बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७४ नारदीयपुराणम् ऋतञ्चित्यादिमन्त्रेणाथ पुनरेवाचमेद् बुधः । ततस्तु वारिणात्मानं वेष्टयित्वा समुक्ष्य च ॥३६॥ संकल्प्य प्रणवान्ते तु ऋषिच्छन्दःसुरान्स्मरन् । भूरादिभिर्व्याहृतिभिः सप्तभिः प्रोक्ष्य मस्तकम् ॥४०॥ न्यासं समाचरेन्मंत्री पृथगेव करांगयोः । विन्यस्य हृदये तारं भूः शिरस्यथ विन्यसेत् ॥४१॥ भुवः शिखायां स्वश्चैव कवचे भूर्भुवोऽक्षिषुः । भूर्भुवः स्वस्तथात्रास्त्रं दिक्षु तालत्रयं न्यसेत् ॥४२॥ तत आवाहयेत्संध्यां प्रातः कोकनदस्थिताम् । आगच्छ वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि ॥४३॥ गायत्रि च्छंदसां मातर्ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते । मध्याह्ने वृषभारूढां शुक्लाम्बरसमावृताम् ॥४४॥ सावित्रीं रुद्रयोनिं चावाहयेद्रुद्रवादिनीम् । सायं तु गरुडारूढां पीताम्बरसमावृताम् ॥४५॥ सरस्वतीं विष्णुयोनिमाह्वयेद्विष्णुवादिनीम् । तारं च व्याहतीः सप्त त्रिपदां च समुच्चरन् ॥४६॥ शिरः शिखां च संपूर्थ कुम्भयित्वा विरेचयेत् । वाममध्यात्परैर्वायुं क्रमेण प्राणसंयमे ॥४७॥ द्विराचामेत्ततः पश्चात्प्रातः सूर्यश्चमेति च । आपः पुनंतु मध्याह्ने सायमग्निश्चमेति च ॥४८॥ आपोहिष्ठेति तिसृभिर्मार्जनं च ततश्चरेत् । सुमित्रिया न इत्युक्त्वा नासास्पृष्टजलेन च ॥४६॥ द्विषद्वगं समुत्तार्य द्रुपदां शिरसि क्षिपेत् । ऋतं च सत्यमेतेन कृत्वा चैवाघमर्षणम् ॥५०॥ अंतश्चरसि मंत्रेण सकृदेव पिबेदपः । ततः सूर्याय विधिवद्गन्धं पुष्पं जलांजलिम् ॥५१॥ क्षिप्त्वोपत्तिष्ठेद्दे वर्षे भास्करं स्वस्तिकांजलिम् । ऊर्द्धबाहुरधोबाहुः क्रमात्कल्यादिके त्रिके ॥५२॥
प्रणाम करे और ऋषि, छन्द तथा देवता का स्मरण करते हुए भूः आदि सात व्याहृतियों से मस्तक पर जल छिड़के ॥३७-४०॥ मन्त्र पढ़कर भुजाओं या अन्य अंगों पर पृथक्-पृथक् न्यास करना चाहिए । हृदय पर ‘तार (ॐ) का न्यास कर शिर पर भूः, शिखा पर भुवः, कवच में (दोनों हाथों से कंधों को छूना) स्वः और दोनों नेत्रों पर भूर्भुवः का न्यास करे । और भूर्भुवः स्वः को पढ़कर अस्त्राय फट् को और दिशाओं में तीन ताल का न्यास करे अर्थात् तीन चुटकी बजावे ॥४१-४२॥ यह न्यास कर चुकने पर प्रातःकाल अरुण कमल पर बैठी हुई सन्ध्या देवी का आवाहन करे । ‘देवि ! वरदायिनि ! आओ, अक्षरे ! ब्रह्मवादिनि ! गायत्रि ! छन्दों की माता ! ब्रह्मयोनि ! (ज्ञानदात्री !) तुमको नमस्कार है । दोपहर को बैल पर चढ़ी हुई श्वेत वस्त्र से सुशोभित रुद्रयोनि और रुद्रवादिनी सावित्री का आवाहन करे । ॥४३-४४॥ सायं गरुड़ पर चढ़ी हुई पीतांबर से सुशोभित, विष्णुवादिनी, विष्णुयोनि सरस्वती का आवाहन करे । ॐ, सप्तमहाव्याहृति और त्रिपदागायत्री का उच्चारण करता हुआ शिर और शिखा को पूरक (प्राणायाम) द्वारा पूर्णकर कुम्भक और तत्पश्चात् रेचक (प्राणायाम) करे । पहले बायीं नाड़ी से (पिंगला) प्राणायाम के समय वायु को खींच कर मध्यनाड़ी (सुषुम्ना में) स्थापित करे पुनः इड़ा (दाहिनी नाड़ी दाहिना नासिका छिद्र) से उसको बाहर निकाल दे । तदनन्तर प्रातः काल 'सूर्यश्च मामन्युश्च, इस मन्त्र से दो बार आचमन करे 'मध्याह्न में 'आपः पुनन्तु, इस मन्त्र से और सायं 'अग्निश्च मामन्युश्च, इस मन्त्र से आचमन करे ॥४५-४८॥ आचमन के अनन्तर 'आपोहिष्ठामयोभुवः, इस मन्त्र से तीन बार मार्जन करना चाहिए । 'सुमित्रिया न, यह मन्त्र पढ़ कर नासिका से जल हुआ कर, शत्रुओं का ध्यान कर उनका निःसारण करना चाहिए । फिर 'द्रुपदादिव, मन्त्र पढ़कर शिर पर जल छिड़के । 'ऋतञ्च सत्यम्' इस मन्त्र से अघमर्षण करके 'अन्तश्चरसि, इस मन्त्र से एक बार आचमन करना चाहिए । तदनन्तर सूर्य को विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प और जल का अर्घ्य देकर स्वस्तिकांजलि के साथ सूर्योपस्थान करना चाहिए । सूर्योपस्थान के समय तीनों काल क्रमशः ऊर्ध्वबाहु और अधोबाहु रहना चाहिए ॥४९-५२॥ नारद ! 'उदुत्यं जात, चित्रं देवानाम्,