भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

१७८ नारदीयपुराणम् एकरात्रं वसेद्ग्रामे त्रिरात्रं नगरे तथा । भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्यतिः ॥९५॥ अनिन्दितद्विजगृहे व्यंगारे भुक्तवर्जिते । विवादरहिते चैव भिक्षार्थं पर्यटेद्यतिः ॥९६॥ भवेत्त्रिसवणस्नायी नारायणपरायणः । जपेच्च प्रणवं नित्यं जितात्मा विजितेन्द्रियः ॥९७॥ एकान्नादी भवेद्यस्तु कदाचिल्लंपटो यतिः । न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तायुतैरपि ॥९८॥ लोभाद्यदि यतिर्विप्र तनुपोषणपरो भवेत् । स चंडालसमो ज्ञेयो वर्णाश्रमविगर्हितः ॥९९॥ आत्मानं चिंतयेद्देवं नारायणमनामयम् । निर्द्वंद्वं निर्ममं शांतं मायातीतममत्सरम् ॥१००॥ अव्ययं परिपूर्णं च सदानन्दैकविग्रहम् । ज्ञानस्वरूपममलं परं ज्योतिः सनातनम् ॥१०१॥ अविकारमनाद्यंतं जगच्चैतन्यकारणम् । निर्गुणं परमं ध्यायेदात्मानं परतः परम् ॥१०२॥ पठेदुपनिषद्वाक्यं वेदान्तार्थांश्च चिंतयेत् । सहस्रशीर्षं देवं च सदा ध्यायेज्जितेन्द्रियः ॥१०३॥ एवं ध्यानपरो यस्तु यतिर्विगतमत्सरः । स याति परमानंदं परं ज्योतिः सनातनम् ॥१०४॥ इत्येवमाश्रमाचाराञ्यः करोति द्विजः क्रमात् । स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥१०५॥ वर्णाश्रमाचाररताः सर्वपापविवर्जिताः । नारायणपरा यांति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१०६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सदाचारेषु गृहस्थवानप्रस्थयति- धर्मनिरूपणं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७॥ प्रति एवं मान एवं अपमान में सम भाव रखे । किसी भी ग्राम में एक रात ही रहे । नगर में तीन रात तक रह सकता है। वह नित्य प्रति भिक्षा द्वारा ही अपना भोजन प्राप्त करे, एकान्न भोजन न करे। यति अनिन्दित द्विज के घर, व्यंगार (रसोई बनने के बाद) भोजन के उपरान्त जहाँ किसी प्रकार का कलह न हो भिक्षा के लिए जाय ।९४-९६॥ वह जितात्मा संयमपूर्वक नारायण के ध्यान में मग्न हो तीनों काल स्नान करे और ओंकार का जप करे। जो एक प्रकार का ही अन्न भोजन करने वाला यदि कदाचित् लम्पट हो जाय तो उसका निस्तार दश हजार प्रायश्चित्तों के द्वारा भी नहीं हो सकता । विप्र ! जो यति लोभ वश केवल अपने शरीर के भरण पोषण में ही लगा रहता है वह वर्णाश्रम धर्म को कलंकित करता है और वह चाण्डाल के समान पतित है ॥९७-९९॥ संन्यासी सर्वदा आत्मस्वरूप, अनामय, निर्द्वन्द्व, निर्मम, शान्त, मायातीत, मात्सर्यरहित, सदानन्द स्वरूप, ज्ञानरूप, अमल, पर और सनातन, ज्योतिः स्वरूप नारायण का चिन्तन करे । अविकार, आदिवन्तोहीन, जगत् चैतन्य का एक मात्र कारण, निर्गुण, परम, परात्पर आत्मा का ध्यान करे ॥१००-१०२॥ सर्वदा उपनिषद् वाक्यों को पढ़े और वेदान्तार्थ का चिन्तन करे । जितेन्द्रिय संन्यासी सहस्र शिर वाले देव का सदा ध्यान करे। जो उदार संन्यासी इस भाँति ध्यानमग्न रहता है वह परमानन्द स्वरूप परम सनातन ज्योति को प्राप्त करता है । जो द्विज इस प्रकार कहे गए आश्रमाचारों का पालन करता है, वह उस परमस्थान को प्राप्त करता है जहाँ जाकर किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रह जाती । वर्णाश्रमाचारों का पालन करने वाले, सब पापों से रहित और नारायण परायण व्यक्ति विष्णु के परमधाम को प्राप्त करते हैं ॥१०३-१०६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में आश्रमधर्मनिरूपण नामक सत्ताईसवां अध्याय समाप्त ॥२७॥