बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
बृहन्नारदीयपुराणम् ( पूर्वभागः ) अनुवादक तारिणीश झा व्याकरणवेदान्ताचार्य शक १९१० : सन् १९८९ हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद
बृहन्नारदीयपुराणम् पूर्वभागः [हिन्दी अनुवाद सहित] ⊙ अनुवादक तारिणीश झा व्याकरणवेदान्ताचार्य ⊙ शक १९१० : सन् १९८६ हिन्दी साहित्य सम्मेलन • प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद
बृहन्नारदीयपुराणम् पूर्वभागः [हिन्दी अनुवाद सहित] अनुवादक तारिणीश झा व्याकरणवेदान्ताचार्य शक १९१० : सन् १९८९ हिन्दी साहित्य सम्मेलन • प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग • इलाहाबाद
◎ प्रकाशक डॉ० प्रभात मिश्र शास्त्री प्रधान मंत्री : हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद ◎ प्रकाशन वर्ष : शक १९१० : सन् १९८९ प्रथम संस्करण मूल्य : २००.०० ◎ मुद्रक डॉ० प्रभात मिश्र शास्त्री सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग
प्रकाशकीय यथा श्रेष्ठा नदी गङ्गा पुष्करं च सरो यथा । ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ ⊙ तथैव नारदीयं तु पुराणेषु प्रकीर्तितम् ॥ (ना० पु० अ० १२५) हर्ष को बात है कि हमारो पुराण-प्रकाशन योजना का कार्य 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि' के रहते हुए भी सुचारु रूप से चल रहा है । भगवान् की कृपा बनी रही तो आगामी कुछ वर्षों में और भी कतिपय पुराण जनताजना- र्दन के करकमलों में पहुँचा देंगे । सम्प्रति बृहन्नारदीयपुराण (पूर्वभाग) हम प्रस्तुत कर रहे हैं । वैसे तो इस महापुराण में छन्द, ज्योतिष, तन्त्र, मन्त्र, वेदान्त आदि विविध विषयों पर अच्छा प्रकाश डाला गया है, पर त्रिस्कन्ध ज्योतिष का विवरण बहुत प्रामाणिक एवं सटीक है । 'हाथ कंगन को आरसी क्या', पाठक गण स्वयं इसे पढ़कर अनुभव करेंगे । इस महापुराण का अनुवाद आज से ४० वर्ष पूर्व सम्मेलन के प्राण स्वनामधन्य बाबू पुरुषोत्तमदास टण्डन की अभिप्रेरणा से सम्मेलन ने कराया था । इस अन्तराल में सम्मेलन को कितनी उच्चावच स्थिति को देखना पड़ा, यह प्रबुद्ध जनता से छिपी हुई बात नहीं है । सम्मेलन की अक्ष्य स्थिति में पुराण-प्रकाशन-कार्य बन्द कर दिया गया था । आदाता काल के बाद पुनर्मन्त्रिमण्डल काल में हमने इस कार्य को पुनरुज्जीवित किया । तबसे कई पुराणों का सुचारु प्रकाशन अब तक हो चुका है । प्रकाशन-क्रम में यह छठा पुष्प (बृहन्नारदीय पुराण का प्रकाशन) पाठकों को समर्पित है । इस पुराण का अनुवाद कार्य दो अनुवादकों ने पूर्ण किया था । इस पुराण में कुल २०७ अध्याय हैं, जिनमें अध्याय १ से ५३ तक डॉ० घनश्याम त्रिपाठी ने अनुवाद किया और अध्याय ५४ से २०७ तक (कुल १५४ अध्यायों का) अनुवाद आचार्य प्रवर श्री तारिणीश झा ने किया । साथ ही संशोधन-सम्पादन कार्य भी श्री झा ने सम्पन्न किया है । अतएव हम उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करते हैं और इस बृहत् कार्य को सम्पन्न करने में श्री झा के सहयोगी पण्डित श्री रुद्रप्रसाद मिश्र, श्री हरिमोहन पाण्डेय और विशेषकर साहित्य विभागाध्यक्ष श्री हरिमोहन मालवीय के प्रति हम धन्यवाद व्यक्त करते हैं । विश्वास है, सहृदय पाठकगण हमारे इस महत्त्वपूर्ण प्रकाशन को अपनाकर हमें प्रोत्साहित करेंगे । महाकुंभ पर्व डॉ प्रभात शास्त्री संवत् २०४५ प्रधान मंत्री हिन्दी-साहित्य, सम्मेलन, प्रयाग १२, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद ।
विषय-सूची अध्याय विषय पृष्ठ संख्या १ नैमिषारण्य में मुनियों की तपस्या १ २ नारद द्वारा विष्णु की स्तुति ७ ३ भूगोल वर्णन १२ ४ मार्कण्डेय मुनि का चरित्र वर्णन १९ ५ मार्कण्डेय मुनि की कथा २७ ६ गंगा-माहात्म्य-वर्णन ३३ ७ गंगा-माहात्म्य-वर्णन ३८ ८ गंगा माहात्म्य वर्णन ४४ ९ गंगाजल के सम्पर्क से राजा सौदास का शापोद्धार ५४ १० राजा बलि से देवताओं की पराजय ६५ ११ गङ्गोत्पत्ति-वर्णन ६९ १२ धर्माख्यान-प्रसंग ८४ १३ धर्माख्यान-प्रसंग ९१ १४ पापों का प्रायश्चित्त तथा श्राद्ध-पंचक निरूपण १०१ १५ नरकयातना तथा गंगानयन वर्णन १०८ १६ भगीरथ द्वारा गंगा का आनयन और अपने कुल का उद्धार ११९ १७ उद्यापन सहित शुक्ल पक्षीय द्वादशीव्रत-निरूपण १२८ १८ उद्यापन विधि सहित लक्ष्मीनारायण-व्रत का वर्णन १३८ १९ विष्णु मन्दिर में ध्वजारोपण १३६ २० सोमवंशी राजा सुमति का अपने पूर्वजन्म का इतिहास-कथन १४२ २१ हरिपंचरात्र व्रत का वर्णन १४६ २२ विशेष मास में व्रत करने का वर्णन १५१ २३ भद्रशील ब्राह्मण का उपाख्यान १५३ २४ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के सदाचार-वर्णन १६१ २५ स्मार्ताचार और आश्रम धर्मनिरूपण १६३ २६ द्विजातियों के वेदाध्यन आदि धर्मों का निरूपण १६८ २७ गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी के धर्म का निरूपण १७१ २८ श्राद्ध वर्णन १७६ २९ तिथियों का निर्णय १८४
अध्याय विषय पृष्ठ संख्या
