बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः सनक उवाच शृणुष्व मुनिशार्दूल श्राद्धस्य विधिमुत्तमम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥१॥ क्षयाहपूर्वदिवसे स्नात्वा चैकाशनी भवेत् । अधःशायी ब्रह्मचारी निशि विप्रान्निमंत्रयेत् ॥२॥ दन्तधावनताम्बूले तैलाभ्यंगं तथैव च । रत्योषधिपरान्नानि श्राद्धकर्त्ता विवर्जयेत् ॥३॥ अध्वानं कलहं क्रोधं व्यवायं च धुरं तथा । श्राद्धकर्त्ता च भोक्ता च दिवास्वापं च वर्जयेत् ॥४॥ श्राद्धे निमंत्रितो यस्तु व्यवायं कुरुते यदि । ब्रह्महत्यामवाप्नोति नरकं चापि गच्छति ॥५॥ श्राद्धे नियोजयेद्विप्रं श्रोत्रियं विष्णुतत्परम् । यथास्वाचारनिरतं प्रशांतं सत्कुलोद्भवम् ॥६॥ रागद्वेषविहीनं च पुराणार्थविशारदम् । त्रिमधुत्रिसुपर्णज्ञं सर्वभूतदयापरम् ॥७॥ देवपूजारतं चैव स्मृतितत्त्वविशारदम् । वेदांततत्त्वसंपन्नं सर्वलोकहिते रतम् ॥८॥ कृतज्ञं गुणसंपन्नं गुरुशुश्रूषणे रतम् । परोपदेशनिरतं सच्छास्त्रकथनंस्तथा ॥६॥ एते नियोजितव्या वै श्राद्धे विप्रा मुनीश्वर । श्राद्धे वर्ज्यान्प्रवक्ष्यामि शृणु तान्सुसमाहितः ॥१०॥ न्यूनांगश्चाधिकांगश्च कदर्यो रोगितस्तथा । कुष्ठी च कुनखी चैव लंबकर्णः क्षतव्रतः ॥११॥ नक्षत्रपाठजीवी च तथा च शवदाहकः । कुवादी परिवेत्ता च तथा देवलकः खलः ॥१२॥ निंदकोऽमर्षणो धूर्तस्तथैव ग्रामयाजकः । असच्छास्त्राभिनिरतः परान्ननिरतस्तथा ॥१३॥ अध्याय २८ सनक बोले—मुनिशार्दूल ! सुनो। अब मैं श्राद्ध की उत्तम विधि का वर्णन कर रहा हूँ। जिसको सुन कर निःसन्देह मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। क्षयाह (निधन तिथि) के पूर्व दिन स्नान कर एक समय ही भोजन करे, रात में भूमि पर सोये और उसी दिन ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे। श्राद्ध करने वाला दातौन, पान, तेल मर्दन, रति, ओषधि और परान्न भोजन छोड़ दे। श्राद्धकर्त्ता और श्राद्धभोजी दोनों के लिए, मार्ग (रास्ता) चलना), कलह, क्रोध, मैथुन भार (वहन) और दिन का सोना वर्जित है ॥१-४॥ श्राद्ध में निमन्त्रित होने पर भी यदि वह व्यक्ति स्त्री संभोग करता है तो वह ब्रह्म-हत्या का भागी और नरक गामी होता है। श्राद्ध में वेदा- ध्यायी, विष्णुभक्त, कुलीन, सदाचारी और शान्त ब्राह्मण को निमन्त्रित करना चाहिए। मुनीश्वर ! राग-द्वेष से हीन, पुराणवेत्ता त्रिमधु (ऋग्वेद का एक अंश) और त्रिसुपर्ण ऋग्वेद के दशम मंडल के तीन विशिष्ट मन्त्र का ज्ञाता, सब पर दया करने वाला, देव पूजा में निरत रहने वाला, स्मृतितत्त्वज्ञ, वेदान्त के तत्त्वों का ज्ञाता, लोक- हितैषी, कृतज्ञ, गुणी, गुरु-सेवक, सत् शास्त्रों का उपदेशक—इतने विप्र श्राद्ध में निमन्त्रित करने के योग्य हैं। अब श्राद्ध में किनको निमन्त्रण नहीं देना चाहिए, इसको कह रहा हूँ, सावधान होकर सुनो ॥५-१०॥ हीनाङ्ग, अधिकांग, कायर, रोगी, कोढ़ी, कुनखी, लंबकर्ण, व्रत को भंग करने वाला, ज्योतिषी, शवदाह करने वाला, कुतर्क करने वाला, परिवेत्ता (अविवाहित बड़े भाई के रहते विवाहित छोटा भाई ) पुजारी, दुष्ट, निंदक, क्रोधी, धूर्त, ग्राम-पुरोहित, असत् शास्त्रों (के अध्ययन) में निरत, परान्नभोजी, शूद्रा की सन्तानों का