भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

एकविंशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद्व्रतं प्रवक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः । दुर्लभं सर्वलोकेषु विख्यातं हरिपञ्चकम् ॥१॥ नारीणां च नराणां च सर्वदुःखनिवारणम् । धर्मकामार्थमोक्षाणां निदानं मुनिसत्तम ॥२॥ सर्वाभीष्टप्रदं चैव सर्वव्रतफलप्रदम् । मार्गशीर्षे सिते पक्षे दशम्यां नियतेन्द्रियः ॥३॥ कुर्यात्स्नानादिकं कर्म दन्तधावनपूर्वकम् । कृत्वा देवार्चनं सम्यक्तथा पञ्च महाध्वरान् ॥४॥ एकाशी च भवेत्तस्मिन् दिने नियममास्थितः । ततः प्रातः समुत्थाय ह्येकादश्यां मुनीश्वर ॥५॥ स्नानं कृत्वा यथाचारं हरिं चार्चयेद्गृहे । स्नापयेद्देवदेवेशं पञ्चामृतविधानतः ॥६॥ अर्चयेत्परया भक्त्या गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैस्ताम्बूलैश्च प्रदक्षिणैः ॥७॥ संपूज्य देवदेवेशमिमं मन्त्रमुदीरयेत् । नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानदाय नमोऽस्तु ते ॥८॥ नमस्ते सर्वरूपाय सर्वसिद्धिप्रदायिने । एवं प्रणम्य देवेशं वासुदेवं जनार्दनम् ॥६॥ वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण ह्युपवासं समर्पयेत् । पञ्चरात्रं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव ॥१०॥ त्वदाज्ञया जगत्स्वामिन्ममाभीष्टप्रदो भव । एवं समर्प्य देवस्य उपवासं जितेन्द्रियः ॥११॥ रात्रौ जागरणं कुर्यादेकादश्यामथो द्विज । द्वादश्यां च त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां जितेन्द्रियः ॥१२॥ पौर्णमास्यां च कर्तव्यमेवं विवर्चनं मुने । एकादश्यां पौर्णमास्यां कर्तव्यं जागरं तथा ॥१३॥ अध्याय २१ हरिपंचरात्रव्रत का वर्णन सनक बोले-- नारद ! दूसरे व्रत को यथार्थ रूप से कह रहा हूँ सुनो। हरिपंचक व्रत परम दुर्लभ और सब लोकों में प्रसिद्ध व्रत है। मुनिवर्य ! यह व्रत नर-नारी सबके दुःखों को दूर करने वाला, धर्म, अर्थ, काम मोक्ष का एकमात्र कारण है ॥१-२॥ सब मनोरथों और सब व्रतों के फल को देने वाला है। अगहन महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को इन्द्रिय संयम पूर्वक दातौन, स्नान आदि नित्य कर्म तथा भली भाँति पंचमहायज्ञ और देवार्चन कर के उस दिन नियमपूर्वक एकाहार व्रत करे। मुनीश्वर ! दूसरे दिन एकादशी को प्रातः काल उठकर स्नान करे और आचारानुकूल घर पर ही विष्णु को पूजा करे, देवदेवेश को विधि पूर्वक पंचामृत से स्नान करावे और अत्यन्त श्रद्धा से पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल से क्रमशः पूजन कर प्रदक्षिणा करे ॥३-७॥ देवदेवेश की पूजा कर आगे कहे गए मन्त्रों का उच्चारण करे। मन्त्र-- 'ज्ञान रूप को नमस्कार है, ज्ञानदाता को नमस्कार हैं, सर्वरूप, सब सिद्धियों को देने वाले को नमस्कार करता हूँ' इस प्रकार देवेश, वासुदेव, जनार्दन को प्रणामकर आगे कहे गये मन्त्र से अपने उपवास व्रत को भगवदर्पण करे 'केशव ! आज से तुम्हारी आज्ञा से पाँच रात्रि तक निराहार रहूँगा, जगन्नाथ ! मेरे मनोरथों को प्रदान कीजिए, द्विज ! वह जितेन्द्रिय इस प्रकार भगवान् को अपना उपवास व्रत अर्पित कर एकादशी की रात्रि में जागरण करे। मुने ! इसी प्रकार द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को वह संयमी व्रती विष्णु को पूजा करे। एकादशी और पूर्णिमा को जागरण करना चाहिए और पाँचों दिन पंचामृत आदि से सामान्य रूप से पूजा करनी चाहिए, परन्तु पूर्णिमा के दिन अपनी शक्ति के अनुसार दूध