( ६ ) अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ३० प्रायश्चित्त विधि का निरूपण १८४ ३१ यमदूतों के कृत्य का वर्णन १६७ ३२ भवाटवी का वर्णन २०२ ३३ योग-निरूपण २०६ ३४ हरिभक्त के लक्षणों का निरूपण २२० ३५ ज्ञान का निरूपण २२५ ३६ यज्ञमाली और सुमाली को उत्तम लोक की प्राप्ति २३१ ३७ विष्णु का माहात्म्य वर्णन २३५ ३८ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन २४० ३६ विष्णु-माहात्म्य वर्णन २४६ ४० विष्णु-माहात्म्य-वर्णन २५१ • ४१ विष्णु-माहात्म्य-वर्णन २५६ ४२ सृष्टि-वर्णन २६५ ४३ जीव की गति और द्विज का आचार-निरूपण २७४ ४४ ध्यानयोग-निरूपण २८७ ४५ पञ्चशिख का राजा जनक को उपदेश २९५ ४६ विविध तापों से छूटने के उपाय आदि का प्रतिपादन ३०२ ४७ मुक्तिप्रद योग का वर्णन ३११ ४८ ज्ञान-चर्चा-प्रसंग में राजा भरत का उपाख्यान ३१७ ४९ परमार्थ का निरूपण ३२५ ५० शिक्षा निरूपण ३३३ ५१ वेद के द्वितीय अंग कल्प, गणेश-पूजन, ग्रह शान्ति तथा श्राद्ध का निरूपण ३५४ ५२ व्याकरण शास्त्र का वर्णन ३६६ ५३ निरुक्त निरूपण ३७४ ५४ ज्योतिष वर्णन ३८० ५५ त्रिस्कन्ध ज्योतिष का जातक स्कन्ध ४०० ५६ त्रिस्कन्ध ज्योतिष का संहिता प्रकरण (विविध उपयोगी विषयों का वर्णन) ४४१ ५७ छन्दः शास्त्र का संक्षिप्त परिचय ५०९ ५८ शुक का इतिहास निरूपण ५११ ५६ अध्यात्मतत्त्व का निरूपण ५१७ ६० सनत्कुमार का शुक को ज्ञानोपदेश ५२१ ६१ सनत्कुमार का शुक को ज्ञानोपदेश ५२८ ६२ मोक्ष-धर्म का निरूपण ५३४ ६३ तृतीयपाद में पाशुपत दर्शनतत्त्व निरूपण ५४० ६४ दीक्षा विधि का निरूपण ५४९
( ७ ) अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ६५ मन्त्रजप विधि कथन ५५४ ६६ शौचाचार, स्नान, संध्या तर्पण आदि का निरूपण ५६२ ६७ देवपूजन विधि ५७३ ६८ गणेश-मंत्र विधि-निरूपण ५८३ ६९ मन्त्र-विधान-निरूपण ५९० ७० विष्णु के अष्टाक्षर आदि विविध मन्त्रों के अनुष्ठान की विधि ६०० ७१ नृसिंह मन्त्रोपासना ६१४ ७२ हयग्रीव-मन्त्रोपासना-कथन ६२७ ७३ लक्ष्मण तथा राम के मन्त्रों का जप विधान ६३१ ७४ हनुमान् के मंत्रों का निरूपण ६४३ ७५ हनुमान् के लिए दीपदान का विधान ६५६ ७६ कार्तवीर्य की महिमा ६६३ ७७ श्री कार्तवीर्य का कवच ६७१ ७८ हनुमान् का कवच ६८० ७९ हनुमान् का चरित्र-वर्णन ६८४ ८० श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मन्त्रों की अनुष्ठान विधि ७०८ ८१ कामना-भेद से कृष्ण मन्त्रों का भेद निरूपण ७३१ ८२ राधा कृष्ण-सहस्र-नाम-स्तोत्र ७४३ ८३ राधा के अंश से उत्पन्न पाँच प्रकृतियों का लक्षण ७५८ ८४ जप होम की विधि सहित देवी-मंत्र का निरूपण ७६९ ८५ वाग्देवता का अवतार-काली आदि के मन्त्रों का निरूपण ७७७ ८६ महालक्ष्मी का अवतार-बगला आदि का मन्त्र-साधन ७८३ ८७ विधान सहित दुर्गा मन्त्रों का निरूपण ७९३ ८८ राधावतार-षोलह देवताओं के मन्त्र, यन्त्र तथा पूजन की विधि ८०४ ८९ कवच सहित ललिता सहस्रनामस्तोत्र ८१९ ९० अर्चन-विधि सहित नित्यापटल कथन ८३० ९१ स्तोत्र सहित श्री माहेश्वर मंत्र का विधान ८४६ ९२ संक्षेप में ब्रह्मपुराण का इतिहास ८६१ ९३ पद्मपुराण की विषय सूची ८६५ ९४ विष्णुपुराण की विषय सूची ८६८ ९५ वायुपुराण की विषय सूची ८७० ९६ श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के अनुसार उसकी अनुक्रमणी ८७२ ९७ श्रीनारदीयपुराण की विषय सूची ८७४ ९८ मार्कण्डेयपुराण की विषयानुक्रमणी ८७६ ९९ अग्निपुराण की विषयानुक्रमणी ८७७
( ८ ) अध्याय विषय पृष्ठ संख्या १०० भविष्यपुराण की विषयानुक्रमणी ८७९ १०१ ब्रह्मवैवर्तपुराण की विषयानुक्रमणी ८८१ १०२ लिंगपुराण की विषयानुक्रमणी ८८३ १०३ वाराहपुराण की विषयानुक्रमणी ८८५ १०४ स्कन्दपुराण की विषयानुक्रमणी ८८६ १०५ वामनपुराण की विषयानुक्रमणी ८९८ १०६ कूर्मपुराण की विषयानुक्रमणी ९०० १०७ मत्स्यपुराण की विषयानुक्रमणी ९०२ १०८ गरुड़पुराण की विषयानुक्रमणी ९०४ १०९ ब्रह्माण्डपुराण की विषयानुक्रमणी ९०६ ११० बारह मासों का प्रतिपदाव्रत ९०९ १११ बारह मासों का द्वितीयाव्रत ९१३ ११२ बारह मासों का तृतीयाव्रत ९१५ ११३ बारह मासों का चतुर्थीव्रत ९२० ११४ बारह मासों का पंचमीव्रत ९२६ ११५ बारह मासों का षष्ठीव्रत ९३० ११६ बारह मासों का सप्तमीव्रत ९३४ ११७ बारह मासों का अष्टमीव्रत ९३९ ११८ नवमी सम्बन्धी व्रतों की विधि और महिमा ९४१ ११९ बारह मासों का दशमी व्रत ९४८ १२० बारह मासों का एकादशीव्रत तथा दशमी आदि तीन दिनों के पालनीय विशेष नियम ९५३ १२१ बारह मासों का द्वादशीव्रत ९५९ १२२ बारह मासों का त्रयोदशी-व्रत ९६७ १२३ वर्ष भर के चतुर्दशी-व्रतों की विधि और महिमा ९७३ १२४ बारह मासों की पूर्णिमा का व्रत-निरूपण ९७८ १२५ सनकादि और नारदजी का प्रस्थान, नारद पुराण का माहात्म्य वर्णन ९८५ ☉
