भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

१५४ . | नारदीयपुराणम् दशम्यां प्रातरुत्थाय दन्तधावनपूर्वकम् । स्नापयेद्विधिवद्विष्णुं पूजयेत्प्रयतेन्द्रियः ॥१२॥ एकादश्यां निराहारो निगृहीतेन्द्रियो भवेत् । शयीत सन्निधौ विष्णोर्नारायणपरायणः ॥१३॥ एकादश्यां तथा स्नात्वा सम्पूज्य च जनार्दनम् । गन्धपुष्पादिभिः सम्यक् ततस्त्वेवमुदीरयेत् ॥१४॥ एकादश्यां निराहारः स्थित्वाद्याहं परेऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥१५॥ इमं मन्त्रं समुच्चार्य देवदेवस्य चक्रिणः । भक्तिभावेन तुष्टात्मा उपवासं समर्पयेत् ॥१६॥ देवस्य पुरतः कुर्याज्जागरं नियतो व्रती । गीतैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च पुराणश्रवणादिभिः ॥१७॥ ततः प्रातः समुत्थाय द्वादशीदिवसे व्रती । स्नात्वा च विधिवद्विष्णुं पूजयेत्प्रयतेन्द्रियः ॥१८॥ पञ्चामृतेन संस्नाप्य एकादश्यां जनार्दनम् । द्वादश्यां पयसा विप्र हरिसारूप्यमश्नुते ॥१९॥ अज्ञानतिमिराग्धस्य व्रतेनानेन केशव । प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥२०॥ एवं विज्ञाप्य विप्रेन्द्र माधवं सुसमाहितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या दद्याद्वै दक्षिणां तथा ॥२१॥ ततः स्वन्धुभिः सार्द्धं नारायणपरायणः । कृतपञ्चमहायज्ञः स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२२॥ एवं यः प्रयततः कुर्यात्पुण्यमेकादशीव्रतम् । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥२३॥ उपवासव्रतपरो धर्मकार्यपरायणः । चाण्डालान्पतितांश्चैव नेक्षेदाप कदाचन ॥२४॥ नास्तिकान्भिन्नमर्यादान्निन्दकान्पिशुनांस्तथा । उपवासव्रतपरो नालपेच्च कदाचन ॥२५॥ वृषलीसुतिपोष्टारं वृषलीपतिमेव च । अयाज्ययाजकं चैव नालपेत्सर्वदा व्रती ॥२६॥ कुण्डाशिनं गायकं च तथा देवलकाशिनम् । भिषजं काव्यकर्त्तारं देवद्विजविरोधिनम् ॥२७॥ दशमी के दिन प्रातःकाल उठकर स्वयं दातौन आदि से निवृत्त हो संयमपूर्वक भगवान् को विधिवत् स्नान करावे। एकादशी के दिन निराहार रहकर अपनी इन्द्रियों को वश में रखे और नारायण का ही ध्यान करता हुआ विष्णु के समीप ही शयन करे। एकादशी के दिन इस प्रकार स्नान कर, गन्ध, पुष्प आदि से भली भाँति जनार्दन की पूजा करने के अनन्तर हाथ जोड़कर कहे 'पुण्डरीकाक्ष ! आज एकादशी के दिन निराहार रह कर कल भोजन करूँगा। अच्युत ! मुझे शरण दीजिए।' इस प्रकार देवाधिदेव चक्रधर के सम्मुख मन्त्र का उच्चारण कर भक्तिपूर्वक प्रसन्न होकर अपना उपवास भगवान् को ही अर्पित कर दे ॥१२-१६॥ व्रती नियमपूर्वक देव के ही सम्मुख गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण श्रवण आदि करता हुआ जागरण करे। तत्पश्चात् व्रती द्वादशी के दिन उठकर स्वयं स्नान आदि से निवृत्त हो संयम पूर्वक भगवान् की पूजा करे । विप्र ! एकादशी के दिन भगवान् को पंचामृत से और द्वादशी को दूध से स्नान करा कर मनुष्य हरि का सामीप्य प्राप्त करता है ॥१७-१९॥ 'केशव ! इस व्रत से आप सन्तुष्ट हों, कृपा कीजिए और अज्ञान रूपी अन्धकार में भटकने वाले मुझको ज्ञान-दृष्टि प्रदान कीजिए। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार एकाग्र हो भगवान् माधव से आत्मनिवेदन करके यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और दक्षिणा भी दे। तत्पश्चात् स्वयं पाँच महायज्ञों को समाप्त कर नारायण का ध्यान करता हुआ मौन होकर भाई-बन्धुओं के साथ भोजन करे। इस प्रकार जो अनन्य भाव से पुण्यदायक एकादशी व्रत को करता है वह आवागमन से रहित होकर विष्णुलोक को चला जाता है। उपवास व्रत करते वाला, धर्मकार्यपरायण व्यक्ति चाण्डाल और पतितों को कभी भी न देखे ॥२०-२४॥ उपवासव्रतपरायण व्यक्ति नास्तिक, समाज-बहिष्कृत, निन्दक और पिशुन से कभी भी बातचीत न करे। व्रती वृषली (शूद्रा) के सन्तान का पालन करने वाले, वृषलोपति और अनधिकारो को यज्ञ कराने वाले से कभी वार्तालाप न करे। व्रती कुण्ड१ का अन्न खाने वाले, गायक, पुजारियों का अन्न खाने वाले, वैद्य, कवि (भाट), देवब्राह्मण-विरोधी, परान्नलोलुप, और १. पति के जीवित रहने पर अन्य पति से उत्पन्न किया हुआ पुत्र ।