भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

४ प्रथमोऽध्यायः वद सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदसंशयम् । कस्य नो जायते श्रद्धा श्रोतुं त्वद्वचनामृतम् ॥३४॥ सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे यदिष्टं वो वदामि तत् । गीतं सनकमुख्यैस्तु नारदाय महात्मने ॥३५॥ पुराणं नारदोपाख्यमेतद्वेदार्थसंमितम् । सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम् ॥३६॥ दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । नारायणकथोपेतं सर्वकल्याणकारणम् ॥३७॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुभूतं महाफलम् । अपूर्वं पुण्यफलदं शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥३८॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । श्रुत्वैतदार्षं दिव्यं च पुराणं शुद्धिमाप्नुयात् ॥३९॥ यस्यैकाध्यायपठनाद्वाजिमेधफलं लभेत् । अध्यायद्वयपाठेन राजसूयफलं तथा ॥४०॥ ज्येष्ठमासे पूर्णिमायां मूलर्क्षे प्रयतो नरः । स्नात्वा च यमुनातोये मथुरायामुपोषितः ॥४१॥ अभ्यर्च्य विधिवत्कृष्णं यत्फलं लभते द्विजाः । तत्फलं समवाप्नोति अध्यायत्रयपाठतः ॥४२॥ तत्प्रवक्ष्यामि वः सम्यक् शृणुध्वं गदतो मम । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तः कोटिकुलान्वितः ॥४३॥ ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव प्रतितिष्ठति । श्रुत्वास्य तु दशाध्यायान्भक्तिभावेन मानवः ॥४४॥ निर्वाणमुक्तिं लभते नात्र कार्या विचारणा । श्रेयसां परमं श्रेयः पवित्राणामनुत्तमम् ॥४५॥ दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं श्रोतव्यं यत्नतो द्विजाः । श्रद्धया सहितो मर्त्यः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव वा ॥४६॥ पठित्वा मुच्यते सद्यो महापातकराशिभिः । सतामेव प्रवक्तव्यं गुह्याद्गुह्यतरं यतः ॥४७॥ वाचयेत्पुरतो विष्णोः पुण्यक्षेत्रे द्विजान्तिकै । ब्रह्मद्रोहपराणां च दम्भाचारयुतात्मनाम् ॥४८॥


मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी ? भक्ति से मनुष्य क्या प्राप्त करता है ? भक्ति का स्वरूप क्या है ? हे मुनिश्रेष्ठ सूत ! इन प्रश्नों का अवश्य समाधान कीजिये जिससे हम लोगों का संशय दूर हो । आपका वचनामृत पान करने के लिए भला किसकी श्रद्धा नहीं होगी ॥२६-३४॥ सूत बोले—ऋषिवर्यवृन्द ! एवमस्तु, कृपाकर सुनिए ? इस विषय में सनकादि प्रमुख ऋषियों ने महात्मा नारद से जिस पुराण को कहा है उसी को यहाँ कह रहा हूँ। वह वेदार्थसम्मत पुराण नारद पुराण नाम से प्रसिद्ध है। वह पापनाशक, दुष्टग्रह-शान्ति-कारक, भुक्ति-मुक्ति-प्रदाता, पुण्यवर्धक, दुःस्व- प्ननाशक, भगवान् श्रीनारायण की पुण्यकथाओं से सम्पन्न एवं कल्याणप्रद है। ऐसे धर्म-अर्थ, काम और मोक्ष के हेतुभूत, महाफलदायक अपूर्व और पुण्यफलदायक पुराण आप लोग सावधान होकर सुनें ! छोटे बड़े पापों को करने वाले व्यक्ति भी इस आर्ष एवं दिव्य पुराण को सुनकर शुद्ध हो जाते हैं। इसके एक अध्याय के पाठ करने से भी मनुष्य अश्वमेध के बराबर फल पाते हैं । दो अध्याय के पाठ से तो वह राजसूय का फल पा जाता है। जेठ मास की पूर्णिमा को मूल नक्षत्र में एकाग्र भाव से यमुना में स्नान करने और मथुरा पुरी में उपवास-व्रत करके कृष्ण की विधिवत् पूजा करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह फल इस पुराण के तीन अध्याय के पाठ से मिल जाता है । अतएव इस पुराण की कथा आज मैं भलीभाँति कह रहा हूँ, आप लोग सुनें । मनुष्य इस पुराण को सुनकर दस हजार जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ों कुलों के साथ ब्रह्म-पद को प्राप्त करता है । भक्ति पूर्वक इसके दश अध्यायों के सुनने से निर्वाण प्राप्त होता है । इसमें किसी प्रकार की शंका करने की आवश्यकता नहीं है । द्विजगण ! इस परम पवित्र, कल्याणमय, दुःस्वप्न नाशक पुण्य पुराण को यत्न पूर्वक सुनना चाहिए । श्रद्धा के सहित मनुष्य यदि एक श्लोक अथवा आधा श्लोक भी पढ़े तो भी असंख्य महापापों से छूट जाता है ३५-४६३॥ यह पुराण श्रद्धालु व्यक्ति को ही सुनाना चाहिए, क्योंकि इसका रहस्य गोपनीय है । इस पुराण को