प्रास्ताविक पुराण पुराण उस शास्त्र को कहते हैं, जो संसार की पूर्वावस्था का निरूपण करे, व्यास आदि मुनियों के द्वारा प्रणीत हो, वेदार्थों के वर्णन में निरत हो और 'सर्गश्च प्रतिसर्गश्च'—इत्यादि पाँच लक्षणों से युक्त हो । अर्थात् यह सृष्टि किससे किस प्रकार हुई ? इसका लय कहाँ और कैसे होगा ? सृष्टि के पदार्थों की उत्पत्ति का क्रम किस प्रकार है या मानव-जाति के प्रमुख ऋषि और राजा किस क्रम से अधिकारा रूढ़ हुए ? उनके चरित्र कैसे थे ? और इस सृष्टि एवं प्रलय के बीच समय कितना लगता है ?—इन पाँच बातों का ज्ञान जिस शास्त्र से प्राप्त हो, वही पुराण शास्त्र है । यह पुराण शास्त्र वेदों में भी उल्लिखित है । देखिए प्रमाण— 'ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं सह यजुषा । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिताः ।।' अथर्व० (का० ११।६।२४) तथा 'स बृहतीं दिशमनुव्यचलत्तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन् । इतिहासस्य च वै सपुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनाञ्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद' अथर्व० (का० १५ अनु० १ प्र० ६ मं० १२) । सामवेदीयगोपथब्राह्मण—'एवमिमं सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सेतिहासाः सान्वाख्याताः सपुराणाः सस्वराः इत्यादि गोपथपूर्वभाग (२ प्र०) । छान्दोग्योपनिषद्—'स होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम्' (छा० उ० प्र० ७ ख० १) । 'एवं विद्वान् वाकोवाक्यमितिहासः पुराणमित्यहरहः स्वाध्यायमधी- ते त एनं तृप्तास्तर्पयन्ति सर्वैः कामैः सर्वैर्भागैः' (शतपथब्रा० ११।५।७।६) । ऊपर के सभी वेद-वाक्यों में पुराण की चर्चा सुस्पष्ट है । अतएव जो लोग केवल वेद को ही मानते हैं, पुराण को नहीं, उन्हें इन वाक्यों का चिन्तन करना चाहिए । आगे हम बतायेंगे कि किसी माने में पुराण वेद से भी प्राचीन है । यह पुराणशास्त्र पूर्व काल में एक ही था १८ नहीं । जैसा कि मत्स्यपुराण के तिरपनवें अध्याय में कहा है— पुराणमेकमेवासीत्तदा कल्पान्तरेऽनघ । त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।। निर्दग्धेषु च लोकेषु वाजिरूपेण वै मया । अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणं न्यायविस्तरम् ।। मीमांसां धर्मशास्त्रं च परिगृह्य मया कृतम् । मत्स्यरूपेण च पुनः कल्पादावुदकार्णवे ।। अशेषमेतत्कथितमुदकान्तर्गतेन च । श्रुत्वा जगाद च मुनीन्प्रति देवश्चतुर्मुखः ।। अर्थात् हे निष्पाप ! दूसरे कल्प में एक ही पुराण था, जो धर्म और काम का साधक था और सौ करोड़ श्लोकों में उसका विस्तार था । जब सभी लोक दग्ध हो गये तब मैंने (भगवान् ने) अश्व का रूप धारण
( २ ) करके अंग समेत चार वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र को ग्रहण कर लिया । पुनः कल्प के आदि में मत्स्यरूप धारण करके मैंने जलार्णव में जल के भीतर ही अशेष वेद, पुराणादि को कह डाला, जिसे सुनकर ब्रह्मा ने मुनियों को बता दिया । इस प्रकार मत्स्यपुराण में मत्स्यावतार भगवान् ने उक्त बातें कहकर आगे किस-किस ने किस-किस को कौन-कौन पुराण सुनाया, यह कहा । इसी प्रकार रेवामाहात्म्य में भी कहा गया है— पुराणमेकमेवासीदस्मिन्कल्पान्तरे नृप । त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।। स्मृत्वा जगाद च मुनीन् प्रति देवश्चतुर्मुखः । प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्ततः ।। कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो नृप । व्यासरूपं विभुः कृत्वा संहरेत्स युगे युगे ।। चतुर्लक्षप्रमाणेने द्वापरे द्वापरे सदा । तदष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रभाष्यते ।। अद्यापि देवलोके तच्छतकोटिप्रविस्तरम् । तदर्थोऽत्र चतुर्लक्षसंक्षेपेण निवेशितः ।। पुराणानि दशाष्टौ च साम्प्रतं तदिहोच्यते ।' अर्थात् पहले सौ करोड़ श्लोकों में ग्रथित एक ही पुराण था । उसका स्मरण कर ब्रह्मा ने मुनियों को उपदेश दिया । तब सभी शास्त्रों और पुराणों की प्रवृत्ति हुई । राजन् ! पुराण का समय से ग्रहण करना दुष्कर समझकर भगवान् ने व्यास का रूप धारण करके प्रत्येक पुराण का संक्षेप कर दिया । प्रत्येक द्वापर में चार लाख श्लोकों के प्रमाण से उसे १८ भागों में परिणत किया । आज भी देवलोक में सौ करोड़ श्लोकों वाला पुराण विद्यमान है । उसके अर्थ को चार लाख श्लोकों में संक्षेप से सन्निविष्ट किया गया है । वही अठारह पुराणों के रूप में सम्प्रति उपलब्ध है । प्रस्तुत नारदीय पुराण में भी ब्रह्मा ने मरीचि से उक्त प्रकार की बातें कहीं हैं— शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् । यस्मिन्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ।। पुराणमेकमेवासीत् सर्वकल्पेषु मानद ।। चतुर्वर्गस्य बीजस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।। प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः । हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ।। तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ।। अस्यैव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते ।
