भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

त्रयोविंशोऽध्यायः सनक उवाच इदमन्यत्प्रवक्ष्यामि व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्। सर्वपापप्रशमनं सर्वकामफलप्रदम् ॥१॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम्। मोक्षदं कुर्वतां भक्त्या विष्णोः प्रियतरं द्विज ॥२॥ एकादशीव्रतं नाम सर्वाभीष्टप्रदं नृणाम्। कर्त्तव्यं सर्वथा विप्रविष्णुप्रीतिकरं यतः ॥३॥ एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि। यो भुंक्ते सोऽत्र पापीयान्नरकं व्रजेत् ॥४॥ उपवासफलं लिप्सुर्जह्याद्भुक्तित्वचतुष्टयम्। पूर्वापरदिने रात्रावहोरात्रं तु मध्यमे ॥५॥ एकादशीदिने यस्तु भोक्तुमिच्छति मानवः। स भोक्तुं सर्वपापानि स्पृहयालुनं संशयः ॥६॥ भवेद्दशम्यामेकाशी द्वादश्यां च मुनीश्वर। एकादश्यां निराहारो यदि मुक्तिमभीप्सति ॥७॥ यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च। अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति तानि विप्र हरेर्दिने ॥८॥ ब्रह्महत्यादिपापानां कथंचिन्निष्कृतिर्भवेत्। एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते तस्य नैवास्ति निष्कृतिः ॥९॥ महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः। एकादश्यां निराहारः स्थित्वा याति परां गतिम् ॥१०॥ एकादशी महापुण्या विष्णोः प्रियतमा तिथिः। संसेव्या सर्वथा विप्रैः संसारच्छेदलिप्सुभिः ॥११॥

अध्याय २३ भद्रशील ब्राह्मण का उपाख्यान सनक बोले—अब लोक-विख्यात, सब पापों को दूर करने वाले, सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले दूसरे व्रत को कह रहा हूँ। द्विज ! यह व्रत भक्तिपूर्वक व्रत करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री सबको मोक्ष देने वाला और भगवान् को अत्यन्त प्रिय है। विप्र ! एकादशी व्रत मनुष्यों के सब मनोरथों को निश्चित रूप से पूर्ण कर देता है। मनुष्य को यह व्रत अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह विष्णु को प्रसन्न करने वाला व्रत है ॥१-३॥ दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। जो भोजन करता है, वह पापी है और परलोक में नरक का भागी होता है। उपवास-फल का इच्छुक व्यक्ति चार बेला का भोजन दशमी और द्वादशी की रात को और एकादशी के दिन और रात को त्याग दे। जो मनुष्य एकादशी के दिन भोजन करना चाहता है वह निःसन्देह सब पापों का भोग करना करना चाहता है। मुनीश्वर ! यदि कोई मुक्ति चाहता है तो वह अवश्य दशमी और द्वादशी को एकाहार करे और एकादशी को निराहार रहे ॥४-७॥ विप्र ! जो कुछ ब्रह्महत्या आदि पाप हैं वे एकादशी के दिन अन्न पर आ जाते हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों का प्रायश्चित्त किसी प्रकार नहीं होता। जो एकादशी के दिन भोजन करते हैं उनके पापों का तो कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है ॥८-६॥ महापाप या सब पापों का कर्त्ता भी एकादशी के दिन निराहार रहकर परागति को प्राप्त कर लेता है। एका- दशी अतिपुण्यप्रद और विष्णु की अति प्रिय तिथि है। इसलिए संसार से मुक्ति पाने के इच्छुक ब्राह्मण सर्वथा इस व्रत को अपनावें ॥१०-११॥ २०—नार०