बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:
१६४ नारदीयपुराणम् जाते पुत्रे पिता स्नात्वा सचैलं जातकर्म च । कुर्याच्च नांदीश्राद्धं च स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥५॥ हेम्ना वा रजतेनापि वृद्धिश्राद्धं प्रकल्पयेत् । अन्नेन कारयेद्यस्तु स चंडालसमो भवेत् ॥६॥ कृत्वान्द्युदयिकं श्राद्धं पिता पुत्रस्य वाग्यतः । कुर्वीत नामनिर्देशं सूतकांते यथाविधि ॥७॥ अस्पष्टमर्थहीनं च ह्यतिगुर्वक्षरन्वितम् । न दद्यान्नाम विप्रेंद्र तथा च विषमाक्षरम् ॥८॥ तृतीयवर्षे चौलं च पंचमे षष्ठसम्मिते । सप्तमे चाष्टमे वापि कुर्याद् गृह्योक्तमार्गतः ॥९॥ दैवयोगादतिक्रांते गर्भाधानादिकर्मणि । कर्तव्यः पादकृच्छ्रो वै चौले त्वद्धं प्रकल्पयेत् ॥१०॥ गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे वटुकस्योपनयनम् । आषोडशाब्दपर्यंतं गौणं कालमुशंति च ॥११॥ गर्भैकादशमेऽब्दे तु राजन्यस्योपनयनम् । आद्वाविंशाब्दपर्यंतं कालमाहुर्विपश्चितः ॥१२॥ वैश्योपनयनं प्रोक्तं गर्भाद्द्वादशमे तथा । चतुर्विंशाब्दपर्यन्तं गौणमाहुर्मनीषिणः ॥१३॥ एतत्कालावधेरूर्ध्वस्य द्विजस्यातिक्रमो भवेत् । सावित्रीपतितं विद्यात्तं तु नैवालपेतकदा ॥१४॥ द्विजोपनयने विप्र मुख्यकालब्यतिक्रमे । द्वादशाब्दं चरेत्कृच्छ्रं पश्चाच्चांद्रायणं तथा सांतपनद्वयं चैव कृत्वा कर्म समाचरेत् ॥१५॥ अन्यथा पतितं विद्यात्कर्तापि ब्रह्महा भवेत् । मौंजी विप्रस्य विज्ञेया धनुर्ज्या क्षत्रियस्य तु ॥१६॥ आवी वैश्यस्य विज्ञेया श्रूयतामजिनं तथा । विप्रस्य चोक्तमैणेयं रौरवं क्षत्रियस्य तु ॥१७॥ आजं वैश्यस्य विज्ञेयं दंडांश्वक्ष्ये यथाक्रमम् । पालाशं ब्राह्मणस्योक्तं नृपस्यौदुम्बरं तथा ॥१८॥ आठवें महीने में भी यह किया जा सकता है ॥१-४॥ पुत्र उत्पन्न हो जाने पर पिता सचैल स्नान जात कर्म करे साथ साथ स्वस्तिवाचन पूर्वक नान्दी श्राद्ध भी करे। नान्दी श्राद्ध सोना अथवा चाँदी से करना चाहिए। जो अन्न से श्राद्ध करता है, वह चाण्डाल के समान समझा जाता है। पिता पुत्र के लिए आभ्युदयिक श्राद्ध करने के बाद वाणी का संयम करते हुए अनन्तर विधि पूर्वक नामकरण करे। विप्रेन्द्र ! अस्पष्ट, निरर्थक, दीर्घ अक्षरों और विषम अक्षरों वाला नाम नहीं रखना चाहिए। तीसरे वर्ष, पाँचवें, छठे, सातवें या आठवें वर्ष गृह्य सूत्रों के अनु- सार चोल संस्कार करना चाहिए। ॥५-६॥ दैवयोग से यदि गर्भाधान आदि संस्कार न हुआ हो तो पाद कृच्छ्रव्रत करे। चौल संस्कार के न करने पर अर्द्ध कृच्छ्रव्रत करे। गर्भ से आठवें वर्ष में ब्राह्मण वटुक का उपनयन संस्कार होना चाहिए। सोलहवें वर्ष तक उपनयन का काल मुनियों ने मध्यम कोटि का माना है ॥१०-११॥ क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में उपनयन होना उत्तम है; परन्तु विद्वानों ने अट्ठाईस वर्ष तक क्षत्रियों का उपनयन-काल स्वीकार किया है और वैश्यों का उपनयन गर्भ से बारहवें वर्ष तक हो जाना उत्तम है, परन्तु मनीषियों ने चौबीस वर्ष तक गौण काल माना है। जिस द्विज का इस अवधि तक उपनयन नहीं होता, उसको सावित्रीपतित समझना चाहिए और कभी भी उससे बातचीत न करे । विप्र ! द्विजों के उपनयन संस्कार में उचित समय का उल्लंघन कर देने पर बारह वर्ष तक कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत करे । तत्पश्चात् दो बार सान्तपन व्रत कर उपनयन करे ॥१२-१५॥ अन्यथा वह व्यक्ति पतित हो जाता है और उपनयन कराने वाला भी ब्रह्म हत्या का भागी होता है। विप्र के लिए मूंज की मेखला, क्षत्रिय के लिए धनुष की डोरी की और वैश्य के लिए भेड़ के ऊन की बनी मेखला प्रशस्त समझी जाती है। अब अजिन के विषय में सुनो। विप्र का अजिन मृगचर्म का, क्षत्रिय का कृष्ण मृग का और वैश्य का अजा चर्म का होना चाहिए। अब क्रमशः दण्ड को कह रहा हूँ। ब्राह्मण का दण्ड पलाश का क्षत्रिय का गूलर का और वैश्य का विल्व का होना चाहिए। अब उसकी लम्बाई बतला रहा हूँ सुनो। ब्राह्मण का