( ३ ) इतना कहकर आगे अठारह पुराणों के नाम, संख्या आदि का वर्णन किया । इस प्रकार वेद-प्रतिपादित पुराण सर्वथा प्रामाणिक हैं और इनमें प्रतिपादित भगवान् के सगुणावतारों की कथायें भी वेदमूलक होने से प्रमाणिक हैं । वेदमंत्रों में अवतारों का उल्लेख है— जो लोग वेद को परम प्रमाण मानते हैं, किन्तु तन्मूलक अवतारवाद को नहीं मानते, उन्हें वेद-मंत्रों में अवतारों का उल्लेख देखकर निर्णय करना चाहिए— तैत्तिरीयसंहिता में वाराहावतार—‘आपो वा इदमग्रे सलिलमासीत्तस्मिन् प्रजापतिर्वायुर्भूत्वाऽचरत्स इमामपश्यत्तं वराहो भूत्वाऽहरत्’ । तैत्तिरीय ब्राह्मण में—‘स वराहो रूपं कृत्वोपन्यमज्जत स पृथिवीमध आर्छत्’ । ऐतरेय ब्राह्मण में परशुरामावतार—‘प्रोवाच रामो भार्गवेयो विश्वान्तरायः’ । छान्दोग्य में कृष्णावतार—‘कृष्णाय देवकीपुत्राय’ । तैत्तिरीयारण्यक में—‘नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।’ ऋग्वेद के विष्णु सूक्त में—‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ।’ प्र तद्विष्णुस्तव ते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेण्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ।’ उसी सूक्त में—‘इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे । त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् । शतपथब्राह्मण में—‘वामनो ह विष्णुरास तद्देवा न जिहीडिरे महद्वै नोऽदुर्यं नो यज्ञसंमितमदुरिति । रुद्र का वर्णन अथर्ववेद—११ काण्ड २ प्रपाठक ६६ मन्त्र में—‘नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः । बाहुभ्यामुत ते नमः ।।’ तैत्तिरीयारण्यक में—‘नमो हिरण्यबाहवे हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय हिरण्यपतयेऽम्बिकापतय उमापतये पशुपतये नमो नमः ।’ देवी का वर्णन ऋग्वेद और अथर्ववेद में—‘अहं रुद्रे- भिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ।’ इत्यादि । गणपति का वर्णन ऋग्वेद में—‘गणानां त्वा गणपतिं हवाहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे व्वसो मम । अहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ।’ इसी प्रकार सूर्यादि अन्य देवों का वर्णन भी मन्त्रों में मिलता है । अतएव वेदादि में ग्रथित देव- चरित्रों का उपवृंहण पुराणों में देखकर पुराणोक्त देवकथा को अमूल कहना हास्यास्पद है । मत्स्यपुराण ने स्पष्ट उद्घोष किया है कि ब्रह्मा ने सभी शास्त्रों से पहले पुराणशास्त्र का स्मरण किया, पश्चात् उनके मुख से वेद निकले— पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।। इससे पुराण की प्राचीनता वेद से भी अधिक सिद्ध होती है । इतना ही नहीं, प्रस्तुत नारदीय पुराण वेद के अर्थ से पुराण के अर्थ को कहीं अधिक मानता है और इसीलिए समग्र वेदों को पुराणों में ही प्रतिष्ठित स्वीकारता है— वेदार्थादधिकं मन्ये पुराणार्यं वरानने । वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेव सर्वदा ।। (ना० पु० २।२४।१७) फिर नारदीय पुराण वेद, स्मृति तथा पुराण के विषय तथा क्षेत्र के विभाग को दिखलाते हुए कहता है—वेद का क्षेत्र भिन्न-भिन्न है। वेद का प्रधान क्षेत्र है यज्ञकर्म का सम्पादन—इसी कार्य में वेद का महनीय
( ४ ) तात्पर्य है। गृहाश्रमियों के लिए स्मृति ही वेद है अर्थात् गृहस्थ के आचार-व्यवहार आदि के ज्ञान का प्रका- शक धर्मस्मृति ही है। ये दोनों प्रकार के ग्रन्थ पुराण में केन्द्रित रहते हैं। जिस प्रकार यह आश्चर्यमय जगत् उस पुराणपुरुष (नारायण भगवान्) से उत्पन्न हुआ है, उसी प्रकार समस्त वाङ्मय विस्तृत अर्थ में पुराण साहित्य से ही उत्पन्न हुआ है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं— शृणु मोहिनि मद्वाक्यं वेदोऽयं बहुधा स्थितः । यज्ञकर्म क्रिया वेदः स्मृतिर्वेदो गृहाश्रमे ।। स्मृतिर्वेदः क्रिया वेदः पुराणेषु प्रतिष्ठितः । पुराणपुरुषाज्जातं यथेदं जगदद्भुतम् । तथेदं वाङ्मयं सर्वं पुराणेभ्यो न संशयः ।। (ना० पु० २।२४।१५-१६) पुराण की सहायता वेद भी अपने रहस्य के उपबृंहण के निमित्त सर्वदा चाहता है। वह अल्प शास्त्रों के ज्ञाता से सदा डरा करता है कि वह मुझे मार न डाले— इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् । विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ।। (महाभारत) देवीभागवत तो पुराण को पुरुष का हृदय बताता है। इससे बढ़कर पुराण की महिमा क्या हो सकती है ?— श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् । एतत्त्रयोक्त एव स्याद् धर्मो नान्यत्र कुत्रचित् ।। (दे० भा० ११।१।२१) ऐसे महामहिमाशाली पुराण के कतिपय तथ्यों का रहस्य बिना समझे कुछ लोग अनर्गल दोषारोपण करते हैं। उनका उत्तर देना अनुपयुक्त न होगा। रहस्यानभिज्ञ लोगों का कहना है कि पुराणों में ब्रह्मा का दुहितृगमन, चन्द्रमा का गुरुपत्नीगमन, इन्द्र का अहल्यागमन आदि कतिपय प्रसंग अश्लील एवं अनर्थकारी होने से पुराण-साहित्य अपठनीय है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि पुराण-साहित्य समुद्र के समान दुस्तर है, किन्तु कल्याणकारी विषय-रत्न से भरपूर है। ऐसे लोगों को अपनी शंका का समाधान ढूंढ़ना चाहिए, न कि पुराणों पर आक्षेप करना चाहिए। उक्त शंकाओं का समाधान प्राचीनकाल में कुमारिल भट्ट ने अपने 'तन्त्रवार्तिक' में किया है और आधुनिककाल में माधवाचार्य ने 'पुराण-दिग्दर्शन' में और महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा ने 'पुराण-अनुशीलन, में किया है। शर्मा जी ने पहले 'ब्रह्मा का दुहितृगमन' प्रसंग का उत्तर इस प्रकार दिया है— 'श्रीमद्भागवत (३।१२।२८) में इस प्रकार आया है— वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयम्भूर्हरतीं मनः । अकामा चकमे सक्तः सकाम इति नः श्रुतम् ।।
