत्यवक्ता और मुक्ति- परायण हैं । एक समय वे ब्रह्मा की सभा में सम्मिलित होने के लिए मेरुशृङ्ग की ओर चले । द्विजो ! उन के मार्ग में ही विष्णु-चरण से निकलने वाली विष्णुपदी गंगा दिखाई दी । उसको देखकर वे महामुनि उस सीता (गंगा) के जल में स्नान करने के लिए प्रस्तुत हुए । उसी समय वहाँ देवर्षिनारद भी आ गये । द्विजश्रेष्ठो ! स्नान करने के लिए प्रस्तुत अपने उन अग्रज भाइयों को देखकर नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रेम पूर्वक भक्ति से मधुसूदन का नाम कीर्तन करने लगे—नारायण ! अच्युत ! अनन्त ! वासुदेव ! जनार्दन ! यज्ञेश ! यज्ञपुरुष ! कृष्ण ! विष्णु ! आपको नमस्कार है । कमलोचन ! कमलापति ! गंगा के जनक ! केशव ! क्षीरशायी ! देवेश ! दामोदर ! आपको नमस्कार करता हूँ । श्रीराम ! विष्णु ! नरसिंह ! वामन ! प्रद्युम्न ! संकर्षण ! वासुदेव ! अज ! अनिरुद्ध ! विमल कान्तिमान् ! मुरारे ! आप सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा कीजिए । इस प्रकार उच्च स्वर से हरिनाम का स्मरण कर अपने उन अग्रज मुनियों को नमस्कार करके उनके साथ प्रेम पूर्वक स्नान करने के उपरान्त बैठ गए । द्विजो ! वे भी पापों को दूर करने वाले सीता के जल में विधिवत् स्नान कर देव, ऋषि और पितर के तर्पण से निवृत्त हो शुद्ध हो गये । द्विजो ! इस प्रकार वे अपने नित्यकर्म और उपासना से निवृत्त हो भगवान् नारायण और उनके भक्तों की चर्चा करने लगे । उस मनोहर गंगा के तट पर जब वे मुनि अपने सान्ध्य- कर्म से निवृत्त हो गये तब अवसर पाकर नारद जी ने नाना कथाओं और आख्यानों के विषय में पूछा ॥३-१५॥