भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

१६६ षड्विंशोऽध्यायः भर्तृपुत्रेषु या नारी सर्वदा निष्ठुरा भवेत् । परानुकूलिनी या च सर्वथा तां परित्यजेत् ॥१४॥ विवाहाश्चाष्टधा ज्ञेया ब्राह्माद्या मुनिसत्तम । पूर्वः पूर्वो वरो ज्ञेयः पूर्वाभावे परः परः ॥१५॥ ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गांधर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमो मतः ॥१६॥ ब्राह्मेण च विवाहेन वैवाह्यो वै द्विजोत्तमः । दैवेनाप्यथवा विप्र केचिदार्षं प्रचक्षते ॥१७॥ प्राजापत्यादयो विप्र विवाहाः पंच गर्हिताः । अभावेषु तु पूर्वेषां कुर्यादेव परांबुधः ॥१८॥ यज्ञोपवीतद्वितयं सोत्तरीयं च धारयेत् । सुवर्णकुण्डले चैव धौतवस्त्रद्वयं तथा ॥१९॥ अनुलेपनलिप्तांगः कृत्तकेशनखः शुचिः । धारयेद्वैणवं दंडं सोदकं च कमंडलुम् ॥२०॥ उष्णीषममलं छत्रं पादुके चाप्युपानहौ । धारयेत्पुष्पमाल्ये च सुगंधं प्रियदर्शनः ॥२१॥ नित्यं स्वाध्यायशीलः स्याद्यथाचारं समाचरेत् । परान्नं नैव भुञ्जीत परवादं च वर्जयेत् ॥२२॥ पादेन नाक्रमेत्पादमुच्छिष्टं नैव लंघयेत् । न संहताभ्यां हस्ताभ्यां कंडूयेदात्मनः शिरः ॥२३॥ पूज्यं देवालयं चैव नापसव्यं व्रजेद्विजः । देवार्चाचमनस्नानव्रतश्राद्धक्रियादिषु ॥२४॥ न भवेन्मुक्तकेशश्च नैकवस्त्रधरस्तथा । नारोहेदुष्ट्रयानं च शुष्कवादं च वर्जयेत् ॥२५॥ अन्यस्त्रियं न गच्छेच्च पैशून्यं परिवर्जयेत् । नापसव्यं व्रजेद्विप्र गोऽश्वत्थानलपर्वतान् ॥२६॥ चतुष्पथं चैत्यवृक्षं देवखातं नृपं तथा । असूयां मत्सरत्वं च दिवास्वापं च वर्जयेत् ॥२७॥ न वदेत्परपापानि स्वपुण्यं न प्रकाशयेत् । स्वकं नाम स्वनक्षत्रं मानं चैवातिगोपयेत् ॥२८॥ न दुर्जनैः सह वसेन्नाशास्त्रं शृणुयात्तथा । आसवद्यूतगीतेषु द्विजस्तु न रतिं चरेत् ॥२९॥

जो स्त्री पति और पुत्र से सर्वथा निष्ठुर और दूसरे के अनुकूल रहे तो उसको सदा के लिए छोड़ दे ॥१०-१४॥ मुनिश्रेष्ठ ! ब्राह्म आदि आठ प्रकार के विवाह बतलाये गए हैं। इनमें पर की अपेक्षा पूर्व को श्रेष्ठ माना गया है । पूर्व के अभाव में पर वाला ही ग्राह्य होता है। ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस और आठवां पैशाच विवाह है । द्विजोत्तम ब्राह्म विवाह विधि से ही विवाह करे । विप्र ! अथवा किसी के मत से दैव और आर्ष भी ब्राह्मण के लिए ग्राह्य माना गया है । विप्र ! प्राजापत्य आदि पांच विवाह निन्दित हैं, परन्तु पूर्व के अभाव में पर को ही बुधजन अपनायें ॥१५-१८॥ बुध जन दो यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र सहित दो धोतियां और सोने के कुण्डल धारण करें । अंगों में सर्वदा सुगन्धित लेप लगावे, केश और नख को कटा कर सर्वदा पवित्र रहे । बाँस की छड़ी, शुद्ध कमण्डलु, स्वच्छ पगड़ी, छाता, खड़ाऊं और जूता पहने, पुष्प या पुष्प माला धारण करे सदा सुगंधित द्रव्य (इत्र आदि) लगाकर अपने को सौम्य और प्रिय दर्शन बनाये रहे । सर्वदा स्वाध्याय करता रहे और देशानुकूल आचरण करे । दूसरे का अन्न न खावे और दूसरों की निन्दा तो सर्वथा ही छोड़ देनी चाहिए ॥१६-२२॥ अपने पैर से पैर को न मारे और न तो जूठे भोजन को ही लांघे । अपने शिर को मिले हुए दोनों हाथों से न खुजलाये । द्विज पूज्य मन्दिरों में अपसव्य (उल्टा) होकर न जाये । देवार्चन, आचमन, स्नान, व्रत और श्राद्ध में केशों को न बिखेरे तथा केवल एक वस्त्र ही न पहने । ऊँट की सवारो न करे । और न तो शुष्कवाद ही करे । पर स्त्री के पास न जाय और न तो चुगली करे । विप्र ! अपसव्य होकर गौ, अश्वत्थ, अग्नि और पर्वत के समीप न जाय ॥२३-२६॥ चौराहा, चैत्यवृक्ष (बोधिवट और बुद्ध समाधि के समोप के वृक्ष), देव कुण्ड अथवा गुफा, राजा, छिद्रान्वेषण, मात्सर्य और दिन का सोना सर्वथा छोड़ देना चाहिए । दूसरों के पापों को न कहे और न अपने पुण्य को प्रकट करे । नाम, नक्षत्र और मान को गुप्त ही रखना चाहिए । दुर्जनों के साथ न रहे, न तो २२—ना० पु०