बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ नारदीयपुराणम् सत्सङ्गदेवार्चनसत्कथासु हितोपदेशे निरतो मनुष्यः । प्रयाति विष्णोः परमं पदं यद्देहावसानेऽच्युततुल्यतेजाः ॥६३॥ तस्मादिदं नारदनामधेयं पुण्यं पुराणं शृणुत द्विजेन्द्राः । यस्मिञ्छुते जन्मजरादिहीनो नरो भवेदच्युतनिष्ठचेताः ॥६४॥ वरं वरेण्यं वरदं पुराणं निजप्रभावितसर्वलोकम् । संकल्पितार्थप्रदमादिदेवं स्मृत्वा व्रजेन्मुक्तिपदं मनुष्यः ॥६५॥ ब्रह्मेशविष्ण्वादिशरीरभेदैर्विश्वं सृजत्यत्ति च पाति विप्राः । तमादिदेवं परमं परेशमाधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम् ॥६६॥ यो नाम जात्यादिविकल्पहीनः परः पराणां परमः परस्मात् । वेदान्तवेद्यः स्वजनप्रकाशः समीड्यते सर्वपुराणवेदैः ॥६७॥ तस्मात्तमीशं जगतां विमुक्तिमुपासनायालमजं मुरारिम् । परं रहस्यं पुरुषार्थहेतुं स्मृत्वा नरो याति भवाब्धिपारम् ॥६८॥ वक्तव्यं धार्मिकेभ्यस्तु श्रद्दधानेभ्य एव च । मुमुक्षुभ्यो यतिभ्यश्च वीतरागेभ्य एव च ॥६९॥ वक्तव्यं पुण्यदेशे च सभायां देवतागृहे । पुण्यक्षेत्रे पुण्यतीर्थे देवब्राह्मणसन्निधौ ॥७०॥ उच्छिष्टदेशे वक्तार आख्यानमिदमुत्तमम् । पच्यन्ते नरके घोरे यावदाभूतसंप्लवम् ॥७१॥ मृषा शृणोति यो मूढो दम्भी भक्तिविवर्जितः । सोऽपि तद्वन्महाघोरे नरके पच्यतेऽक्षये ॥७२॥ नरो यः सत्कथामध्ये संभावां कुरुतेऽन्यतः । स याति नरकं घोरं तदेकाग्रमना भवेत् ॥७३॥ श्रोता वक्ता च विप्रेन्द्रा एष धर्मः सनातनः । असमाहितचित्तस्तु न जानाति हि किंचन ॥७४॥ इसके विपरीत जो मनुष्य सत्संग, देवार्चन, सत्कथा श्रवण और माङ्गलिक उपदेश श्रवण में निरत रहता है वह मृत्यु के बाद अच्युत के समान तेजस्वी बनकर विष्णु के परमपद को प्राप्त करता है ॥६३॥ द्विजोत्तमवृन्द ! इसलिए नारद नामक इस पुण्यदायक पुराण को तुम लोग सुनो, जिसके सुनने से मनुष्य जन्म-मरण के क्लेश से मुक्त होकर अच्युत में अचल भक्ति प्राप्त करता है । श्रेष्ठ, महनीय, वरदाता, पुराण, अपनी कान्ति से सम्पूर्ण लोक को वशीभूत करने वाले और मनोरथों को पूर्ण करने वाले आदिदेव का स्मरण कर मनुष्य मोक्ष पदवी को प्राप्त करता है । द्विजो ! जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूपों में अपने को विभक्त कर विश्व की सृष्टि, पालन और नाश करता है उस आदिदेव, परम पुरुष महाप्रभु का हृदय में ध्यान कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है । जो नाम, जाति आदि विकल्पों से रहित, पर, परात्पर, परम से भी परम, वेदान्त (ज्ञान) द्वारा जानने योग्य और भक्तों के लिए प्रकाश स्वरूप है उसी की पूजा सब पुराणों के ज्ञाता व्यक्ति करते हैं । इसलिए उस जगत् को मुक्ति देने वाले, उपासना से प्राप्त करने योग्य, अज, पर, रहस्यमय और मोक्षदाता मुरारि का स्मरण कर मनुष्य इस संसार-सागर को पार कर जाता है । यह पुराण मुमुक्षु, यति, वीतराग, धार्मिक और श्रद्धालु जनों को ही सुनाना चाहिए । इस पुण्य पुराण का पाठ पुण्य क्षेत्र में, सभा में, देवमन्दिरों में, पवित्रतीर्थों में और देवता तथा ब्राह्मणों के समीप ही होना चाहिए । जो मूढ़ अपवित्र स्थानों में इस उत्तम कथा का उपदेश करता है वह प्रलय काल तक घोर नरक में कष्ट पाता है । इसी प्रकार जो पाखण्डी श्रोता श्रद्धाहीन होकर केवल दिखाने के लिए इस उत्तम आख्यान को सुनता है, वह भी दम्भी वक्ता के समान ही घोर नरक में यातना पाता है ॥६४-७२॥ जो नर पुराण-पाठ के समय व्यर्थ की बातें करता है, वह घोर नरक में जाता है। अतएव विप्रेन्द्रो ! श्रोता और वक्ता सबको एकाग्रमन से कथा का श्रवण या पाठ करना चाहिए। यही कथा की सनातन विधि है