भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 1008 में से

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१६२ नारदीयपुराणम् युगधर्मः परिग्राह्यो वर्णैरेतैर्यथोचितम् । देशाचारास्तथाग्राह्याः स्मृतिधर्माविरोधतः ॥११॥ कर्मणा मनसा वाचा यत्नाद्धर्मं समाचरेत् । अस्वर्ग्यं लोक विद्विष्टं धर्म्यमप्याचरेन्न तु ॥१२॥ समुद्रयात्रास्वीकारः कमंडलुविधारणम् । द्विजानामसवर्णासु कन्या सूपयमस्तथा ॥१३॥ देवराच्च सुतोत्पत्तिमधुपर्के पशोर्वधः । मांसादनं तथा श्राद्धे वानप्रस्थाश्रमस्तथा ॥१४॥ दत्ताक्षतायाः कन्यायाः पुनर्दानं वराय च । नैष्ठिकं ब्रह्मचर्यं च नरमेधाश्वमेधकौ ॥१५॥ महाप्रस्थानगमनं गोमेधश्च तथा मखः । एतान्धर्मान्कलियुगे वर्ज्यानाहुर्मनीषिणः ॥१६॥ देशाचाराः परिग्राह्यास्तत्तद्देशगतैर्नरैः । अन्यथा पतितो ज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥१७॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च द्विजोत्तम । क्रियाः सामान्यतो वक्ष्ये तच्छृणुष्व समाहितः ॥१८॥ दानं दद्याद्ब्राह्मणेभ्यस्तथा यज्ञैर्यजेत्सुरान् । वृत्त्यर्थं याचयेच्चैव अन्यानध्यापयेत्तथा ॥१९॥ याजयेद्यजने योग्यान्विप्रो नित्योदकी भवेत् । कुर्याच्च वेदग्रहणं तथाग्नेश्च परिग्रहम् ॥२०॥ ग्राह्ये द्रव्ये च पारक्ये समबुद्धिर्भवेत्तथा । सर्वलोकहितं कुर्यान्मृदुवाक्यमुदीरयेत् ॥२१॥ ऋतावभिगमः पत्न्यां शस्यते ब्राह्मणस्य वै । न कस्याप्यहितं ब्रूयाद्विष्णुपूजापरो भवेत् ॥२२॥ दद्याद्दानानि विप्रेभ्यः क्षत्रियोऽपि द्विजोत्तम । कुर्याच्च वेदग्रहणं यज्ञैर्देवान्यजेत्तथा ॥२३॥ शस्त्राजीवी भवेच्चैव पालयेद्धर्मतो महीम् । दुष्टानां शासनं कुर्याच्छिष्टानां पालनं तथा ॥२४॥ पाशुपाल्यं च वाणिज्यं कृषिश्च द्विजसत्तम । वेदस्याध्ययनं चैव वैश्यस्यापि प्रकीर्तितम् ॥२५॥ कुर्याच्च दारग्रहणं धर्मांश्चैव समाचरेत् । क्रयविक्रयजैर्वापि धनैः कारुक्रियोद्भवैः ॥२६॥ दद्याद्दानानि शूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेन्न च । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शुश्रूषानिरतो भवेत् ॥२७॥ बहिष्कृत होकर पतित हो जाता है। इन द्विजों को उचित रूप से अपने युगधर्मों का आचरण करना चाहिए और स्मृतियों के अनुकूल ही देशाचार को अपनाना चाहिए। मन, वचन और कर्म से यत्न पूर्वक धर्म का आचरण करना चाहिए। लोक-विरुद्ध और स्वर्ग प्राप्ति में सहायता न पहुँचाने वाले कर्मों को, चाहे वह धर्मसंगत ही क्यों न हो, नहीं करना चाहिए ॥१०-१२॥ मनीषियों ने कलियुग में समुद्र-यात्रा करना, संन्यास ग्रहण करना, असवर्ण कन्याओं के साथ द्विजों का विवाह, देवर से पुत्र उत्पन्न करना, मधुपर्क में पशुओं का वध, श्राद्ध में मांस-भोजन, वानप्रस्थाश्रम, एक बार की दी हुई अक्षत कन्या का पुनर्विवाह, नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, नरमेध, अश्वमेध, महाप्रस्थानगमन (सती प्रथा) गोमेध-यज्ञ, इन धर्मों को कलियुग के लिए निषिद्ध कहा है। तत्तद्देशीय मनुष्यों को उन देशों के आचारों को ही अपनाना चाहिए, अन्यथा वह सब धर्मों से बहिष्कृत होकर पतित समझा जाता है ॥१३-१७॥ द्विजोत्तम ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्मों का सामान्य रूप से वर्णन कर रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो। दान ब्राह्मणों को ही देना चाहिए और यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण जीविका के लिए याचना करे और दूसरों को पढ़ावे। ब्राह्मण यज्ञाधिकारी जनों को यज्ञ करावे और सर्वदा सन्ध्यार्पण आदि करे। वेदाध्ययन और अग्न्याधान अवश्य करे ॥१८-२०॥ ग्राह्य द्रव्य और पराये द्रव्य में समान भाव रखे। लोक हित में सर्वदा लीन रहे और प्रिय भाषण करे। ब्राह्मण का ऋतुकाल में स्वस्त्रीगमन प्रशंसनीय है। किसी के अहित की बात न सोचे, न तो बोले ही, सर्वदा विष्णु पूजा में लवलीन रहे। द्विजवर्य ! क्षत्रिय भी ब्राह्मणों को ही दान दे। वह भी वेद का अध्ययन करे और यज्ञों द्वारा देवों को पूजा करे। वह शस्त्र द्वारा जीविका चलावे और पृथिवी का पालन करे। दुष्टों का शासन और सज्जनों का पालन क्षत्रिय का धर्म है ॥२१-२४॥ पशु पालन, व्यापार, कृषि और वेदाध्ययन वैश्य का धर्म माना गया है। विवाह करना और धर्माचरण वैश्य के लिए प्रशस्त हैं। क्रय-विक्रय अथवा शिल्प के द्वारा धनोपार्जन करे। शूद्र भी दान दे परन्तु पाक-यज्ञ न करे। वह ब्राह्मण, क्षत्रिय,

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