भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

१७० नारदीयपुराणम् आर्द्रान्स्थि च तयोच्छिष्टं शूद्रं च पतितं तथा । सर्पं च श्वशणं स्पृष्ट्वा सचैलं स्नानाचरेत् ॥३०॥ चितिं च चितिकाष्ठं च यूपं चांडालमेव च । स्पृष्ट्वा देवलकं चैव सवासा जलमाविशेत् ॥३१॥ दीपखट्वातनुच्छायाकेशवस्त्रकटोदकम् । अजामार्जनिमार्जाररेणुदैवं शुभं हरेत् ॥३२॥ शूर्पवातं प्रेतधूमं तथा शूद्रान्नभोजनम् । वृषलीपतिसङ्गं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥३३॥ असच्छास्त्रार्थमननं खादनं नखकेशयोः । तथैव नग्नशयनं सर्वदा परिवर्जयेत् ॥३४॥ शिरोभ्यंगावशिष्टेन तैलेनांगं न लेपयेत् । ताम्बूलमशुचिं नाद्यात्तथा सुप्तं न बोधयेत् ॥३५॥ नाशुद्धोऽग्निं परिचरेत्पूजयेद्गुरुदेवताः । न वामहस्तेनैकेन पिबेद्वक्त्रेण वा जलम् ॥३६॥ न चाक्रमेदगुरोश्छायां तदाज्ञां च मुनीश्वर । न निंदेद्योगिनो विप्रान्व्रतिनोऽपि यतींस्तथा ॥३७॥ परस्परस्य मर्माणि न कदापि वदेद्द्विजः । दर्श च पौर्णमास्यां च यागं कुर्याद्यथाविधि ॥३८॥ उपासनं च होतव्यं सायं प्रातर्द्विजातिभिः । उपासनपरित्यागी सुरापीत्युच्यते बुधैः ॥३९॥ अयने विषुवे चैव युगादिषु चतुर्ष्वपि । दर्श च प्रेतपक्षे च श्राद्धं कुर्याद्गृही द्विजः ॥४०॥ मन्वादिषु मृताहे च अष्टकासु च नारद । नवधान्ये समायाते गृही श्राद्धं समाचरेत् ॥४१॥ श्रोत्रिये गृहमायाते ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः । पुण्यक्षेत्रेषु तीर्थेषु गृही श्राद्धं समाचरेत् ॥४२॥ यज्ञो दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् । वृथा भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुंडूं विना कृतम् ॥४३॥ ऊर्ध्वपुंडूं च तुलसीं श्राद्धे नेच्छंति केचन । वृथाचारः परित्याज्यस्तमाच्छ्रेयोऽर्थिभिर्द्विजैः ॥४४॥ इत्येवमादयो धर्माः स्मृतिमार्गप्रचोदिताः । कार्या द्विजातिभिः सम्यक्सर्वकर्मफलप्रदाः ॥४५॥

शास्त्र विरुद्ध बातों को ही सुने। द्विज जुआ और अश्लील गीतों में रुचि न रखे । गीली हड्डी, जूठा भोजन, शूद्र, पतित, साँप और कुत्ते के छू जाने पर सचैल स्नान करना चाहिए ॥२७-३०॥ चिता, चिता का काठ, यूप, चाण्डाल, पुजारी के स्पर्श हो जाने पर जल में वस्त्र सहित डूबकी लगावे । दीपक, खटिया, परछाईं, केश, वस्त्र और चटाई का जल, बकरी, झाड़ू और बिल्ली के शरीर की धूलि मनुष्य के भाग्य और कल्याण को नष्ट कर देती है। सूप की वायु, प्रेत (चिता) का धुआं, शूद्रान्न-भोजन, शूद्रा-पति का साथ दूर से छोड़ देना चाहिए । गन्दी पुस्तकों का पढ़ना, नख और केश को मुख से चबाना और नंगे ही सोना सर्वदा निषिद्ध है । शिर पर लगाने से बचे हुए तेल को अपने शरीर में नहीं लगाना चाहिए, न तो अशुद्ध पान ही खाना चाहिए। सोये हुए को जगाना भी उचित नहीं ॥३१-३५॥स्वयं अशुद्ध रहकर अग्नि, गुरु और देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए । बायें हाथ से, एक हाथ से अथवा पात्र को मुंह में लगाकर नहीं पीना चाहिए । मुनीश्वर ! गुरु की छाया और आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । योगी, व्रती, ब्राह्मण और संन्यासियों की निन्दा नहीं करनी चाहिए । द्विज एक दूसरे के रहस्य या मर्मपीड़ा पहुँचाने वाली बातें न करे । शास्त्रानुसार पूर्णिमा और अमावास्या को पौर्णमास और दर्श यज्ञ करे । द्विज प्रातः और सायंकाल की सन्ध्या तथा हवन करे । सन्ध्या न करने वाले को पंडित मद्यप कहते हैं ॥३६-३६॥ गृहस्थ द्विज अयन, विषुव, चारों युगादि तिथियों को, अमावस्या और पितृपक्ष में अवश्य श्राद्ध करे । नारद ! गृहस्थ, मन्वादितिथियों में, मृत्यु के दिन, अष्टमी और नया अन्न घर आने पर श्राद्ध अवश्य करे । किसी श्रोत्रिय के घर आने पर चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय, पुण्य क्षेत्रों और तीर्थों में गृहस्थ अवश्य श्राद्ध करे । बिना ऊर्ध्व पुंड्र तिलक लगाये यज्ञ, दान, तप, होम, स्वाध्याय और पितृतर्पण आदि कर्म निष्फल हो जाते हैं। कुछ विद्वान् ऊर्ध्व पुंड्र तुलसी की माला को श्राद्ध के लिए अपेक्षित नहीं समझते । इसलिए श्रेय की कामना करने वाले द्विज व्यर्थ के आचारों का सर्वथा परित्याग कर दें ॥४०-४५॥ ये उपर्युक्त धर्म स्मृतिमार्ग के अनुकूल