( ५ ) किन्तु इस श्लोक के वास्तविक रहस्य को नहीं समझने के कारण ही अज्ञानी लोग गलत अर्थ के शिकार होते हैं । श्रीमद्भागवत का यह श्लोक ऋग्वेद की निम्नांकित ऋचा के आधार पर ही लिखा गया है— कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । अर्थात्, सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा को सर्वप्रथम अपने को बहुत रूपों में प्रकट करने की इच्छा हुई । ऐसी इच्छा 'काम' कहलाती है और वह 'काम' मन का रेत (वीर्य) है । इससे स्पष्ट है कि सृष्टि की कामना से पहले मन की उत्पत्ति होती है । और वह मन ही प्राणपूर्वक 'वाक्' को उत्पन्न करता है । इस कारण, मन प्रजापति कहलाया और वाक् मन की पुत्री कहलाई । फिर, मन ही उस 'वाक्' में अपना रस देता है, जो वाक् के साथ उसका समागम कहा गया है । मन की अपेक्षा वाक् सूक्ष्म होती है, अतः वह 'तन्वी' कही गई है । काम तो मन का ही धर्म है, अतः वाक् को 'अकामा' और मन को 'सकाम' कहा गया है । सृष्टि में सर्वप्रथम मन ही उत्पन्न हुआ, अतः वह 'स्वयम्भू' भी कहा जाता है । श्रीमद्भागवत के उक्त श्लोक के आगे वर्णन मिलता है कि मरीचि आदि मुनियों ने प्रजापति के इस कार्य का विरोध किया और प्रजापति ने भी शरीर त्याग दिया, जिससे 'नीहार' की उत्पत्ति हुई । इसका तात्पर्य यह होता है कि इच्छा को दबाना चाहिए, उसे वाणी के द्वारा प्रकट नहीं करना चाहिए । वाणी के द्वारा इच्छा जब प्रकट हो जाती है, तब वह मन नष्ट हो जाता है । इस तरह की सारी सृष्टि तमोगुण के आधिक्य से प्रकट होती है । ऐसे ही तमोगुण से नीहार की उत्पत्ति होती है । प्रजापति तो त्रिगुणात्मक है ही । उसके तीनों गुणों के ही कार्य सृष्टि में होते हैं । इस प्रसंग का दूसरा पक्ष ब्राह्मणग्रन्थों में दिया गया है— प्रजापतिर्वे स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् । दिवमित्यन्ये आहुः उषसमित्यन्ये ।। —ऐतरेयारण्यक । अर्थात्, "सूर्य का प्रकाश आने से पूर्व जो प्रभा फैलती है, वह उषा कहलाती है। वह उषा सूर्य से ही उत्पन्न होती है, इसलिए वह सूर्य की पुत्री कही जाती है ।" फिर, सूर्य ही उसमें प्रकाशरूप बीज देता है। यही रहस्य सूर्य का दुहितृगमन माना जाता है । सूर्य अपनी दुहिता उषा के पीछे-पीछे लगा रहता है और उषा सूर्य की कान्ति से ही पुष्ट होती है । इसका संकेत इस प्रकार मिलता है— सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात् । इसका भी तात्पर्य यही है कि जिस प्रकार कोई पति अपनी स्त्री के साथ-साथ घूमता है, उसी प्रकार सूर्य भी उषा के पीछे-पीछे चलता है । ऐतरेयारण्यक की तरह इस बात को ऐतरेय ब्राह्मण (१३।६) भी निम्नलिखित वाक्यों में स्पष्ट करता है— प्रजापतिः स्वां दुहितरमभ्यध्यायत् दिवमित्यन्ये उपसमित्येके इत्यादि । अर्थात्, “सूर्योदय से कुछ पूर्व जो प्रकाश आता है, उसे उषा कहते हैं । वह उषा सूर्य से ही पैदा होती है, इसलिए वह सूर्य की दुहिता मानी गई है ।” यहाँ भी उषा में सूर्य द्वारा प्रकाश दिये जाने के कारण उसे
( ६ )
वीर्य-दान माना गया है एवं सर्वत्र उषा आगे-आगे चलती है और सूर्य उसके पीछे लगा रहता है, यहां स्त्री का अनुगमन माना गया है। इसी प्रकार 'चन्द्रमा का गुरुपत्नीगमन' प्रसंग का उत्तर देखिए— चन्द्रमा का अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी के साथ सहवास का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। उस पर भी स्वभावतः यह आशंका होती है कि देवता होते हुए भी चन्द्रमा ने ऐसा क्यों किया ? परन्तु इस आख्या- यिका का भी नक्षत्र-परक अर्थ आकाशविज्ञान के विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है। गुरु का अर्थ है—बृहस्पति । पहले के ज्योतिर्विद् विद्वान् बृहस्पति के ही सम्बन्ध से गणना आरम्भ करते थे। बाद के ज्योतिर्विदों ने चन्द्रमा के अनुसार गणना प्रारम्भ कर दी। बृहस्पति के अनुसार जो तारा- गणना होती है, वही चन्द्रमा के अनुसार भी उत्पन्न हो जाती है, जिसे पौराणिक आख्यान की शैली में कहा गया कि बृहस्पति की तारा चन्द्रमा ने छीन ली। इस प्रकार से सभी आख्यान केवल तारा-मण्डल के वर्णन-स्वरूप हैं, इसमें अश्लीलता की कोई बात नहीं। इसी तरह 'इन्द्र का अहल्या' प्रसंग भी प्रतीकात्मक आख्यान है। इन्द्र-अहल्या का समागम भी इसी प्रकार एक प्रतीकात्मक आख्यान है। इस प्रतीकात्मक आख्यान को समझने के पहले 'अहल्या' और 'गौतम'— इन शब्दों का रहस्यार्थ जान लेना आवश्यक है। व्याकरण की रीति से 'अहल्या' शब्द का अर्थ होता है— अह्ना यम्यते, अहो यमयति वा सा अहल्या । अर्थात् जो रात्रि के द्वारा समाप्त किया जाय अथवा जिसको दिन समाप्त करे, वह अहल्या है। अतः, 'अहल्या' नाम रात्रि