भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१५२ नारदीयपुराणम् मासोपवासत्रितयं यः कुर्यात्संयतेन्द्रियः । आप्तोर्यामस्य यज्ञस्य द्विगुणं फलमश्नुते ॥१४॥ चतुः कृत्वः कृतं येन पाराकं मुनिसत्तम । स लभेत्परमं पुण्यमष्टाग्निष्टोमसंभवम् ॥१५॥ पञ्चकृत्वो व्रतमिदं कृतं येन महात्मना । अत्यग्निष्टोमजं पुण्यं द्विगुणं प्राप्नुयान्नरः ॥१६॥ मासोपवासषट्कं यः करोति सुसमाहितः । ज्योतिष्टोमस्य यज्ञस्य फलं सोऽष्टगुणं लभेत् ॥१७॥ निराहारः सप्तकृत्वो नरो मासोपवासकान् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् ॥१८॥ मासोपवासान्यः कुर्यादष्टकृत्वो मुनीश्वर । नरमेधाख्ययज्ञस्य फलं पञ्चगुणं लभेत् ॥१९॥ यस्तु मासोपवासांश्च नवकृत्वः समाचरेत् । गोमेधमखजं पुण्यं लभते त्रिगुणं नरः ॥२०॥ दशकृत्वस्तु यः कुर्यात्पराकं मुनिसत्तम । स ब्रह्ममेधयज्ञस्य त्रिगुणं फलमश्नुते ॥२१॥ एकादश पराकांश्च यः कुर्यात्संयतेन्द्रियः । स याति हरिसारूप्यं सर्वभोगसमन्वितम् ॥२२॥ त्रयोदश पराकांश्च यः कुर्यात्प्रयतो नरः । स याति परमानन्दं यत्र गत्वा न शोचति ॥२३॥ मासोपवासनिरता गङ्गास्नानपरायणाः । धर्ममार्गप्रवक्तारो मुक्ता एव न संशयः ॥२४॥ अवीराभिश्च नारीभिर्यतिभिर्ब्रह्मचारिभिः । मासोपवासः कर्त्तव्यो वनस्थैश्च विशेषतः ॥२५॥ नारी वा पुरुषो वापि व्रतमेतत्सुदुर्लभम् । कृत्वा मोक्षमवाप्नोति योगिनामपि दुर्लभम् ॥२६॥ गृहस्थो वानप्रस्थो वा व्रती वा भिक्षुरेव वा । मूर्खो वा पण्डितो वापि श्रुत्वैतन्मोक्षभाग्भवेत् ॥२७॥ इदं पुण्यं व्रताख्यानं नारायणपरायणः । शृणुयाद्वाचयेद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मासोपवासवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥ बारह ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति ब्राह्मणों को दक्षिणा और आभूषण दे । जो संयमी व्यक्ति तीन मासोपवास व्रत को करता है वह आप्तोर्याम यज्ञ का दुगुना फल पाता है । मुनिसत्तम ! जो चार बार पारण- पूर्वक इस व्रत का अनुष्ठान करता है उसको आठ अग्निष्टोम यज्ञ के तुल्य फल प्राप्त हो जाता है । जो महात्मा पाँच बार इस व्रत का अनुष्ठान करता उस मनुष्य को अत्यग्निष्टोम यज्ञ का दूना फल मिलता है । जो एकाग्र होकर छह मासोपवास व्रत करता है वह ज्योतिष्टोम यज्ञ का अठगुना फल पाता है ॥१३-१७॥ निराहार रहकर जो मनुष्य सात बार इस व्रत का अनुष्ठान करता है वह अश्वमेध यज्ञ का अठगुना फल पाता है । जो आठ बार इस व्रत को करता है वह नरमेध यज्ञ का पाँचगुना फल पाता है । जो नव बार इस मासोपवास व्रत को करता है वह मनुष्य तीन गोमेधयज्ञ के बराबर फल पाता है । मुनिसत्तम ! जो दशबार इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह ब्रह्म (ज्ञान) मेध यज्ञ का तिगुना फल पाता है ॥१८-२१॥ जो संयमी व्यक्ति ग्यारह बार इस व्रत को करता है वह हरिसारूप्य प्राप्त कर सब भोगों का भोग भी करता है । जो संयमी व्यक्ति तेरह बार इस व्रत को करता है वह उस परमानन्द को प्राप्त करता है जहाँ जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं रह जाता । मासोपवास व्रत करने वाले, गंगा स्नान परायण और धर्म मार्ग का उपदेश करने वाले मनुष्य निःसन्देह मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥२२-२४॥ पति-पुत्र-हीन स्त्री, संन्यासी, ब्रह्मचारी और विशेष रूप से वानप्रस्थाश्रमी को यह व्रत अवश्य करना चाहिए । प्रत्येक नारी या नर इस सुलभ व्रत का अनुष्ठान करके योगि-दुर्लभ फल को प्राप्त करते हैं । गृहस्थ, वानप्रस्थ, व्रती, भिक्षुक, मूर्ख अथवा पंडित सभी इस व्रत-कथा को सुनकर मोक्ष के अधिकारी हो जाते हैं । नारायण का भक्त इस पुण्यदायक व्रत के पाठ या श्रवण के द्वारा सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥२५-२८॥ श्रीनारदीयपुराण में मासोपवास-वर्णन नामक बाईसवां अध्याय समाप्त ॥२२॥