भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

१५८ नारदीयपुराणम् असौ पापरतः सत्यं तथापि शृणु धर्मप । एकादश्यां निराहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६९॥ एष रेवातटे रम्ये निराहरो हरेदिने । जागरं चोपवासं च कृत्वा निष्पापतां गतः ॥७०॥ यानि कानि च पापानि कृतानि सुबहूनि च । तानि सर्वाणि नष्टानि ह्युपवासप्रभावतः ॥७१॥ एवमुक्तो धर्मराजश्चित्रगुप्तेन धीमता । ननाम दंडवद् भूमौ ममाग्रे सोऽनुकंपितः ॥७२॥ धर्मराज उवाच पूजयामास मां तत्र भक्तिभावेन धर्मराट् । ततश्च स्वभटाःसर्वान्नाहूयेदमुवाच ह ॥७३॥ शृणुध्वं मद्बचो दूता हितं वक्ष्याम्यनुत्तमम् । धर्ममार्ग रतान्मर्त्यान्मानयध्वं ममान्तिकम् ॥७४॥ ये विष्णुपूजनरताः प्रयताः कृतज्ञाश्चैकादशीव्रतपरा विजितेन्द्रियाश्च । नारायणाच्युतहरे शरणं भवेति शान्ता वदन्ति सततं तरसा त्यजध्वम् ॥७५॥ नारःयणाच्युत जनार्दन कृष्ण विष्णो पद्मेश पद्मजपितः शिव शंकरेति । नित्यं वदन्त्यखिललोकहिताः प्रशान्ता दूराद्भटास्त्यजत तान्न ममैष शिक्षा ॥७६॥ नारायर्णापितकृतान्हरिभक्तिभाजः स्वाचारमार्गनिरतान् गुरुसेवकांश्च । सत्पात्रदाननिरतांश्च सुदीनपालान्दूतास्त्यजध्वमनिशं हरिनामसक्तान् ॥७७॥ पाखंडसङ्गरहितान्द्विजभक्तिनिष्ठान्सत्संगलोलुपतरांश्च तथातिथेयान् । शंभौ हरौ च समबुद्धिमतरतयैवत्तांस्त्यजध्वमुपकारपराञ्जनानाम् ॥७८॥ ये वर्जिता हरिकथामृतसेवनैश्च नारायणस्मृतिपरायणमानसैश्च । विप्रेन्द्रपादजलसेचनतोऽप्रहृष्टांस्तान्पापिनो मम भटा गृह्मानयध्वम् ॥७९॥ यद्यपि यह पापी है तथापि धर्मराज ! सुनिए । एकादशी के दिन निराहार रहने से मनुष्य सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है । यह तो नर्मदा तट पर एकादशी के दिन निराहार रहा, रात्रि में जागरण करने और उपवास करने से यह तो निष्पाप हो गया । इसने जो अत्यधिक पाप किये थे वे तो व्रत के प्रभाव से नष्ट हो गये । धीमान् चित्रगुप्त के इस प्रकार कहने पर धर्मराज ने बड़ी कृपा की और मेरे सामने ही दण्डवत् प्रणाम किया । धर्मराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की और अपने अनुचरों को बुलाकर कहा ॥६८-७२॥ धर्मराज बोले-दूतो ! मेरी बातें सुनो, मैं तुम लोगों के हित की उत्तम बातें कह रहा हूँ । धर्म मार्ग में निरत रहने वाले मनुष्यों को मेरे समीप मत लाओ । सम्पूर्ण लोक का हित चाहने वाले उन शान्त महापुरुषों को जो प्रतिदिन नारायण ! अच्युत ! जनार्दन ! कृष्ण ! विष्णु ! पद्मेश ! शिव ! शंकर ! आदि कहा करते हैं उनको दूर से ही प्रणाम करो और उनको मेरे पास न ले आओ यही मेरी इन लोगों के विषय में शिक्षा है ॥७३-७६॥ नारायण को ही अपना सब कुछ अर्पित करने वाले, भगवद्भक्ति के प्रेमी, अपने कुलाचार का पालन करने वाले, गुरुसेवक, सत्पात्र को दान देने वाले, दीनों का पालन करने वाले और हरिनाम स्मरण करने वाले सज्जनों को सर्वदा छोड़ दो । दूतो ! उसी प्रकार पाखण्डियों की संगति न करने वालों, ब्राह्मण-भक्तों, सत्संगति-प्रेमियों, अतिथि-सेवकों, शम्भु और विष्णु में समान भाव रखने वालों और उपकार-परायण जनों को भी छोड़ दिया करो । मेरे सेवको ! जो भगवत्कथा रूपी अमृत के पान से अपने को दूर रखते, नारायण के स्मरण में दिन रात लगे रहने वालों से दूर रहते और जो विप्रेन्द्रों के चरणोदक के अभिषेक से प्रसन्न नहीं होते उन पापियों को ही मेरे यहाँ