बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 1008 में से
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पञ्चविंशोऽध्यायः १६५ बैल्वं वैश्यस्य विज्ञेयं तत्प्रमाणं शृणुष्व मे । विप्रस्य केशमानं स्यादाललाटं नृपस्य च ॥१९॥ नासाग्रसंमितं दण्डं वैश्यस्याहुर्विपश्चितः । तथा वासांसि वक्ष्यामि विप्रादीनां यथाक्रमम् ॥२०॥ कषायं चैव मांनिष्ठं हारिद्रं च प्रकीर्तितम् । उपनीतो द्विजो विप्र परिचर्यापरो गुरोः ॥२१॥ वेदग्रहणपर्यंतं निवसेद्गुरुवेश्मनि । प्रातःस्नायी भवेद्वर्णी समित्कुशफलादिकान् ॥२२॥ गुर्वर्थमाहरेन्नित्यं कल्ये कल्ये मुनीश्वर । यज्ञोपवीतमजिनं दंडं च मुनिसत्तम ॥२३॥ नष्टे भ्रष्टे नवं मंत्राद्धृत्वा भ्रष्टं जले क्षिपेत् । वर्णिर्नो वर्तनं प्राहुर्भिक्षान्नेनैव केवलम् ॥२४॥ भिक्षा च श्रोत्रियागारादाहरेत्प्रयतेन्द्रियः । भवत्पूर्वं ब्राह्मणस्य भवन्मध्यं नृपस्य च ॥२५॥ भवदंत्यं विशः प्रोक्तं भिक्षाहरणकं वचः । सायं प्रातर्वृत्तिकार्यं यथाचारं जितेन्द्रियः ॥२६॥ कुर्यात्प्रतिदिनं वर्णी ब्रह्मयज्ञं च तर्पणम् । अग्निकार्यपरित्यागी पतितः प्रोच्यते बुधैः ॥२७॥ ब्रह्मयज्ञविहीनश्च ब्रह्महा परिकीर्तितः । देवताभ्यर्चनं कुर्याच्छुश्रूषानुपदं गुरोः ॥२८॥ भिक्षान्नं भोजयेन्नित्यं नैकान्नाशी कदाचन । आनीयानन्द्यविप्राणां गृहाद्भिक्षां जितेन्द्रियः ॥२९॥ निवेद्य गुरवेऽश्नीयाद्वाग्यतस्तदनुज्ञया । मधुस्त्रीमांसलवणं ताम्बूलं दंतधावनम् ॥३०॥ उच्छिष्टभोजनं चैव दिवास्वापं च वर्जयेत् । छत्रपादुकगंधांश्च तथा माल्यानुलेपनम् ॥३१॥ जलकेलिं नृत्यगीतवाद्यं तु परिवर्जयेत् । परिवादं चोपतापं विप्रलापं तथांजनम् ॥३२॥ पाषण्डजनसंयोगं शूद्रसंगं च वर्जयेत् । अभिवादनशीलः स्याद् वृद्धेषु च यथाक्रमम् ॥३३॥ ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा वयोवृद्धा इति त्रयः । आध्यात्मिकादिदुःखानि निवारयति यो गुरुः ॥३४॥
दण्ड शिर के केश तक, क्षत्रिय का ललाट तक और वैश्य का दण्ड नासिका के अग्र भाग तक का होना चाहिए ॥१९½-१९३॥ अब मैं ब्राह्मण आदि के वस्त्रों को क्रमानुसार कह रहा हूँ । कषाय, मजीठ और पीला वस्त्र क्रमशः वर्णा- नुसार होना चाहिए । विप्र ! उपनीत द्विज गुरु की सेवा करता हुआ वेदाध्ययन काल तक गुरु-गृह में ही निवास करे। मुनीश्वर । ब्रह्मचारी नित्य प्रातःकाल स्नान कर गुरु के लिए उसी समय समिधा, कुशा और फल आदि लावे ॥२०-२२॥ मुनिश्रेष्ठ ! यज्ञोपवीत, अजिन और दण्ड के टूट जाने या अशुद्ध हो जाने पर पुनः मन्त्र पढ़कर नवीन धारण करना चाहिए और पुराने को किसी जलाशय में फेंक देना चाहिए । ब्रह्मचारी को केवल भिक्षान्न के द्वारा ही प्रति दिन का भोजन चलाना चाहिए ॥२३-२४॥ भिक्षा संयत होकर किसी श्रोत्रिय के घर से लानी चाहिए । भिक्षा माँगते समय ब्राह्मण ब्रह्मचारी भवान् (आप) शब्द का पहले ही प्रयोग करें, क्षत्रिय मध्य में और वैश्य अन्त में करें । यही भिक्षा काल का वाक्य होना चाहिए । वर्णी प्रतिदिन संयमपूर्वक आचारानुकूल हवन, ब्रह्मयज्ञ और तर्पण करे । अग्नि कार्य (हवन) का परित्याग करने वाले को पंडितों ने पतित कहा है ॥२५-२७॥ ब्रह्म यज्ञ को न करने वाला ब्रह्मघाती कहा गया है । गुरु की शुश्रूषा के पश्चात् देवपूजा करनी चाहिए । प्रतिदिन भिक्षान्न भोजन करे और कभी भी एक ही अन्न न खाये । जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी अनिन्द्य ब्राह्मणों के घर से भिक्षा लाकर गुरु को अर्पित करे पुनः उनकी आज्ञा से स्वयं वाक्संयमी होकर भोजन करे । ब्रह्मचारी के लिए मद्य, स्त्री, मांस, नमक, ताम्बूल, दातौन, जूठा भोजन और दिन का सोना वर्जित है । उसको छाता, जूता सुगन्धित पदार्थ, माला, लेप, जल-क्रीड़ा, नृत्य, गीत और बाजा बजाना सर्वथा छोड़ देना चाहिए । निन्दा, अनुताप, व्यर्थलाप, अंजन, धूर्तों की संगति और शूद्रों की संगति नहीं करनी चाहिए । सर्वदा वृद्धजनों का क्रमानुसार अभिवादन करे ॥२८-३३॥ ज्ञानवृद्ध, तपोवृद्ध और वयोवृद्ध तीन वृद्ध हैं । जो गुरु वेदशास्त्रों के उपदेश से मानसिक दुःखों को दूर कर देता है, उसको