बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० नारदीयपुराणम् जातिस्मृतिप्रभावेण तज्ज्ञातं सांप्रतं मया । अत्र स्वेनापि यत्कर्म कृतं तस्य फलं त्विदम् ॥६३॥ एकादशीव्रतं भक्त्या कुर्वतां किमुत प्रभो । तस्माच्चरिष्ये विप्रेन्द्र शुभमेकादशीव्रतम् ॥६४॥ विष्णुपूजां चाहरहः परमस्थानकांक्षया । एकादशीव्रतं यत्तु कुर्वंति श्रद्धया नराः ॥६५॥ तेषां तु विष्णुभवनं परमानंददायकम् । एवं पुत्रवचः श्रुत्वा संतुष्टो गालवो मुनिः ॥६६॥ अवाप परमां तुष्टिं मनसा चातिहर्षितः । मज्जन्म सफलं जातं मद्द्वंशः पावनीकृतः ॥६७॥ यतस्त्वं मद्गृहे जातो विष्णुभक्तिपरायणः । इति संतुष्टचित्तस्तु तस्य पुत्रस्य कर्मणा ॥६८॥ हरिपूजाविधानं च यथावत्समबोधयत् । इत्येतत्ते मुनिश्रेष्ठ यथावत्कथितं मया । संकोचविस्तराभ्यां च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीये पुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने ॥२३॥ एकादशीव्रतमहिमानुवर्णनंनाम त्रयोविंशोऽध्यायः
प्रभाव से सब कुछ जान लिया है। यहाँ अनिच्छया जो कुछ किया उसका यह फल मिला । प्रभो ! तो भक्तिपूर्वक एकादशी व्रत करने वाले को कितना फल मिलता होगा । विप्रेन्द्र ! इसीलिए इस शुभ एकादशी व्रत को मैं करता हूँ । श्रद्धा पूर्वक जो मनुष्य परम पद पाने की अभिलाषा से प्रतिदिन विष्णु की पूजा करते और एकादशी व्रत को करते हैं, उनको अवश्य परमानन्ददायक विष्णु-पद प्राप्त होता है ॥६२-६५॥ पुत्र की इन बातों को सुनकर मुनि गालव सन्तुष्ट हो गये । उनको परमानन्द प्राप्त हो गया । वे अन्तः- करण से अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले— मेरा जन्म सफल हो गया, मेरा वंश पवित्र हो गया क्योंकि तुम्हारे समान विष्णु भक्त मेरे घर में उत्पन्न हो गया है । उस पुत्र के कर्त्तव्यों से प्रसन्न होकर उन्होंने पूर्णरूप से हरि-पूजन की विधि बता दी । मुनिश्रेष्ठ ! ये सारी बातें तुमसे संक्षेप और विस्तार से भी ज्यों की त्यों कह दी । अब और क्या सुनना चाहते हो ॥६६-६९॥ श्रीनारदीयमहापुराण में एकादशीव्रतकथन नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३॥