का हुआ। इसी प्रकार 'गौतम' शब्द का अर्थ होता है— गौ = पृथ्वी से प्रादुर्भूत होने वाली काली किरणें। पृथ्वी से काली ही किरणें निकला करती हैं और वे प्रकाश से दब जाती हैं, इसलिए वे किरणें लोक में प्रतीत नहीं होतीं। इस आख्यान में कहा गया है कि इन्द्र अहल्या के पास जब गया, तब उसने चन्द्रमा को कुक्कुट पक्षी बनाया। इतना तो सभी जानते हैं कि चन्द्रमा के दो पक्ष होते हैं, इसीलिए वह पक्षी कहा गया है। इन्द्र प्रकाश का देवता है, जिसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है— यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । अर्थात्, जिस प्रकार पृथिवी अग्निगर्भा है, उसी प्रकार अन्तरिक्ष इन्द्र के द्वारा गर्भवान् बना हुआ है। अतः इन्द्र प्रकाश का देवता है। दिन में तो प्रकाश का साम्राज्य रहता ही है, किन्तु अहर्या, अर्थात् रात्रि में जब इन्द्र अर्थात् प्रकाश का देवता जाने लगा, तब उसने चन्द्रमा का आधार लिया। इसी आधार के लिए उसने चन्द्रमा को पक्षी बनाया। यह तो बिलकुल स्पष्ट है कि चन्द्रमा अपने दो पक्षों के द्वारा ही प्रकाश ग्रहण करता है और देता है। चन्द्रमा के बिना अहल्या (रात्रि) इन्द्र (प्रकाश) को प्राप्त नहीं कर सकती, अर्थात् प्रकाश (इन्द्र) ही रात्रि के पास जा सकता है। अतः इस तरह प्रकाश का देवता इन्द्र चन्द्रमा के साहाय्य से अहल्या-रात्रि के साथ समागम करता है और यह समागम पूर्णिमा के दिन पूर्ण रूप से होता है। कथा में वर्णित है कि जब 'गौतम' रात समझकर लौट आये, तब अपनी स्त्री के पास इन्द्र को देखकर उन्होंने शाप दिया कि जा दुष्ट, तू ने भग के लिए ऐसा दुराचार किया है अतः तू सहस्र-भग हो जा। 'सहस्रभग' का अर्थ होता है—सहस्रेषु भेषु नक्षत्रेषु गच्छति, अर्थात् हजार ताराओं में गमन करके टिमटिमाने वाला। यही कारण है कि इन्द्र सहस्र नेत्र वाला कहा जाता है। वहाँ 'भग' नेत्र-रूप में परिणत मान लिये गये हैं। इस प्रकार यह भी ताराओं का या देवताओं का पौराणिक भाषा में चरित्र-चित्रण किया गया है। इसमें आक्षेप-योग्य कोई बात नहीं है। ऋषि ने अपनी स्त्री को शिला हो जाने का शाप दिया, उसका आशय है कि
( ७ ) सूर्यास्त के समय जगत् की स्थिति पाषाण-जैसी ही रहती है। अर्थात्, उस समय न प्रकाश ही रहता है, न गौतम अर्थात् अन्धकार ही। इसी प्रकार राजपत्नी का अश्व के साथ शयन, विष्णु-वृन्दा-वृत्तान्त, अगस्त्य का समुद्र-पान आदि का रहस्य न जानने से लोग आशंका करते हैं। इन सबका उत्तर 'पुराण-परिशीलन' में द्रष्टव्य है। अतएव पूर्ण जानकारी के बिना अल्प ज्ञान के आधार पर पुराणों पर छींटाकशी करना अनुचित है। पुराण-साहित्य महनीय है। पुराणों से ही भारतीय जीवन का आदर्श, भारत की सभ्यता, संस्कृति तथा भारत के विद्या-वैभव के उत्कर्ष का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। पुराण न केवल साहित्य हैं अपितु इनमें विश्वकल्याणकारी त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) उन्नति का मार्ग भी प्रदर्शित किया गया है। अतएव दुराग्रह एवं पक्षपात से रहित होकर पुराण-साहित्य का अध्ययन करना सबके लिए कल्याणकारी है। आगे अब प्रस्तुत पुराण का परिचय दिया जा रहा है। पुराण-रचयिता अष्टादशपुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः (महाभारत, आदिपर्व), अष्टादश पुराणानां वक्ता सत्यवती- सुतः (शिवपुराण, रेवाखण्ड)—इत्यादि प्रमाणों से अठारहों पुराणों के रचयिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास माने जाते हैं। स्वयं ब्रह्मा प्रत्येक द्वापर युग के अन्त में और कलियुग के आरम्भ में व्यास के रूप में अवतीर्ण होकर अष्टादशपुराणों को सम्पादित, निर्मित एवं ग्रन्थित करते हैं। इस वाराहकल्प में द्वापर युगों की संख्या के अनुसार अब तक २८ व्यास हो चुके हैं। अन्तिम व्यास का नाम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास था जिनकी अवशिष्ट शास्त्र-कृतियाँ आज सौभाग्यवश हमें प्राप्य हैं। २६ वें द्वापर में अर्थात् आगामी समय मे जो व्यास होंगे, उनका नाम होगा श्री अश्वत्थामा व्यास। श्रीव्यास जी का परिचय हमारे पुरातन साहित्य में विस्तार के साथ आया है। संक्षेप में व्यास का स्वरूप समझ लेना ही यहाँ पर्याप्त है। पुराणवर्म में पं० कालूराम शास्त्री ने लिखा है— व्यास कोई एक व्यक्ति नहीं होता, प्रत्येक द्वापर में नवीन व्यास हुआ करते हैं। व्यास किसी का नाम नहीं, किन्तु पदवी है। गोलवृत्त में जो एक सीधी रेखा निकल जाती है, उसका नाम व्यास है। इसी प्रकार वेदवृत्त में जो सीधा निकल जाय उसका नाम वेदव्यास है। जितने व्यास हुए हैं, वे वेद और पुरातत्त्व के पूर्ण ज्ञाता हुए हैं। नारदीयपुराण नारदोक्त पुराण ही 'नारदीय' नाम से प्रख्यात है—'नारदोक्तं पुराणं तु नारदीयं प्रचक्षते' (शिवउप- पुराण) नारद ने बृहत्कल्पप्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, वही २५००० श्लोकों में ग्रथित होकर नारदीयमहापुराण बना है— यत्राह नारदो धर्मान् बृहत्कल्पाश्रयाणि च । पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते ॥ (मत्स्यपुराण ५३।२३) किन्तु वर्तमान नारदीयपुराण में ३००० श्लोकों की कमी है, २२००० श्लोक ही मिलते हैं। इस पुराण के पूर्वभाग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—इन चार ब्रह्मपुत्रों का ब्रह्मपुत्र नारद के प्रति कथन है। किन्तु ऐसा भी माना जाता है कि नारद का ही अपने उक्त चारों भाइयों के प्रति कथन है, ऊपर आये हुए शिवउपपुराण और मत्स्यपुराण के वचनों से यही सिद्ध होता है। नारदीयपुराण में क्या विषय है ? इसका संक्षेप में इसी पुराण ने उत्तर दे दिया है—
पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहच्चित्रकथाश्रयम् ।
( ८ ) शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं नारदीयकम् । पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहच्चित्रकथाश्रयम् । पूर्वभाग—प्रथमपाद में— सूतशौनकसंवादः सृष्टिसंक्षेपवर्णनम् । नानाधर्मकथाः पुण्याः प्रवृत्तेः समुदाहृताः । प्राग्भागे प्रथमे पादे सनकेन महात्मना ।। पूर्वभाग-द्वितीयपाद में— द्वितीये मोक्षधर्माख्ये मोक्षोपायनिरूपणम् । वेदाङ्गानाञ्च कथनं शुकोत्पत्तिश्च विस्तरात् । सनन्दनेन गदिता नारदाय महात्मने ।। पूर्वभाग-तृतीयपाद में— महातन्त्रे समुद्दिष्टं पशुपाशविमोक्षणम् । मन्त्राणां शोधनं दीक्षा मन्त्रोद्धारश्च पूजनम् ।। प्रयोगाः कवचं चैव सहस्रं स्तोत्रमेव च । गणेशसूर्यविष्णूनां शिवशक्त्योरनुक्रमात् । सनत्कुमारमुनिना नारदाय तृतीयेके ।। पूर्वभाग-चतुर्थपाद में— पुराणलक्षणञ्चैव प्रमाणं दानमेव च । पृथक् पृथक् समुद्दिष्टं दानकालपुरः सरम् ।। चैत्रादिसर्वमासेषु तिथीनां च पृथक् पृथक् । प्रोक्तम्प्रतिपदादीनां व्रतं सर्वाघनाशनम् ।। पूर्वभागोऽयमुदितो बृहदाख्यानसंज्ञितः ।। उत्तरभाग में— अस्योत्तरे विभागे तु प्रश्न एकादशीव्रते । वशिष्ठेनाथ संवादो मान्धातुः परिकीर्तितः ।। रुक्माङ्गदकथा पुण्या मोहिन्युत्पत्तिकर्म च । वसुशापश्च मोहिन्यै पश्चादुद्धरणक्रिया ।। गंगाकथा पुण्यतमा गयायात्रानुकीर्तनम् । काश्या माहात्म्यमतुलम्पुरुषोत्तमवर्णनम् ।। यात्राविधानं क्षेत्रस्य बहु वाख्यानसमन्वितम् । प्रयागस्याथ माहात्म्यं कुरुक्षेत्रस्य तत्परम् ।। हरिद्वारस्य चाख्यानं कामोदाख्यानकन्तथा । बदरीतीर्थमाहात्म्यं कामाख्यायास्तथैव च ।।
प्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा ।
प्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा । गौतमाख्यानकं पश्चाद् वेदपादस्तवस्ततः ॥ गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं नर्मदातीर्थवर्णनम् । अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् । वृन्दावनस्य महिमा वसोर्द्धान्तिके गतिः । फलश्रुति-- यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥ यस्त्वेतादिषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकाचितम् । प्रदद्याद् द्विजवर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥ यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् । शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गगतिं लभेत् ॥ (ना० पु० पूर्वभाग, अ० ६७) इस प्रकार नारदीयपुराण ने जहाँ अपने विषयों की अनुक्रमणी दी है वहीं अठारहों पुराणों की भी विस्तृत विषयानुक्रमणिका प्रस्तुत की है। यह अनुक्रमणी सभी पुराणों के विषयों को जानने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसकी सहायता से हम वर्तमान पुराणों के मूलरूप तथा प्रक्षिप्त अंश की छानबीन बड़ी सुग- मता से कर सकते हैं। इस पुराण में विविध ज्ञान-विज्ञान की बातें, अनेक इतिहास-गाथायें, गोपनीय अनुष्ठान आदि का वर्णन, धर्मनिरूपण तथा भक्तिमहत्त्वपरक विलक्षण कथायें, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, मन्त्र-विज्ञान आदि का अलौकिक और महत्त्वपूर्ण व्याख्यान संगृहीत है। यद्यपि सभी पुराण श्रीहरि के स्वरूप ही हैं। फिर भी छह पुराण सात्त्विक माने जाते हैं। वे ये हैं— वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं शुभम् । गारुडं च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शने ॥ सात्त्विकानि पुराणानि विज्ञेयानि शुभानि वै । (पद्मपुराण उत्तरखण्ड, २६३।८२-८३) अतएव नारदीय पुराण सात्त्विक पुराण है। इसमें परात्पर ब्रह्म विशुद्ध सत्त्वमूर्ति श्रीहरि की लीलाओं का गायन हुआ है। यह पुराण 'भक्त्या तुष्यति माधवो न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः' इस सिद्धान्त का परि- पोषक है। यह कहता है— यथा भूमि समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥ (पूर्वभाग ४।५) किन्तु इस पुराण की दृष्टि में भक्ति के साथ वर्णाश्रमधर्म एवं शास्त्रोक्त कर्त्तव्यों का पालन भी अत्या- वश्यक है। सदाचारपरायण, भवाचारत्यागी भक्त पर भगवान् कभी प्रसन्न नहीं होते—
