बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः १६७
मन्वादींश्च प्रवक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः । अक्षय्यशुक्लनवमी कार्तिके द्वादशी सिता ॥५२॥ तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च । आषाढशुक्लदशमी सिता माघस्य सप्तमी ॥५३॥ श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा । फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी सिता ॥५४॥ कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्यैष्ठी पंचदशी सिता । मन्वादयः समाख्याता दत्तस्याक्षयकारिकाः ॥५५॥ द्विजैः श्राद्धं च कर्त्तव्यं मन्वादिषु युगादिषु । श्राद्धे निमन्त्रिते चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥५६॥ अयनद्वितये चैव तथा भूकम्पने मुने । गलग्रहे दुर्दिने च नाधीयीत कदाचन ॥५७॥ एवमादिषु सर्वेषु अनध्यायेषु नारद । अधीयतां सुमूढानां प्रजां प्रज्ञां यशः श्रियम् ॥५८॥ आयुष्यं बलमारोग्यं निकृन्तति यमः स्वयम् । अनध्याये तु योऽधीते तं विद्याद्ब्रह्मघातकम् ॥५९॥ न तं संभाष्येद्विप्र न तेन सह संवसेत् । कुण्डगोलकयोः केचिज्जडादीनां च नारद ॥६०॥ वदन्ति चोपनयनं तत्पुत्रादिषु केचन । अनधीत्य तु यो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ॥६१॥ शूद्रतुल्यः स विज्ञेयो नरकस्य प्रियोऽतिथिः । अनधीतश्रुतिर्विप्र आचारं प्रतिपद्यते ॥६२॥ नाचारफलमाप्नोति यथा शूद्रस्तथैव सः । नित्यं नैमित्तिकं काम्यं यच्चान्यत्कर्म वैदिकम् ॥६३॥ अनधीतस्य विप्रस्य सर्वं भवति निष्फलम् । शब्दब्रह्ममयो विष्णुर्वेदः साक्षाद्धरि स्मृतः ॥६४॥ वेदाध्यायी ततो विप्रः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥६५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे स्मार्त्ताचारेषु वर्णाश्रमधर्मेष्व- ध्ययनादिधर्मनिरूपणं नाम पंचविंशोऽध्यायः ॥२५॥
अक्षय होता है ॥५४-५१॥ अब मैं मन्वादि तिथियों को बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। आश्विन शुक्ल की नवमी, कार्तिक शुक्ल की द्वादशी, चैत्र और भाद्रपद की तृतीया, आषाढ़ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण-कृष्णाष्टमी, आषाढ़ी पूर्णिमा, फाल्गुन की अमावस्या, पौष शुक्ल एकादशी, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ की पूर्णिमा, ये मन्वादि तिथियाँ हैं । इन पर्वों को दिया हुआ दान अक्षय होता है ॥५२-५५॥ मन्वादि और युगादि तिथियों में द्विजों को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। मुनि ! श्राद्ध में निमन्त्रित होने पर, चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय, दोनों अयनों के समय, भूकम्प, गलग्रह और दुर्दिन में कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए ॥५६-५७॥ नारद ! इन उपर्युक्त अनध्याय के दिनों में अध्ययन करने वाले अविवेकी जनों की सन्तति, प्रज्ञा, यश, लक्ष्मी, आयु, बल, आरोग्य इन सबको यम स्वयं नष्ट कर देते हैं। जो अनध्याय के दिन पढ़ता है उसको ब्रह्मघातक समझना चाहिए । विप्र ! न तो उनके साथ बातचीत करनी चाहिए और न उनके साथ रहना ही चाहिए । नारद ! कुछ लोग कुण्ड, गोलक और जड़ पुरुषों का भी उपनयन करना चाहते हैं और कुछ उनके पुत्रों का । जो विप्र वेदों का अध्ययन न कर दूसरे विषयों में व्यर्थ परिश्रम करता है वह शूद्र के समान है और वह नरकगामी होता है ॥५८-६१३॥ जो विप्र वेदों को बिना पढ़े आचार पालन करता है वह कभी भी आचार पालन का फल नहीं पाता है वह तो उसी प्रकार है जैसे शूद्र । अशिक्षित विप्रों का नित्य नैमित्तिक, काम्य अथवा जो कुछ वैदिक कर्म हैं वे सब निष्फल होते हैं । विष्णु शब्द ब्रह्ममय हैं, वेद साक्षात् हरि कहे गए हैं और वेदाध्यायी विप्र सब मनोरथों को प्राप्त करता है ॥६२-६५॥ श्री नारदीय महापुराण में स्मार्ताचार और आश्रम धर्म निरूपण नामक पचीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२५॥