बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४८ नारदीयपुराणम् इत्युक्तवा विष्णुदूतास्ते छित्त्वा पाशांस्तदैव हि। आरोप्यावां विमानाग्र्यंययु विष्णोः परं पदम् ॥७७॥ तत्र सामीप्यमापन्नौ देवदेवस्य चक्रिणः। दिव्यान्भोगान्भुक्त्तवन्तौ तावत्कालं मुनीश्वर ॥७८॥ दिव्यान्भोगॉस्तु तत्रापि भुक्त्वा यातौ महीमिमाम्। अत्रापि संपदतुला हरिसेवाप्रसादतः ॥७९॥ अनिच्छया कृतेनापि सेवनेन हरेर्मुने। प्राप्तमीदृक् फलं विप्र देवानामपि दुर्लभम् ॥८०॥ इच्छयाराध्य विश्वेशं भक्तिभावेन माधवम्। प्राप्स्यावः परमं श्रेय इति हेतुर्निरूपितः ॥८१॥ अवशेनापि यत्कर्म कृतं स्यात्सुमहत्फलम्। जायते भूमिदेवेन्द्र किं पुनः श्रद्धया कृतम् ॥८२॥ एतदुक्तं निशम्यासौ स मुनींद्रो विभाण्डकः। प्रशस्य दम्पती तौ तु प्रययौ स्वतपोवनम् ॥८३॥ तस्माज्जानीहि देवर्षे देवदेवस्य चक्रिणः। परिचर्या तु सर्वेषां कामधेनूपमा स्मृता ॥८४॥ हरिपूजापराणां तु हरिरेव सनातनः। ददाति परं श्रेयः सर्वकामफलप्रदः ॥८५॥ य इदं पुण्यमाख्यानं सर्वपापप्रणाशनम्। पठेच्च शृणुयाद्वापि सोऽपि याति परां गतिम् ॥८६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सुमतिभूपकथावर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥२०॥
यह कह कर उन विष्णुदूतों ने तत्काल यम पाश को तोड़ डाला और हम दोनों को उत्तम विमान पर बैठाकर विष्णु के परम लोक में पहुँचा दिया। मुनीश्वर ! वहाँ हमको देवाधिदेव चक्रधर विष्णु की सामीप्य-मुक्ति प्राप्त हुई, उचित समय तक दिव्य भोगों का भी भोग किया। वहाँ से दिव्य भोगों को भोग कर इस पृथ्वी पर आया और यहाँ भी हरि-सेवा के प्रसाद से अतुल सम्पत्ति प्राप्त हुई ॥७७-७९॥ मुने ! इच्छा के बिना भी की गई हरि भक्ति के कारण यह देव-दुर्लभ फल प्राप्त हुआ तो इच्छा से भक्तिभावपूर्वक माधव की आराधना कर परम श्रेय हम प्राप्त प्राप्त करेंगे, यह कारण बता दिया। भूदेवेन्द्र ! जब अनिच्छा से भी किये हुए कर्म से ऐसा उत्तम फल मिलता है तब श्रद्धा से किये हुए कर्मों का क्या फल होगा, इसके विषय में क्या कहा जाय ? ॥८०-८२॥ वे मुनीन्द्र विभांडक सुमति की कही हुई इन बातों को सुनकर उन दोनों पति-पत्नियों के भाग्य को प्रशंसा कर अपने तपोवन को चले गए। इसलिए, देवर्षि नारद ! देवाधिदेव चक्रधर की सेवा सबको कामधेनु के समान फल देने वाली कही गयी है, ऐसा जानो। विष्णुपुजापरायण भक्तों को स्वयं सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले सनातन हरि ही परम श्रेय प्रदान करते हैं। जो सब पापों को नष्ट करने वाली इस पुण्य कथा को सुनता है अथवा पढ़ता है वह भी परा गति को प्राप्त करता है ॥८३-८६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में सुमति भूप की कथा का वर्णन नामक बीसवां अध्याय समाप्त ॥२०॥