बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ | नारदीयपुराणम् प्रातर्मध्यंदिने चैव गृहस्थः स्नानमाचरेत् । वानप्रस्थश्च देवर्षे स्नायात्त्रिसवणं यतिः ॥६४॥ आतुराणां तु रोगाद्यैः पांथानां च सकृन्मतम् । ब्रह्म यज्ञं ततः कुर्याद्धर्भापाणिर्मुनीश्वर ॥६५॥ दिवोदितानि कर्माणि प्रमादादकृतानि चेत् । शर्वर्याः प्रथमे यामे तानि कुर्याद्यथाक्रमम् ॥६६॥ नोपास्ते यो द्विजः संध्यां धूर्तबुद्धिरनापदि । पाषंडः स हि विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥६७॥ यस्तु संध्यादिकर्माणि कूटयुक्तिविशारदः । परित्यजति तं विद्यान्महापातकिनां वरम् ॥६८॥ ये द्विजा अभिभाषन्ते त्यक्तसंध्यादिकर्मणः । ते यांति नरकान्घोरान्यावच्चंद्रार्कतारकम् ॥६९॥ देवार्चनं ततः कुर्याद्वैश्वदेवं यथाविधि । तत्रत्यमतिथिं सम्यगन्नाद्यैश्च प्रपूजयेत् ॥७०॥ वक्तव्या मधुरा वाणी तेष्वभ्यागतेषु तु । जलान्नकंदमूलैर्वा गृहदानेन चार्चयेत् ॥७१॥ अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥७२॥ अज्ञातगोत्रनामानमन्यग्रामादुपागतम् । विपश्चितोऽतिथिं प्राहुर्विष्णुवत्तं प्रपूजयेत् ॥७३॥ स्वग्रामवासिनं त्वेकं श्रोत्रियं विष्णुतत्परम् । अन्नाद्यैः प्रत्यहं विप्रं पितॄनुद्दिश्य तर्पयेत् ॥७४॥ पंचयज्ञपरित्यागी ब्रह्महेत्युच्यते बुधैः । कुर्यादहरहस्तस्मात्पंचयज्ञान्प्रयत्नतः ॥७५॥ देवयज्ञो भूतयज्ञः पितृयज्ञस्तथैव च । नृयज्ञो ब्रह्मयज्ञश्च पंचयज्ञाःप्रचक्षते ॥७६॥ भृत्यमित्रादिसंयुक्तः स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । द्विजानां भोज्यमश्नीयात्पात्रं नैव परित्यजेत् ॥७७॥ संस्थाप्य स्वासने पादौ वस्त्रार्द्धं परिधाय च । मुखेन वमितं भुक्त्वा सुरापीत्युच्यते बुधैः ॥७८॥ खादिताद्धं पुनः खादेन्मोदकांश्च फलानि च । प्रत्यक्षं लवणं चैव गोमांसाशीति गद्यते ॥७६॥ गृहस्थ प्रातः और दोपहर को स्नान करे, परन्तु देवर्षि ! यति और वानप्रस्थाश्रमी तीनों काल स्नान करे। रोग आदि से पीड़ित और पथिक के लिए एक काल का स्नान भी मान्य है। मुनीश्वर ! इसके अनन्तर हाथ में कुशा लेकर ब्रह्मयज्ञ करना चाहिए। यदि प्रमाद वश दैनिक कर्म न हो पायें तो उन कर्मों को रात्रि के प्रथम प्रहर में क्रम पूर्वक करना चाहिए ॥६४-६६॥ जो धूर्त बुद्धि स्वस्थ रहकर भी सन्ध्योपासना नहीं करता उसको पाखण्डी और सब धर्मों से बहिष्कृत समझना चाहिए। जो कूटनीतिज्ञ सन्ध्यादि नित्य कर्मों को नहीं करता है उसको बहुत बड़ा महापातकी समझना चाहिए। जो द्विज सन्ध्या आदि कर्मों को त्यागे हुए द्विजों से बात करते हैं वे कल्पान्त तक घोर नरक में रहते हैं। सन्ध्या करने के अनन्तर यथा विधि वैश्व देव और देव पूजन करना चाहिए। और यदि कोई अतिथि आ जाय तो विधिवत् अन्न आदि सामग्री से उसकी सेवा करनी चाहिए ॥६७-७०॥ अतिथियों के आने पर मधुरवाणी द्वारा स्वागत करना चाहिए और जल, अन्न कन्द, मूल, फल अथवा अपने यहाँ रहने के लिए स्थान देकर उनकी सेवा करनी चाहिए। जिसके घर से कोई अतिथि निराश होकर चला जाता है वह उस गृहस्थ को अपना पाप दे देता और स्वयं उसके पुण्य को लेकर चला जाता है। दूसरे गाँव से आये हुए अज्ञात गोत्र और नाम वाले, व्यक्ति को ही विद्वान् लोग अतिथि कहते हैं। उसको विष्णु के समान समझकर सत्कार करना चाहिए ॥७१-७३॥ अपने ग्राम के एक श्रोत्रिय और विष्णुभक्त विप्र को प्रति दिन पितरों की तृप्ति के उद्देश्य से अन्न आदि से तृप्त करना चाहिए। पंच यज्ञ को न करने वाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहा जाता है। इसलिए प्रतिदिन यत्न पूर्वक पंच यज्ञों को करना चाहिए। देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ ये ही पंचयज्ञ कहे जाते हैं। स्वयं मौन होकर भृत्य और मित्र आदि के साथ भोजन करना चाहिए। द्विजों का भोज्य अन्न ही भोजन करना चाहिए। सत्पात्र का अनादर नहीं करना चाहिए ॥७४-७७॥ अपने आसन पर दोनों पैरों को रखकर, आधा वस्त्र पहन कर भोजन करने से और उगले हुए अन्न को पुनः खाने से मनुष्य मद्यप कहा जाता है, ऐसा पंडित लोग कहते हैं। मिठाई फल आदि को पहले आधा खाकर