भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१७३ सप्तविंशोऽध्यायः बिल्वासनापामार्गाणां निम्बाम्राकादिशानिाम् । प्रक्षाल्य वारिणा चैव मंत्रेणाप्यभिमंत्रितम् ॥२४॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो धेहि वनस्पते ॥२५॥ कनिष्ठाम्रसमं स्थौल्ये विप्रः खादेद्दशांगुलम् । नवांगुलं क्षत्रियश्च वैश्यश्चाष्टांगुलोन्मितम् ॥२६॥ शूद्रो वेदांगुलमितं वनिता च मुनीश्वर । अलाभे दन्तकाष्ठानां गंडूषैर्भानुसंमितैः ॥२७॥ मुखशुद्धिर्विधीयेत तृणपत्रसमन्वितैः । करेणादाय वामेन संचवेद्वामदंष्ट्रया ॥२८॥ द्विजान्संघर्ष्य गोदोहं ततः प्रक्षाल्य पाटयेत् । जिह्वामुल्लिख्य ताभ्यां तु दलाभ्यां नियतेन्द्रियः ॥२९॥ प्रक्षाल्य प्रक्षिपेद् दूरे भूयश्चाचम्य पूर्ववत् । ततः स्नानं प्रकुर्वीत नद्यादौ विमले जले ॥३०॥ तटं प्रक्षाल्य दर्भांश्च विन्यस्य प्रविशेज्जलम् । प्रणम्य तत्र तीर्थानि आवाह्य रविमंडलात् ॥३१॥ गंधाद्यैर्मंडलं कृत्वा ध्यात्वा देवं जनार्दनम् । स्नायान्मंत्रांन्स्मरन्पुण्यांस्तीर्थानि च विरिंचिज ॥३२॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥३३॥ पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा । आगच्छंतु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ॥३४॥ अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका । पुरी द्वारावती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥३५॥ ततोऽघमर्षणं जप्त्वा यतासुर्वारिसंप्लुतः । स्नानांगं तर्पणं कृत्वाचम्यार्घ्यं भानवेऽर्पयेत् ॥३६॥ ततो ध्यात्वा विवस्वंतं जलान्निर्गत्य नारद । परिधायाहतं धौतं द्वितीयं परिवीय च ॥३७॥ कुशासने समाविश्य संध्याकर्म समारभेत् । ईशानाभिमुखो विप्र गायत्र्याचम्य वै द्विज ॥३८॥ (चिचिड़ा) नीम, आम और अर्क आदि वृक्षों की दातौन करनी चाहिए। पहले उसको पानी से धोकर मन्त्र से अभिमन्त्रित करना चाहिए। मन्त्र--वनस्पते ! तुम हमको आयु, बल, यश, तेज, संतति, पशु, धन, ज्ञान, प्रज्ञा और मेधा प्रदान करो । विप्र ! कनिष्ठा के अगले भाग के समान और दश अंगुल लम्बी मोटो दातौन करे । मुनीश्वर ! क्षत्रिय नव अंगुल लम्बी, वैश्य आठ अंगुल, शूद्र और स्त्री चार अंगुल लम्बी दतुअन करे । दातौन न मिलने पर बारह बार कुल्ली करके तृण अथवा पत्तियों से मुख शुद्धि करनी चाहिए २३-२७॥ बायें हाथ से दातौन लेकर उसको बायीं ओर के दांतों से ही चबाना चाहिए । फिर दांतों को भली भाँति रगड़कर मसूड़ों को भी धीरे-धीरे रगड़े और धोवे । उस दातौन के चीरे से जीभ को भली भाँति साफ कर उसको पानी से धोवे और उस दातौन को दूर फेंक दे । पुनः पूर्व की भाँति आचमन करे ॥२८-२६॥ इतनी क्रिया के बाद नदी या स्वच्छ जल वाले तालाब में स्नान करना चाहिए । पहले तट को धोकर उस पर कुशों को रख देना चाहिए । तब जल में नहाने के लिए घुसना चाहिए। उस जल में सब तीर्थों का आवाहन कर प्रणाम करना चाहिए । ब्रह्मा के पुत्र ! उस जल में गंध आदि से मण्डल बनाकर भगवान् जनार्दन का ध्यान करना चाहिए । तत्पश्चात् पुण्यप्रद मन्त्रों और तीर्थों का स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिए ॥३०-३२॥ मन्त्र—गंगे ! यमुने ! गोदावरि । सरस्वति ! नर्मदे ! सिन्धु और कावेरि ! इस जल में निवास करो । हे महाभाग पुष्कर आदि तीर्थों ! गंगा आदि नदियों ! सदा मेरे लिए स्नान के समय आप लोग आइए । अयोध्या मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका, और द्वारिका पुरी ये सात मोक्ष देने वाली पुरी समझी जाती हैं । इसके बाद अघमर्षण मन्त्र को जपकर उसी जल में रहकर ही स्वस्थ भाव से स्नान करे । तदनन्तर तर्पण और आच- मन कर सूर्य को अर्घ्य दे ।।३३-३६॥ इतनी क्रियायें स्नान में ही सम्मिलित हैं । नारद ! स्नान के बाद सूर्य का ध्यान कर जल से बाहर आवे । भीगे वस्त्र को छोड़कर दूसरा स्वच्छ वस्त्र पहने और कुशासन पर बैठकर सन्ध्या करे । विप्र ! ईशानाभिमुख होकर गायत्री मन्त्र से आचमन करे । बुद्धिमान् व्यक्ति 'ऋतञ्च सत्यम्' इस मन्त्र से पुनः आचमन करे । तदनन्तर जल से अपने को परिवेष्टित कर अभिषेक करे (जल छिड़के) । संकल्प करने के बाद