( १० ) हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानरतोऽपि वा । भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात् पतितः सोऽभिधीयते ।। वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तमम् ।। (पूर्व० ४, २४-२५) यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति । न तस्य तुष्यते विष्णुश्चारेणैव तुष्यति ।। तस्मात् कार्या हरेर्भक्तिः स्वधर्मस्याविरोधिनी । स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतैव प्रकीर्तिता ।। (पूर्व० १५, १२३, १२४) यह पुराण एकादशी व्रत के अनुष्ठान का माहात्म्य बड़े विस्तार से प्रभावक शब्दों में वर्णन करता है। यहाँ परम वैष्णव रुक्मांगद राजा का उल्लेख है, जिन्होंने अपने राज्य में आठ वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष वय वाले व्यक्तियों के लिए आदेश जारी कर रखा था कि इनमें जो एकादशी का व्रत नहीं करेगा वह वध्य माना जाएगा। यह पुराण अग्निपुराण तथा गरुड़पुराण के समान समस्त विद्याओं का प्रतिपादन करने वाला विश्व- कोश के समान है। इन विद्याओं के प्रतिपादक किसी मान्य ग्रन्थ का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत किया गया है कृतज्ञता-ज्ञापन लगभग ४० वर्ष पहले नारदीयपुराण (आनन्दाश्रम पूना संस्करण) का अपूर्ण हिन्दी अनुवाद हमने किया था। उसके बाद सम्मेलन में शासनतन्त्र बदल जाने से बहुत वर्षों तक पुराण-कार्य स्थगित रहा। पुनः श्री प्रभात शास्त्री के प्रशासनकाल में यह कार्य पुनरुज्जीवित हुआ। शास्त्री जी का दृढ़संकल्प है कि वे जब तक सम्मेलन में रहेंगे तब तक पुराणों का प्रकाशन निर्बाध गति से चलता रहेगा। उनके इस सत्य संकल्प के लिए जितना साधुवाद और धन्यवाद दिया जाय, वह कम ही होगा। शास्त्रीजी ने मुझे इस पुण्य कार्य का भार सौंपा, अतः मैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ऊपर संकेत के अनुसार मुझे अपूर्ण हिन्दी अनुवाद को पूर्ण करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा; कारण जिस संस्करण से इसका अनुवाद किया था, वह संस्करण प्रेस में देने से पूर्व मुझे नहीं मिला। नारदीय- पुराण की खोजबीन करने पर प्रयागस्थ पं० श्री महादेवप्रसाद पाठक'वैद्य जी से नारदीय पुराण (बम्बई संस्करण) की एक प्रति प्राप्त हुई। उसकी 'फोटो स्टेट' कापी कराकर हमने प्रेस में दी। पाठकजी की इस उदारता के लिए हम उनके प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं। अनुवाद-कार्य को पूर्ण करने में मुझे कल्याण के 'नारद विष्णु पुराण अंक' से बहुत सहायता मिली। अतः मैं 'कल्याण' के कर्णधारों के प्रति अपनी हार्दिक कार्तज्ञ्य ज्ञापित करता हूँ। जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया है कि इसका अनुवाद पूना संस्करण से और संशोधन बम्बई संस्करण से किया गया है, इससे कुछ स्थलों पर पाठभिन्नता के कारण भावानुवाद ही करना पड़ा। कुछ कारणवश मंत्र-संशो- धन और मन्त्रोद्धार भी सब जगह नहीं कर सका। इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूँ। यदि इसके दूसरे संस्करण तक मैं क्रियाशील रहा तो इस कमी को पूर्ण करने का भरसक प्रयास करूँगा। 'करकृतमपराधं क्षन्तुम- र्हन्ति सन्तः' इस अभ्यर्थना के साथ अपना निवेदन समाप्त करता हूँ। मौनी अमावास्या सन् १९८६ निवेदक तारिणीश झा
ॐ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीनारदीयपुराणम् पूर्वार्द्धम् अथ प्रथमोऽध्यायः ओं नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥१॥ ओं वेदव्यासाय नमः ॥ वन्दे वृन्दावनासीनमिन्दिरानन्दमन्दिरम् । उपेन्द्रं सांद्रकारुण्यं परानन्दं परात्परम् ॥१॥ ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यं यस्यांशा लोकसाधकाः । तमादिदेवं चिद्रूपं विशुद्धं परमं भजे ॥२॥ शौनकाद्या महात्मान ऋषयो ब्रह्मवादिनः । नैमिषाख्ये महारण्ये तपस्तेपुर्मुमुक्षवः ॥३॥ जितेन्द्रिया जिताहाराः सन्तः सत्यपराक्रमाः । यजन्तः परया भक्त्या विष्णुमाद्यं सनातनम् ॥४॥ अनीर्ष्याः सर्वधर्मज्ञा लोकानुग्रहतत्पराः । निर्ममा निरहंकाराः परस्मिन् रतमानसाः ॥५॥ न्यस्तकामा विवृजिनाः शमादिगुणसंयुताः । कृष्णाजिनोत्तरीयास्ते जटिला ब्रह्मचारिणः ॥६॥ अध्याय १ पुरुषोत्तम नर और नारायण तथा भगवती सरस्वती देवी को नमस्कार करके जय शब्द का उच्चारण करना चाहिए ॥१॥ वृन्दावन में बैठे हुए, लक्ष्मी के आनन्द के धाम, इन्द्र के छोटे भाई, करुणापूर्ण, परानन्दस्वरूप, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक भगवान् की मैं वन्दना करता हूँ । जिस परब्रह्म के लोक-साधक देव अंश रूप हैं, उस चित्स्वरूप, विशुद्ध, परम तत्त्व, आदि देव का मैं भजन करता हूँ ॥२॥ प्राचीन काल में मुक्ति की कामना से शौनक आदि ब्रह्मवादी ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्र में तपस्या करते थे । वे ऋषि जितेन्द्रिय, परमव्रती, सत्यसन्ध और अपनी उत्कृष्ट भक्ति से आद्य सनातन भगवान् विष्णु की उपासना में रत थे ॥३॥ वे ईर्ष्या से रहित, अखिल धर्मों के मर्मज्ञ, लोक-कल्याण में निरत, निर्मम, निरभिमान और परब्रह्म के ध्यान में मग्न रहते थे । अपनी सम्पूर्ण भौतिक कामनाओं को छोड़कर, शम आदि गुणों से युक्त होकर वे जटाधारी ब्रह्मचारी कृष्णमृगचर्म को ही धारण करते थे ॥६॥ फा०—१