भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१५६ त्रयोविंशोऽध्यायः ये मातृतातपरिभर्त्सनशीलिनश्च लोकद्विषो हितजनाहितकर्मणश्च । देवस्वलोभनिरताज्जननाशकृत् न्त्रानयध्वमपराघपरांश्च दूताः ॥८०॥ एकादशीव्रतपराङ्मुखमुग्रशीलं लोकापवादिनिरतं परनिंदकं च । ग्रामस्य नाशकरमुत्तमवैरयुक्तं दूताः समानयत विप्रधनेषु लुब्धम् ॥८१॥ ये विष्णुभक्तिविमुखाः प्रणमंति नैव नारायणं हि शरणागतपालकं च । विष्णुवाल्यं च नहि यांति नराः सुमूर्खास्तानयध्वमतिपापरतान्प्रसह्य ॥८२॥ एवं श्रुतं यदा तत्र यमेन परिभाषितम् । मयानुतापद्ग्धेन स्मृतं तत्कर्म निंदितम् ॥८३॥ असत्कर्मानुतापेन सद्धर्मश्रवणेन च । तत्रैव सर्वपापानि निःशेषाणि गतानि मे ॥८४॥ पापशेषाद्विनिर्मुक्तं हरिसारूप्यतां गतम् । सहस्रसूर्यसंकाशं प्रणनाम यमश्च तम् ॥८५॥ एवं दृष्ट्वा विस्मितास्ते यमदूता भयोत्कटाः । विश्वासं परमं चक्रुर्यमेन परिभाषिते ॥८६॥ ततः संपूज्य मां कालो विमानशतसंकुलम् । सद्यः संप्रेषयामास तद्विष्णोः परमं पदम् ॥८७॥ विमानकोटिभिः सार्द्धं सर्वभोगसमन्वितैः । कर्मणा तेन विप्रर्षे विष्णुलोके मयोवितम् ॥८८॥ कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । स्थित्वा विष्णुपदं पश्चादिंद्रलोकमुपागमम् ॥८६॥ तत्रापि सर्वभोगाढ्यः सर्वदेवनमस्कृतः । तावत्कालं दिवि स्थित्वा ततो भूमिमुपागतः ॥६०॥ अत्रापि विष्णुभक्तानां जातोऽहं भवतां कुले । जातिस्मरत्वाज्जानामि सर्वमेतन्मुनीश्वर ॥६१॥ तस्माद्विष्ण्वर्चनोद्योगं करोमि सह बालकैः । एकादशीव्रतमिदमिति न ज्ञातवान्पुरा ॥६२॥ लाओ ॥७७-७६॥ दूतो ! जो माता-पिता को झिड़कियाँ सुनाते, जो लोकद्वेषी, शुभचिन्तकों का अहित करने वाले, देव-धन का अपहरण करने वाले, अपराधी और जनता की हत्या करने वाले पापी हैं उनको यहाँ लाओ। दूतो ! एकादशी व्रत न करने वाले, उग्रस्वभाव, मेरे-निन्दक, लोकापवाद-प्रेमी, ग्राम हित को हानि पहुँचाने वाले, ब्राह्मणों की सम्पत्ति हड़प जाने वाले और कट्टर शत्रुता करने वाले को यहाँ लाओ ॥८०-८१॥ जो विष्णु- भक्ति से विमुख रहते और शरणागत-पालक नारायण को प्रणाम नहीं करते अथवा जो महामूर्ख और हरि-मन्दिर में नहीं जाते उन घोर पापियों को हठपूर्वक यहाँ लाओ । जिस समय वहाँ यम की कही हुई इन बातों को सुना मेरा हृदय पश्चात्ताप की ज्वाला से जल उठा, अपने किये हुये निन्दित कर्मों का स्मरण करके दुःखी हो गया ॥८२-८३॥ असत्कर्मों के लिये पश्चात्ताप करने और धर्म की उत्तमोत्तम बातें सुनने से वहीं मेरे सम्पूर्ण पाप निःशेष हो गए । अशेष पापों के नष्ट हो जाने से मुझे हरि का सारूप्य प्राप्त हो गया । यमराज ने सहस्र सूर्य के समान तेजोमय उस रूप को देखकर प्रणाम किया । यह देखकर वे भयंकर यमदूत विस्मित हो गए । उनको यम की बातों पर पूर्णरूप से विश्वास हो गया । तदनन्तर यम ने मेरी पूजा की और तत्काल सैकड़ों देव विमानों के साथ मुझे विष्णु के परम पद को भेज दिया ।॥८४-८७॥ विप्रर्षि ! उस सत्कर्म के प्रभाव से करोड़ों देव-विमानों और सब प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ वहाँ रहने लगा । असंख्य कल्पों तक उस विष्णु लोक में निवास करने के बाद इन्द्रलोक में आया । वहाँ भी उतने ही कल्पों तक सब देवताओं की श्रद्धा का पात्र बनकर मैंने सम्पूर्ण दिव्य भोगों का उपभोग किया । तत्पश्चात् मैं इस पृथ्वी पर आया । यहाँ भी आप के समान विष्णु भक्त के कुल में ही उत्पन्न हुआ । मुनीश्वर ! जातिस्मर होने के कारण ही मैं इन बातों को जानता हूँ ॥८८-९१॥ इसलिए मैं बालकों के साथ विष्णु-पूजा के लिये प्रयत्न किया करता हूँ । पहले इस एकादशी व्रत की उत्कृष्टता को नहीं जानता था; परन्तु इस समय पूर्वजन्म के ज्ञान के