बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वांविशोऽध्यायः सनक उवाच अन्यद् व्रतवरं वक्ष्ये तच्छृणुष्व समाहितः । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वलोकोपकारकम् ॥१॥ आषाढे श्रावणे वापि तथा भाद्रपदेऽपि च । तथैवाश्विनके मासे कुर्यादेतद्व्रतं द्विज ॥२॥ एतेष्वन्यतमे मासे शुक्लपक्षे जितेन्द्रियः । प्राशयेत्पञ्चगव्यं च स्वपेद्विष्णुसमीपतः ॥३॥ ततः प्रातः समुत्थाय नित्यकर्म समाप्य च । श्रद्धया पूजयेद्विष्णुं वशीक्रोधविवर्जितः ॥४॥ विद्वद्भिः सहितो विष्णुमर्चयित्वा यथोचितम् । संकल्पं तु ततः कुर्यात्स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥५॥ मासमेकं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव । मासान्तं पारणं कुर्वे देवदेव तवाज्ञया ॥६॥ तपोरूप नमस्तुभ्यं तपसां फलदायक । ममाभीष्टप्रदं देहि सर्वविघ्नान्निवारय ॥७॥ एवं समर्प्य देवस्य विष्णोर्मासव्रतं शुभम् । ततः प्रभृति मासान्तं निवसेद्धरिमन्दिरे ॥८॥ प्रत्यहं स्नपयेद्देवं पञ्चामृतविधानतः । दीपं निरन्तरं कुर्यात्तस्मिन्मासे हरेर्गृहे ॥६॥ प्रत्यहं खादयेत्काष्ठं ह्यपामार्गं समुद्भवम् । ततः स्नायीत विधिवन्नारायणपरायणः ॥१०॥ ततः संस्नापयेद्विष्णुं पूर्ववत्प्रयतोऽर्चयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या भक्तियुक्तः सदक्षिणम् ॥११॥ स्वयं च बन्धुभिः सार्द्धं भुञ्जीत प्रयतेन्द्रियः । एवं मासोपवासांश्च व्रती कुर्यात्त्रयोदश ॥१२॥ वर्षान्ते वेदविदुषे गां प्रदद्यात्सदक्षिणाम् । भोजयेद्ब्राह्मणांस्तद्वद् द्वादशैव विधानतः ॥ शक्त्या च दक्षिणां दद्याद्ब्राह्मण्याभरणानि च ॥१३॥ अध्याय २२ विशेष मास में व्रत करने का वर्णन सनक बोले--अब सब पापों को दूर करने वाले, पुण्यप्रद और लोकोपकारक दूसरे उत्तम व्रत के विषय में कह रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो । ॥१॥ द्विज ! आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद अथवा आश्विन मास में इस व्रत को करना चाहिए । इनमें से किसी मास के शुक्ल पक्ष में जितेन्द्रिय व्यक्ति पंचगव्य पिये और विष्णु के समीप ही सोये । प्रातः काल उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त हो वह वशी शान्ति पूर्वक अनन्य भाव से विष्णु की पूजा करे ॥२-४॥ विद्वानों के साथ यथाविधि विष्णु की पूजा कर स्वस्तिपाठ और संकल्प करे । मन्त्र--'केशव ! आपकी आज्ञा से आज एक मास तक निराहार व्रत रहूँगा, देवाधिदेव ! मास के अन्त में व्रत का पारण करूंगा, तपरूप ! आपको नमस्कार है, तपस्या के फल देने वाले ! मेरे मनोरथों को पूर्ण करो, सब प्रकार विघ्नों से मुझको बचाओ, इस प्रकार शुभ मास व्रत को देवाधिदेव विष्णु की सेवा में अर्पितकर उसी दिन से मास के अन्त तक हरि-मन्दिर में ही निवास करे ॥५-८॥ प्रतिदिन पंचामृत विधान से देव को स्नान करावे, उस मास में भगवान् के मन्दिर में निरन्तर दीपक जलावे । प्रतिदिन चिचड़ा की दातौन कर विधिपूर्वक नारायणपरायण होकर स्नान करे । तदनन्तर पूर्व की भाँति सावधान हो विष्णु को स्नान करावे, भक्ति पूर्वक यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और दक्षिणा भी दे। तत्पश्चात् स्वयं संयमपूर्वक बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन करे । व्रती इस प्रकार तेरह बार मासोपवास व्रत करे ॥६-१२॥ वर्ष के अन्त में किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को दक्षिणा के सहित एक गाय दान करे । विधान के अनुसार