बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ नारदीयपुराणम् वेदशास्त्रोपदेशेन तं पूर्वमभिवादयेत् । असावहमिति ब्रूयाद्द्विजो वै ह्यभिवादने ॥३५॥ नाभिवाद्याश्च विप्रेण क्षत्रियाद्याः कथंचन । नास्तिकं भिन्नमर्यादं कृतघ्नं ग्रामयाजकम् ॥३६॥ स्तेनं च कितवं चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् । पाषण्डं पतितं व्रात्यं तथा नक्षत्रजीविनम् ॥३७॥ तथा पातकिनं चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् । उन्मत्तं च शठं धूतं धावन्तमशुचिं तथा ॥३८॥ अभ्यक्तशिरसं चैव जपन्तं नाभिवादयेत् । विवादशीलिनं चंडं वमंतं जलमध्यगम् ॥३९॥ भिक्षान्नधारिणं चैव शयानं नाभिवादयेत् । भर्तृघ्नीं पुष्पिणीं जारां सूतिकां गर्भपातिनीम् ॥४०॥ कृतघ्नीं च तथा चंडीं कदाचिन्नाभिवादयेत् । सभायां यज्ञशालायां देवतायतनेष्वपि ॥४१॥ प्रत्येकं तु नमस्कारोहंति पुण्यं पुराकृतम् । श्राद्धं व्रतं तथा दानं देवताभ्यर्चनं तथा ॥४२॥ यज्ञं च तर्पणं चैव कुर्वंतं नाभिवादयेत् । कृतेऽभिवादने यस्तु न कुर्यात्प्रतिवादनम् ॥४३॥ नाभिवाद्यः स विज्ञेयो यथा शूद्रस्तथैव सः । प्रक्षाल्य पादावाचम्य गुरोरभिमुखः सदा ॥४४॥ तस्य पादौ च संगृह्य आधीयीत विचक्षणः । अष्टकासु चतुर्दश्यां प्रतिपत्पर्वणोस्तथा ॥४५॥ महाभरण्यां विप्रेन्द्र श्रवणद्वादशीदिने । भाद्रपदापरपक्षे द्वितीयायां तथैव च ॥४६॥ माघस्य शुक्लसप्तम्यां नवम्यामाश्विनस्य च । परिवेषं गते सूर्ये श्रोत्रिये गृहमागते ॥४७॥ वंचिते ब्राह्मणे चैव प्रवृद्धकलहे तथा । संध्यायां गर्जिते मेघे ह्यकाले परिवर्षणे ॥४८॥ उल्काशनिप्रपाते च तथा विप्रेऽवमानिते । मन्वादिषु च देवर्षे युगादिषु चतुर्ष्वपि ॥४९॥ नाधीयीत द्विजः कश्चित्सर्वकर्मफलोत्सुकः । तृतीया माधवे शुक्ला भाद्रे कृष्णा त्रयोदशी ॥५०॥ कार्तिके नवमी शुक्ला माघे पंचदशी तिथिः । एता युगाद्याः कथिता दत्तस्याक्षयकारिकाः ॥५१॥
सबसे पहले अभिवादन करना चाहिए। द्विज अभिवादन के समय असौ (यह) अहम् (मैं) ऐसा कहे ॥३४-३५॥ किसी भी अवस्था में क्षत्रिय आदि जाति के मनुष्य विप्रों के अभिवादन के योग्य नहीं हैं। नास्तिक, सामाजिक मर्यादा भङ्ग करने वाले, कृतघ्न, पुरोहित, चोर और धूर्त का कभी भी अभिवादन नहीं करना चाहिये। पाखण्डी, पतित व्रात्य, ज्योतिषी और पापी का कभी भी अभिवादन नहीं करना चाहिए। उन्मत्त, शठ, धूर्त, दौड़ते हुए व्यक्ति, अपवित्र, तैल से भीगे हुए शिर वाले और जप करते हुए व्यक्ति को प्रणाम नहीं करना चाहिए। बकवादी, उद्धत, वमन करते हुए, जल में खड़े, भिक्षुक और सोते हुए को प्रणाम सर्वथा निषिद्ध है ॥३६-३९॥ इसी प्रकार पति की हत्या करने वाली, ऋतुमती, व्यभिचारिणी, सूतिका, गर्भपात करने वाली, कृतघ्न तथा उद्धत स्त्री को भी नमस्कार करना उचित नहीं है। सभा, यज्ञशाला और देवमन्दिर में किया हुआ प्रत्येक व्यक्ति का नमस्कार पूर्व- कृत पुण्यों का नाश करता है श्राद्ध, व्रत, दान, देवार्चन, यज्ञ और तर्पण करते हुए व्यक्ति का अभिवादन नहीं करना चाहिए। जो अभिवादन करने पर भी प्रत्यभिवादन (आशीर्वाद आदि) नहीं करता, उसको अभिवादन के अयोग्य समझना चाहिए। वह तो शूद्र के समान है ॥४०-४३॥ बुद्धिमान् शिष्य सर्वदा पाद प्रक्षालन और आचमन कर गुरु के सम्मुख बैठकर उनके चरणों को छूकर पढ़ना प्रारम्भ करे। विप्रेन्द्र ! सब कर्मों के फल को चाहने वाला कोई भी द्विज अष्टमी, चतुर्दशी, प्रतिपदा, पर्वतिथि, महाभरणी, श्रावण की द्वादशी, भाद्र शुक्ल द्वितीया, माघ शुक्ल सप्तमी, आश्विन की नवमी, सूर्य के चारों ओर मण्डलाकार चिह्न दिखाई देने के दिन, श्रोत्रिय के घर आने पर, ब्राह्मण के बंधन में पड़ने पर, कलह बढ़ जाने पर, सायंकाल मेघ-गर्जन होने पर, अकालवृष्टि होने पर उल्का और बिजली गिरने पर, ब्राह्मण के अपमानित होने पर, देवर्षे ! चारों युगों के आर मन्वन्तरों के प्रारम्भ के दिन में न पढ़े। वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) भाद्र कृष्ण त्रयोदशी, कार्तिक शुक्ल नवमी, माघी पूर्णिमा, ये तिथियां युग-प्रारम्भ की तिथियां हैं। इन तिथियों में दिया हुआ दान