भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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द्वितीयाऽध्यायः ७ तत एकमना भूत्वा पिबेद्धरिकथामृतम् । कथं संभ्रान्तचित्तस्य कथास्वादः प्रजायते ॥७५॥ किं सुखं प्राप्यते लोके पुंसा संभ्रान्तचेतसा । तस्मात्सर्वं परित्यज्य कामं दुःखस्य साधनम् ॥७६॥ समाहितमना भूत्वा कुर्यादच्युतचिन्तनम् । येन केनाप्युपायेन स्मृतो नारायणोऽव्ययः ॥७७॥ अपि पातकयुक्तस्य प्रसन्नः स्यान्न संशयः । यस्य नारायणे भक्तिर्विभो विश्वेश्वरेऽव्यये ॥ तस्य स्यात्सफलं जन्म मुक्तिश्चैव करे स्थिता ॥७८॥ धर्मार्थकाममोक्षाख्यपुरुषाथा द्विजोत्तमाः । हरिभक्तिपराणां वै संपद्यन्ते न संशयः ॥७६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सूतर्षिसंवादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ द्वितीयोऽध्यायः ऋषय ऊचुः कथं सनत्कुमारस्तु नारदाय महात्मने । प्रोक्तवान्सकलान्धर्मान्कथं तौ मिलितावुभौ ॥१॥ कस्मिन्स्थाने स्थितौ सूत तावुभौ ब्रह्मवादिनौ । हरिगीतसमुद्गाने चक्रतुस्तद्वदस्व नः ॥२॥ और यही सनातन धर्म है। जो एकाग्रमन से कथा नहीं सुनता है, वह कथा का कुछ भी रस या रहस्य नहीं जान पाता है। इसलिए एकाग्रचित्त होकर हरिकथा रूपी अमृत का पान करना चाहिए, इधर-उधर मन दौड़ाने वाले को कैसे कथा का रस (आनन्द) प्राप्त हो सकता है ॥७३-७५॥ भ्रान्त चित्त वाले व्यक्ति को इस लोक में क्या सुख मिल सकता है ? इसलिए दुःखमूलक भौतिक काम- नाओं को छोड़कर एकाग्र भाव से भगवान् अच्युत का चिन्तन करना चाहिए । चाहे अत्यन्त घोर पापी ही क्यों न हो परन्तु यदि वह जिस किसी प्रकार से अव्यय नारायण का स्मरण करता है तो भगवान् पतितपावन अवश्य उस पर प्रसन्न होते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जिस व्यक्ति को अविनाशी, विश्व के स्वामी और व्यापक नारायण में अनन्य भक्ति होती है, उसी का जन्म सफल है और मुक्ति उसके हाथ में रहती है । द्विजो- त्तमवृन्द ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नाम के पुरुषार्थ हरिभक्तों को अवश्य प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥७६-७८॥ श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वार्ध के प्रथम भाग में सूत और ऋषियों के संवाद नामक पहला अध्याय समाप्त ॥१॥ अध्याय २ नारद द्वारा विष्णु की स्तुति ऋषि बोले—महात्मा नारद को सनत्कुमार ने किस प्रकार सब धर्मों का रहस्य बतलाया ? और कैसे उन दोनों महापुरुषों का मिलन हुआ ? किस स्थान पर स्थित होकर उन दोनों ब्रह्मवादी महात्माओं ने भगवान् के इस पुण्य आख्यान की चर्चा की ? हे सूत, इन्हें विस्तार पूर्वक हमें समझाइये ॥१-२॥