बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० नारदीयपुराणम् वृषलीसतिपोष्टा च वृषलीपतिरेव च । कुंडश्च गोलकश्चैव ह्याज्यानां च याजकः ॥१४॥ दंभाचारो वृथामुंडी ह्यन्यस्त्रीधनतत्परः । विष्णुभक्तिविहीनश्च शिवभक्तिपराङ्मुखः ॥१५॥ वेदविक्रयिणश्चैव व्रतविक्रयिणस्तथा । स्मृतिविक्रयिणश्चैव मंत्रविक्रयिणस्तथा ॥१६॥ गायकाः काव्यकर्त्तारो भिषक्छास्त्रोपजीविनः । वेदनिंदापरश्चैव ग्रामारण्यप्रदाहकः ॥१७॥ तथातिकामुकश्चैव रसविक्रयकारकः । कूटयुक्तिरतश्चैव श्राद्धे वर्ज्याः प्रयत्नतः ॥१८॥ निमंत्रयीत पूर्वेद्युस्तस्मिन्नेव दिनेऽथवा । निमंत्रितो भवेद्विप्रो ब्रह्मचारी जितेंद्रियः ॥१९॥ श्राद्धे क्षणस्तु कर्तव्यः प्रसादश्चेति सतम । निमंत्रयेद्द्विजं प्राज्ञं दर्भपाणिर्जितेंद्रियः ॥२०॥ ततः प्रातः समुत्थाय प्रातःकृत्ये समाप्य च । श्राद्धं समाचरेद्विद्वान्काले कुतपसंज्ञिते ॥२१॥ दिवसस्याष्टमे काले यदा मंदायते रविः । स कालः कुतपस्तत्र पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥२२॥ अपराह्नः पितॄणां तु दत्तः कालः स्वयंभुवा । तत्काल एव दातव्यं कव्यं तस्माद्द्विजोत्तमैः ॥२३॥ यत्कव्यं दीयते द्रव्यैरकाले मुनिसत्तम । राक्षसं तद्धि विज्ञेयं पितॄणां नोपतिष्ठति ॥२४॥ कव्यं दत्तं तु सायाह्ने राक्षसं तद्भवेदपि । दाता नरकमाप्नोति भोक्ता च नरकं व्रजेत् ॥२५॥ क्षयाहस्य तिथेर्विप्र यदि दंडमितिंर्भवेत् । विद्धापराह्निकायां तु श्राद्धं कार्यं विजानता ॥२६॥ क्षयाहस्य तिथिर्या तु ह्यपराह्नद्वये यदि । पूर्वे क्षये तु कर्त्तव्या वृद्धौ कार्या तथोत्तरा ॥२७॥ मुहूर्त्तद्वितये पूर्वदिने स्यादपरेऽहनि । तिथिः सायाह्नगा यत्र परा कव्यस्य विश्रुता ॥२८॥ किंचित्पूर्वदिने प्राहुर्मुहूर्त्तद्वितये सति । नैतन्मतं हि सर्वेषां कव्यदाने मुनीश्वर ॥२९॥
पालन करने वाला, वृषली-पति, कुंड (पति के जीवित रहते अन्य पुरुष से उत्पन्न किया हुआ पुत्र), गोलक (पति के मर जाने पर अन्य से उत्पन्न किया हुआ पुत्र ) अपात्रों से यज्ञ करने वाला, दम्भी, व्यर्थ ही मुण्डन कराने वाला अन्यस्त्रीधनलोलुप, विष्णुभक्तिशून्य, शिवभक्ति-पराङ्मुख, वेदविक्रयी, व्रतविक्रयी, स्मृति और मंत्र विक्रयी, गायक, भाट, वैद्य, वेद-निन्दक, गांव और वन में आग लगाने वाला, अति कामुक, रस-विक्रेता, कूटनीतिपरा- यण, इतने लोगों को श्राद्ध में किसी भी प्रकार से निमन्त्रण नहीं देना चाहिए ॥११-१८॥ श्राद्ध के एक दिन पहले अथवा उसी दिन निमन्त्रण दे देना चाहिए । निमन्त्रित विप्र को भी ब्रह्मचारी और संयमी होना चाहिए। मुनि- वर्य ! श्राद्ध में उत्सव और आनन्द भी मनाना चाहिए। जितेन्द्रिय श्राद्धकर्त्ता हाथ में कुशा लेकर विज्ञ ब्राह्मण को निमन्त्रण दे । तदनन्तर प्रातः काल उठकर प्रातः कालीन क्रिया समाप्त करने के बाद विद्वान् व्यक्ति कुतप नामक काल में श्राद्ध करे ॥१९-२१॥ आठ घड़ी दिन बीतने पर जब सूर्य मन्द होने लगता तब वही काल कुतप कहलाता है। उस समय पितरों के उद्देश्य से दिया हुआ पदार्थ अक्षय हो जाता है। ब्रह्मा ने पितरों के लिए अपराह्न काल ही निश्चित किया। इसलिए उत्तम द्विज उसी समय पितरों को कव्य (पितरों को देय पदार्थ) प्रदान करें । मुनिश्रेष्ठ ! जो कव्य पदार्थ अकाल में दिये जाते हैं वे राक्षसों के योग्य हो जाते हैं और पितरों को प्राप्त नहीं होते ॥२२-२४॥ सायंकाल का दिया हुआ कव्य राक्षसों के योग्य तो हो ही जाता है साथ ही उसका दाता और भोक्ता भी नरकलोक में जाता है । यदि क्षयाह तिथि केवल एक दण्ड ही रहे तो विद्वान् व्यक्ति उसी दिन अपराह्न काल में श्राद्ध करें । क्षयाह की तिथि यदि दो अपराह्नकाल में हो तो पूर्व क्षयाह तिथि में कुछ श्राद्ध किया कर दे और शेष कर्म दूसरे दिन अपराह्न में करे । यदि क्षयाह की तिथि पहले दिन अपराह्न में दो मुहूर्त्त हो तो सायंकाल में पड़ने वाली तिथि के दिन ही कव्य दान श्रेष्ठ माना गया है ॥२५-२८॥ मुनीश्वर ! कुछ लोग पहले दिन को ही दो मुहूर्त्त क्षयतिथि के रहने पर भी कव्य के लिए श्रेष्ठ मानते हैं परन्तु यह सर्वमान्य मत नहीं है।