भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

१५० नारदीयपुराणम् पञ्चामृतादिपूजा तु सामान्या दिनपञ्चसु । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णुं पौर्णमास्यां तु शक्तितः । तिलहोमश्च कर्त्तव्यस्तिलदानं तथैव च ॥१४॥ ततः षष्ठे दिने प्राप्ते निर्वर्त्य स्वाश्रमक्रियाम् । संप्राश्य पञ्चगव्यं च पूजयेद्विधिवद्धरिम् ॥१५॥ ब्राह्मणाम्भोजयेत्पश्चाद्विभवे सत्यवारितम् । ततः स्वबन्धुभिः सार्द्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥१६॥ एवं पौषादिमासेषु कार्त्तिकान्तेषु नारद । शुक्लपक्षे व्रतं कुर्यात्पूर्वोक्तविधिना नरः ॥१७॥ एवं संवत्सरं कार्यं व्रतं पापप्रणाशनम् । पुनः प्राप्ते मार्गशीर्षे कुर्यादुद्यापनं व्रती ॥१८॥ एकादश्यां निराहारो भवेत्पूर्वमिव द्विज । द्वादश्यां पञ्चगव्यं च प्राशयेत्सुसमाहितः ॥१९॥ गन्धपुष्पादिभिः सम्यग्देवदेवं जनार्दनम् । अभ्यर्च्योपायनं दद्याद्ब्राह्मणाय जितेन्द्रियः ॥२०॥ पायसं मधुसंमिश्रं घृतयुक्तं फलान्वितम् । सुगन्धजलसंयुक्तं पूर्णकुम्भं सदक्षिणम् ॥२१॥ वस्त्रेणाच्छादितं कुम्भं पञ्चरत्नसमन्वितम् । दद्यादध्यात्मविदुषे ब्राह्मणाय मुनीश्वर ॥२२॥ सर्वात्मन् सर्वभूतेश सर्वव्यापिन्सनातन । परमान्नप्रदानेन सुप्रीतो भव माधव ॥२३॥ अनेन पायसं दत्वा ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । शक्तितो बन्धुभिः सार्द्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२४॥ व्रतमेतत्तुयः कुर्याद्धरिपञ्चकसंज्ञितम् । न तस्य पुनरावृत्तिर्ब्रह्मलोकात्कदाचन ॥२५॥ व्रतमेतत्प्रकर्त्तव्यमिच्छद्भिर्मोक्षमुत्तमम् । समस्तपापकान्तारदावानलसमं द्विज ॥२६॥ गवां कोटिसहस्राणि दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात् । तत्फलं लभ्यते पुम्भिरेतस्मादुपवासतः ॥२७॥ यस्त्वेतच्छृणुयाद्भक्त्या नारायणपरायणः । स मुच्यते महाघोरैः पातकानां च कोटिभिः ॥२८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षशुक्लैकादशीमारभ्य पञ्चरात्रिव्रतं नामैकविंशोऽध्यायः ॥२१॥ से भगवान् को नहलाना चाहिए । तिल का हवन और तिल का दान भी यथा शक्ति करना श्रेयस्कर है ॥८-१४॥ तदनन्तर छठे दिन अपनी नित्य क्रिया से निवृत्त हो, पंचगव्य का पान कर विधिवत् हरि की पूजा करनी चाहिए । पूजा के अनन्तर विभवानुकूल अनिवार्य रूप से ब्राह्मण भोजन करावे । पश्चात् स्वयं अपने भाई-बन्धुओं के साथ मौन होकर भोजन करे। नारद ! इस प्रकार पौष आदि मासों में तथा कार्तिक के अन्त में प्रति शुक्ल पक्ष में पूर्वोक्त विधि से व्रत करे ॥१५-१७॥ इस प्रकार एक वर्ष तक इस पापनाशक व्रत का अनुष्ठान करे, पुनः अगहन आने पर व्रती व्रतोद्यापन करे । द्विज ! पूर्व की ही भाँति एकादशी को निराहार रहे, द्वादशी के दिन सावधान होकर पंचगव्य पान करे । गंध, पुष्प आदि से देवाधिदेव जनार्दन की पूजा कर वह जितेन्द्रिय ब्राह्मणों को उपहार दे ॥१८-२०॥ मुनीश्वर अध्यात्मज्ञानी विद्वान् ब्राह्मण को मधु, घृत और फल के सहित खीर, सुगन्धित जल से भरा दक्षिणा सहित पूर्ण कलश और वस्त्र से ढँक कर पंचरत्न सहित एक कलश देना चाहिए । सर्वात्मन् ! सर्वभूतेश ! सर्वव्यापक ! सनातन ! माधव ! इस उत्तम अन्न के दान से प्रसन्न होइए, इस मन्त्र से खीर का दान करने के बाद शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को खिलावे, स्वयं भी शान्त होकर भाई बन्धुओं के साथ भोजन करे । इस हरिपंचक नामक व्रत का जो अनुष्ठान करता है, वह कभी भी ब्रह्मलोक से नहीं लौटता ॥२१-२५॥ द्विज ! उत्तम मोक्ष पाने की इच्छा करने वाले को अवश्य यह व्रत करना चाहिए, यह व्रत समस्त पाप रूपी महावन के लिए दावानल के समान है। सहस्र कोटि गौओं के दान से जो फल मिलता है वह फल इस उपवासव्रत से मनुष्यों को प्राप्त होता है । जो नारायण की सेवा में तल्लीन रहकर भक्ति पूर्वक इस व्रत कथा को सुनता है, वह करोड़ों घोर महापापों से मुक्त हो जाता है ॥२६-२८॥ “श्रीनारदीयमहापुराण में पंचरात्रव्रतकथन नामक इक्कीसवां अध्याय समाप्त ॥२१॥