बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः सूत उवाच एतन्निशम्य सनकोदितमप्रमेयं पुण्यं हरेर्दिनभवं निखिलोत्त मं च । पापौघशांतिकरणं व्रतसारमेवं ब्रह्मात्मजः पुनरभाषत हर्षयुक्तः ॥१॥ नारद उवाच कथितं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । व्रताख्यानं महापुण्यं यथावद्धरिभक्तिदम् ॥२॥ इदानीं श्रोतुमिच्छामि वर्णाचारविधिं मुने । तथा सर्वाश्रमाचारं प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥३॥ एतत्सर्वं महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । कृपया परया मह्यं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥४॥ सनक उवाच शृणुष्व मुनिशार्दूल यथा भक्तप्रियंकरः । वर्णाश्रमाचारपरैः पूज्यते हरिरव्ययः ॥५॥ मन्वाद्यैरुदितं यच्च वर्णाश्रमनिबंधनम् । तत्ते वक्ष्यामि विधिवद्भक्तोऽसि त्वमधोक्षजे ॥६॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चत्वार एव ते । वर्णा इति समाख्याता एतेषु ब्राह्मणोऽधिकः ॥७॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या द्विजाः प्रोक्तास्त्रयस्तथा । मातृतश्चोपनयनाद्द्विजत्वं प्राप्यते त्रिभिः ॥८॥ एतैर्वर्णैः सर्वधर्माः कार्या वर्णानुरूपतः । स्ववर्णधर्मत्यागेन पाखंडः प्रोच्यते बुधैः ॥६॥ स्वगृह्याचोदितं कर्म द्विजः कुर्वन्कृती भवेत् । अन्यथा पतितो भूयात्सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥१०॥ अध्याय २४ ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के सदाचार-वर्णन सूत बोले- सनक जी ने पाप-समूहों को नष्ट करने वाले, सम्पूर्ण व्रतों के सारभूत एकादशी व्रत के परमोत्तम असंख्य पुण्यों को कहा। ब्रह्मा के पुत्र नारद जी इस रहस्य को सुनकर आनन्दित होकर फिर पूछने लगे ॥१॥ नारद बोले- मुनिवर ! तत्त्वार्थ के ज्ञाता ! आपने अत्यन्त पुण्यदायक हरिभक्ति प्रदान करने वाले व्रता- ख्यान को पूर्ण रूप से कह दिया । मुने ! अब मैं वर्ण-धर्म, सब आश्रमों के आचार और प्रायश्चित्त विधि को सुनना चाहता हूँ । महाभाग ! सब रहस्यों के ज्ञाता ! आप अत्यन्त कृपा करके इन सब तत्त्वों को यथार्थ रूप से मुझसे कहिए ॥२-४॥ सनक बोले- मुनिवर ! सुनो। वर्ण और आश्रम के आचारों का पालन करने वाले सज्जन जिस विधि से भक्तों के प्रिय कार्य करने वाले, अव्यय, हरि की पूजा करते हैं और मनु आदि धर्माचार्यों ने वर्णाश्रम धर्म के जिन नियमों को बनाया है उनको विधिपूर्वक कह रहा हूँ, सुनो; क्योंकि तुम भगवान् हरि के भक्त हो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण कहे गये हैं। इनमें ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विज कहे जाते हैं। इन तीनों ने मातृजन्म और उपनयन के कारण द्विजत्व प्राप्त किया है। इन वर्णों के लोगों को अपने वर्णों के अनुरूप सब धर्मों का पालन करना चाहिए। बुधजन अपने वर्णानुकूल धर्म के त्याग को 'पाखण्ड' कहते हैं ॥५-९॥ अपने गृह्यसूत्रों के अनुसार कर्म को करने वाला द्विज कृती होता है, अन्यथा वह अपने धर्मों से २१-नार०