भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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नारदीयपुराणम् ५ जनानां बकवृत्तीनां न ब्रूयादिदमुत्तमम् । त्यक्तकामादिदोषाणां विष्णुभक्तिरतात्मनाम् ॥४९॥ सदाचारपराणां च वक्तव्यं मोक्षसाधनम् । सर्वदेवमयो विष्णुःस्मरतामार्त्तिनाशनः ॥५०॥ सद्भक्तिवत्सलो विप्रा भक्त्या तुष्यति नान्यथा । अश्रद्धयापि यन्नाम्नि कीर्त्तितेऽथस्मृतेऽपि वा ॥५१॥ विमुक्तः पातकैर्मर्त्यो लभते पदमव्ययम् । संसारघोरकान्तारदावाग्निर्मधुसूदनः ॥५२॥ स्मरतां सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमाः । तदर्थद्योतकमिदं पुराणं श्राव्यमुत्तमम् ॥५३॥ श्रवणात्पठनाद्वापि सर्वपापविनाशकृत् । यस्यास्य श्रवणे बुद्धिर्जायते भक्तिसंयुता ॥५४॥ स एव कृतकृत्यस्तु सर्वशास्त्रार्थकोविदः । यदजितं तपः पुण्यं तन्मन्ये सफलं द्विजाः ॥५५॥ यदस्य श्रवणे भक्तिरन्यथा नहि जायते । सत्कथासु प्रवर्त्तन्ते सज्जना ये जगद्धिताः ॥५६॥ निन्दायां कलहे वापि ह्यसन्ततः पापतत्पराः । पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमाः ॥५७॥ तैरर्जितानि पुण्यानि क्षयं यान्ति द्विजोत्तमाः । समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः ॥५८॥ पुराणान्यर्थवादेन ब्रुवन्नरकमाश्नुते । अन्यानि साधयन्त्येव कार्याणि विधिना नराः ॥५९॥ पुराणानि द्विजश्रेष्ठाः साधयन्ति न मोहिताः । अनायासेन यः पुण्यानीच्छतीह द्विजोत्तमाः ॥६०॥ श्रोतव्यानि पुराणानि तेन वै भक्तिभावतः । पुराणश्रवणे बुद्धिर्यस्य पुंसः प्रवर्त्तते ॥६१॥ पुरार्जितानि पापानि तस्य नश्यन्त्यसंशयम् । पुराणे वर्त्तमानेऽपि पापपाशेन यन्त्रितः ॥ आदरेणान्यगाथासु सक्तबुद्धिः पतत्यधः ॥६२॥ पवित्र क्षेत्र में द्विजातियों के समीप भगवान् विष्णु के सान्निध्य में सुनाना चाहिए । ब्रह्मद्रोह करने वालों, पाखण्ड में रत रहने वालों और बगुला भक्तों को तो कभी भी यह उत्तम पुराण नहीं सुनाना चाहिए । यह मोक्षदायी पुराण सदाचारपरायण, कामादिदोषरहित और विष्णु-भक्ति में तल्लीन रहने वाले महापुरुषों को सुनाना चाहिए । विप्रगण ! स्मरण करने वालों की पीड़ा दूर करने वाले, सच्ची भक्ति के स्नेही और अखिल देव स्वरूप विष्णु भक्ति से सन्तुष्ट होते हैं, अन्य प्रकार से नहीं । मनुष्य यदि बिना श्रद्धा के भी विष्णु का नाम कीर्तन अथवा स्मरण करे तो भी अपने पापों से मुक्त होकर शाश्वत पद को प्राप्त करता है । सज्जनो ! संसार रूपी घोर महा- वन के लिए वनाग्नि के समान मधुसूदन भगवान् अपने स्मरण करने वालों का सब पाप शीघ्र नष्ट कर देते हैं । उनकी महिमा को प्रकट करने वाले इस उत्तम पुराण का तो सर्वदा श्रवण करना चाहिए । इसके सुनने और स्वयं पाठ करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । द्विजो ! जिस मनुष्य की इस पुराण के श्रवण में श्रद्धायुक्त बुद्धि हो जाती है, वही कृतकृत्य है वही सब शास्त्रों का ज्ञाता है । द्विजगण ! अर्जित किये हुए तप और पुण्य के फलोदय होने से इस पुराण के सुनने में भक्ति होती है, अन्यथा नहीं । सत्कथाओं को सुनने की इच्छा उन्हीं व्यक्तियों को होती है जो सज्जन और जगत् का कल्याण करने वाले हैं ।४७-५६॥ जो दुष्ट और पापी हैं वे तो सर्वदा परनिन्दा और कलह में लगे रहते हैं । जो नराधम पुराणों पर अर्थ- वाद का दोष लगाते हैं अर्थात् पुराणों को असत्य और अत्युक्ति कहते हैं, उनके पूर्वार्जित सभी सुकृत नष्ट हो जाते हैं । समस्त कर्मों को निर्मूल करने के साधन पुराणों को अर्थवाद से युक्त कहने वाला नराधम नरक भोग करता है । मोहग्रस्त द्विजवर पुराणों को नहीं साधते हैं । द्विजश्रेष्ठो ! जो व्यक्ति अनायास पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनको अवश्य भक्तिपूर्वक पुराणों का श्रवण करना चाहिए । पुराणों के श्रवण में जिस मनुष्य की रुचि हो जाती है निःसन्देह उसके पूर्वार्जित पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । पुराणों के रहते हुए भी पाप की रस्सी में बँधा प्राणी अन्य कथाओं की ओर मन लगाकर पाप के गड्ढे में गिरता है ॥५७-६२॥