बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदाचारपरा ये तु तेषां विष्णुः प्रसीदति । विष्णौ प्रसन्नतां याते किमसाध्यं द्विजोत्तम ॥४६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे स्मार्त्तधर्मेषु वेदाध्ययनादिकस्य गृहस्थधर्मस्य च निरूपणं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥
सप्तविंशोऽध्यायः सनक उवाच गृहस्थस्य सदाचारं वक्ष्यामि मुनिसत्तम । यद्गतां सर्वपापानि नश्यंत्येव न संशयः ॥१॥ ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय पुरुषार्थाविरोधिनीम् । वृत्तिं संचिंतयेद्विप्र कृतकेशप्रसाधनः ॥२॥ दिवा संध्यासुकर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः । कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥३॥ शिरः प्रावृत्य वस्त्रेण ह्यंतर्द्धाय तृणैर्महीम् । वहन्काष्ठं करेणैकं तावन्मौनी भवेद्द्विजः ॥४॥ पथि गोष्ठे नदीतीरे तडागगृहसन्निधौ । तथा वृक्षस्यच्छायायां कांतारे वह्निसन्निधौ ॥५॥ देवालये तथोद्याने कृष्टभूमौ चतुष्पथे । ब्राह्मणानां समीपे च तथा गोगुरुयोषिताम् ॥६॥ तुषांगारकपालेषु जलमध्ये तथैव च । एवमादिषु देशेषु मलमूत्रं न कारयेत् ॥७॥ शौचे यत्नः सदा कार्यः शौचमूलो द्विजः स्मृतः । शौचाचारविहीनस्य समस्तं कर्म निष्फलम् ॥८॥
और सब कर्म फलों के देने वाले हैं । अतएव द्विज इनका अवश्य पालन करें । द्विजोत्तम ! सदाचारी व्यक्ति पर विष्णु सदा प्रसन्न रहते हैं, विष्णु के प्रसन्न हो जाने पर संसार में असाध्य ही क्या है ॥४५-४६॥ श्री नारदीय महापुराण में वेदाध्ययन और गृहस्थधर्म निरूपण नामक छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥
अध्याय २७ गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी के धर्म का निरूपण सनक बोले—मुनिश्रेष्ठ ! गृहस्थ के सदाचारों का वर्णन कर रहा हूँ । जिसके कथन मात्र से मनुष्यों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं । विप्र ! प्रातःकाल उठकर पहले अपने केशों को कंघी करे और तब पुरुषार्थ के अनुकूल कार्यों पर विचार करे । दिन में और सन्ध्या समय उत्तराभिमुख होकर कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाकर और रात्रि में दक्षिणाभिमुख होकर लघुशंका आदि करे ॥१-३॥ उस समय वस्त्र से अपना शिर ढँक ले, घास या तृण को पृथ्वी पर रखकर एक हाथ में काठ ले और मूत्रत्याग आदि करते समय तक मौन रहे । मार्ग में, गोशाला में, नदी तीर में, तालाब और घर के समीप, वृक्षों की छाया में, वन में, अग्नि के समीप, देवालय में, उद्यान में, जुती भूमि पर, चौराहे पर, ब्राह्मणों के समीप, गाय, गुरु और स्त्रियों के पास, भूसा, अंगार, कपाल, जल के बीच और अन्य पवित्र स्थानों में मलमूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए । पवित्रता पर सर्वदा ध्यान देना चाहिए । क्योंकि द्विज पवित्रता के ही कारण श्रेष्ठ माने गये हैं । शुद्धता और आचार से हीन व्यक्ति के सारे कार्य निष्फल