भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

सप्तविंशोऽध्यायः १७७ अपोशाने वाचमने अद्यद्रव्येषु च द्विजः । शब्दं न कारयेद्विप्रस्तं कुर्वन्नारकी भवेत् ॥८०॥ पथ्यमन्नं प्रभुञ्जीत वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् । अमृतोपस्तरणमसि अपोशानं भुजेः पुरः ॥८१॥ अमृतापिधानमसि भोज्यान्तेऽपः सकृत्पिबेत् । प्राणाया आहुतीर्दत्त्वाचास्य भोजनमाचरेत् ॥८२॥ ततश्चाचम्य विप्रेन्द्र शास्त्रचिन्तापरो भवेत् । रात्रावपि यथाशक्ति शयनासनभोजनैः ॥८३॥ एवं गृही सदाचारं कुर्यात्प्रतिदिनं मुने । यदाऽऽचारपरित्यागो प्रायश्चित्ती तदा भवेत् ॥८४॥ दूषितां स्वतनुं दृष्ट्वा पलिताद्यैश्च सत्तम । पुत्रेषु भार्यां निःक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥८५॥ भवेत्त्रिववणस्नायी नखश्मश्रुजटाधरः । अधःशायी ब्रह्मचारी पञ्चयज्ञपरायणः ॥८६॥ फलमूलाशनो नित्यं स्वाध्यायनिरतस्तथा । दयावान्सर्वभूतेषु नारायणपरायणः ॥८७॥ वर्जयेद्ग्रामजातानि पुष्पाणि च फलानि च । अष्टौ ग्रासांश्च भुञ्जीत न कुर्याद्रात्रिभोजनम् ॥८८॥ अत्यन्तं वर्जयेत्तैलं वानप्रस्थसमाश्रमी । व्यवायं वर्जयेच्चैव निद्रालस्ये तथैव च ॥८९॥ शंखचक्रगदापाणिं नित्यं नारायणं स्मरेत् । वानप्रस्थः प्रकुर्वीत तपश्चांद्रायणादिकम् ॥६०॥ सहेत शीतातपादिं वह्निं परिचरेत्सदा । यदा मनसि वैराग्यं जातं सर्वेषु वस्तुषु ॥६१॥ तदैव संन्यसेद्विप्र पतितस्त्वन्यथा भवेत् । वेदांताभ्यासनिरतः शांतो दांतो जितेंद्रियः ॥६२॥ निर्द्वन्द्वो निरहंकारो निर्ममः सर्वदा भवेत् । शमादिगुणसंयुक्तः कामक्रोधविवर्जितः ॥६३॥ नग्नो वा जीर्णकौपीनो भवेन्मुंडो यतिर्द्विजः । समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ॥६४॥

फिर उसको दोबारा खाने वाला और नमक को बिना किसी भोज्य पदार्थ में मिलाकर खाने वाला व्यक्ति गोमांस- भोजी समझा जाता है ॥७८-७६॥ आपोशान (आचमन) करते समय भोजन और जल पीते समय किसी प्रकार की बातचीत न करे अन्यथा वह व्यक्ति पापी होता है। मौन होकर स्वास्थ्यप्रद भोजन करना चाहिए। भोज्य अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिए। भोजन के पहले 'अमृतोपस्तरणमसि' इस मन्त्र से आचमन करना चाहिए। भोजन के बाद 'अमृतापिधानमसि' इस मन्त्र को पढ़कर एक बार जल पीना चाहिए। 'प्राणाय स्वाहा' आदि मन्त्र पढ़कर पाँच बार अग्नि में आहुति देकर भोजन करना चाहिए ॥८०-८३॥ भोजनोपरान्त आचमन कर शास्त्र चिन्तन करना चाहिए। रात्रि में भी यथाशक्ति शयन, आसन और भोजन के साथ साथ नियमों का पालन करना चाहिए। मुने ! इस प्रकार गृहस्थ प्रति दिन सदाचार का पालन करे। जिस समय गृहस्थ आचार का त्याग कर देता है उस समय वह प्रायश्चित्त का भागी होता है। मुनिवर्य ! अपने शरीर में बुढ़ापे का लक्षण दिखाई पड़े तब अपने पुत्र पर स्त्री का भार छोड़कर या उसको साथ लेकर वन में चला जाय ॥८३-८५॥ वानप्रस्थाश्रम ग्रहण कर लेने पर तीनों काल स्नान करे, नख, जटा और दाढ़ी रखे, भूमि पर ही सोये और ब्रह्म- चर्य का पालन करे। पंचयज्ञों को करता हुआ नित्य फलमूल भोजन करे और स्वाध्याय में लगा रहे । नारायण का ध्यान करता हुआ सब प्राणियों पर दया भाव रखे। ग्राम्य पुष्पों और फलों का उपयोग न करे, केवल आठ कौर भोजन करे। रात्रि में भोजन करना उसके लिए सर्वथा निषिद्ध है। वानप्रस्थाश्रमी तैल का स्पर्श तक न करे, (मैथुन) निद्रा और आलस्य का सर्वथा परित्याग कर दे ॥८६-८६॥ नित्यप्रति शंख-चक्र-गदाधारी नारायण का स्मरण करे। वानप्रस्थ में चान्द्रायण आदि का तप करना चाहिए। सदा शीत, आतप आदि सहे और अग्नि परिचर्या (हवन) करे ॥६४-१०॥ विप्र ! जिस समय सब वस्तुओं से मन में वैराग्य हो जाय उसी समय संन्यास लेना चाहिए अन्यथा वह व्यक्ति पतित हो जाता है। संन्यासी वेदान्त के अध्ययन और मनन में लगा रहे। वह शान्त, दान्त, जितेन्द्रिय अहंकार रहित, निर्द्वन्द्व और निर्मम रहे। यति द्विज शम, दम आदि गुणों से युक्त होकर काम क्रोध आदि से दूर रहे ॥९०-६३॥ या तो वह नग्न रहे या पुराने वस्त्रों का कौपीन पहने और सर्वदा मुण्डी रहे । शत्रु और मित्र के २३--ना० पु०