भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

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सप्तविंशोऽध्यायः १७५ उदुत्यं चित्रं तच्चक्षुरित्येतत्त्रितयं जपेत् । सौराञ्छैवान् वैष्णवांश्च मंत्रानन्यांश्च नारद ॥५३॥ तेजोऽसि गायत्र्यसीति प्रार्थयेत्सवितुर्महः । ततोऽङ्गानि त्रिरादृत्य ध्यायेच्छक्तीस्तदात्मिकाः ॥५४॥ ब्रह्माणी चतुराननाक्षवलया कुम्भं करैः स्रुक्स्रुवौ, बिभ्राणा तरुणेंदुकान्तिवदना ऋग्रूपिणी बालिका । हंसारोहणकेलिखणखणमणेर्बिम्बार्चिता भूषिता, गायत्री परिभाविता भवतु नः संपत्समृद्ध्यै सदा ॥५५॥ रुद्राणी नवयौवना त्रिनयना वैयाघ्रचर्माम्बरा, खट्वांगत्रिशिखाक्षसूत्रवलयाऽभीतिश्रियै चास्तु नः । विद्युद्दामजटाकलापविलसद्बालेन्दुमौलिर्मुदा, सावित्री वृषवाहना सिततनुर्ध्येया यजूरूपिणी ॥५६॥ ध्येया सा च सरस्वती भगवती पीतांबरालंकृता, श्यामा श्यामतनुर्जरोंपरिलसद्गात्रांचिता वैष्णवी । तार्थ्यस्था मणिनूपुरांगदलसद्ग्रैवेयभूषोज्ज्वला, हस्तालंकृतशंखचक्रसुगदापद्मा श्रियै चास्तु नः ॥५७॥ एवं ध्यात्वा जपेत्तिष्ठन्प्रातर्मध्याह्नक तथा । सायंकाले समासीनो भक्त्या तद्गतमानसः ॥५८॥ सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् । त्रिपदां प्रणवोपेतां भूर्भुवः स्वश्वक्रमाम् ॥५९॥ षट्‌तारः संपुटो वापि व्रतिनश्च यतेर्जपः । गृहस्थस्य सतारः स्याज्जप्य एवंविधा मुने ॥६०॥ ततो जप्त्वा यथाशक्ति सवित्रे विनिवेद्य च। गायत्र्यै च सवित्रे च प्रक्षिपेदंजलिद्वयम् ॥६१॥ ततो विसृज्य तां विप्र उत्तरे इति मंत्रतः । ब्रह्मेशेन हरिणानुज्ञाता गच्छ सादरम् ॥६२॥ दिग्भ्यो दिग्देवताभ्यश्च नमस्कृत्य कृतांजलिः । प्रातरादेः परं कर्म कुर्यादपि विधानतः ॥६३॥ तच्चक्षुः आदि तीन मन्त्रों का जप करना चाहिए । इसके अतिरिक्त सूर्य के अथवा शिव और विष्णु के मन्त्रों का जप करना भी श्रेयस्कर है । 'तेजोसि गायत्र्यसि' इस मन्त्र से दिन में सूर्य की प्रार्थना करे । तदनन्तर अपने अंगों को तीन बार जल से परिवेष्टित कर काल के अनुरूप शक्ति का ध्यान करना चाहिए ॥५३-५४॥ ध्यान के मन्त्र— जो ब्रह्माणी चार मुख वाली, अक्ष का कंकण धारण करने वाली, हाथ में कलश, स्रुक् और स्रुवा को धारण करने वाली, बाल चन्द्रमा की कान्ति के समान मुख-कान्ति वाली, ऋक्स्वरूप और बालिका हैं, हंस पर आरोहण करते समय जिसके माला-मणियों से झन्कार की ध्वनि निकलती है, मणिबिम्बों से सुशोभित वे गायत्रीरूपिणी देवी सर्वदा हम लोगों को समृद्धि और विभव प्रदान करें ॥५५॥ नवयौवन से सुशोभित, तीन नेत्रों वाली, व्याघ्रचर्म का वस्त्र धारण करने वाली रुद्राणी--जिनके हाथों में खट्वांग अस्त्र, अग्नि और अक्षसूत्र का वलय है—हम लोगों को अभय और श्री प्रदान करें बिजली की भाँति चमकीले केशों से सुशोभित बाल चन्द्रमा को शिर पर धारण करने वाली यजुर्वेद स्वरूपिणी श्वेताङ्गी और बैल पर चढ़ी हुई सावित्रीदेवी का ध्यान करना चाहिए ॥५६॥ वह ध्यान करने योग्य, पीताम्बर से सुशोभित, मणि, नूपुर, अंगद (विजायठ) और हार से आभूषित, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाली श्यामा, वृद्धावस्था के लक्षणों से सुशोभित श्याम शरीर वाली और गरुड़ पर आरूढ़ वैष्णवी सरस्वती देवी हमारी श्री वृद्धि करें। इस विधि से गायत्री का ध्यान कर एकाग्र भाव से प्रातः और मध्याह्न काल में तो खड़ा होकर जप करे और सायंकाल आसन पर बैठकर जप करे। गायत्री का एक हजार जप परमोत्तम, एक सौ मध्यम तथा दश तृतीय श्रेणी का जप है। ओंकार और भूः भुवः स्वः से युक्त त्रिपदा गायत्री का ही जप उचित है ॥५७-५९॥ व्रतशील यति के लिए षट् ओंकार से युक्त अथवा संपुटित गायत्री मन्त्र विहित है। मुने ! गृहस्थ के लिए केवल एक ओंकार से युक्त मन्त्र को ही श्रेष्ठ माना गया है। तदनन्तर यथा शक्ति जप कर सूर्य की प्रार्थना करे और गायत्री तथा सावित्री को दो अञ्जलि प्रदान करे। विप्र! इस प्रकार संध्या समाप्त करने के बाद 'उत्तरे शिखरे' इस मन्त्र से गायत्री का विसर्जन करे और कहे कि ब्रह्मा, ईश और हरि की आज्ञा से आप आदर पूर्वक यहाँ से प्रस्थान करें । तत्पश्चात् दिशाओं और दिग्देवताओं को हाथ जोड़कर नमस्कार करे और अन्य कार्यों को विधान पूर्वक करे ॥६०-६३॥