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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

१७३ सप्तविंशोऽध्यायः बिल्वासनापामार्गाणां निम्बाम्राकादिशानिाम् । प्रक्षाल्य वारिणा चैव मंत्रेणाप्यभिमंत्रितम् ॥२४॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो धेहि वनस्पते ॥२५॥ कनिष्ठाम्रसमं स्थौल्ये विप्रः खादेद्दशांगुलम् । नवांगुलं क्षत्रियश्च वैश्यश्चाष्टांगुलोन्मितम् ॥२६॥ शूद्रो वेदांगुलमितं वनिता च मुनीश्वर । अलाभे दन्तकाष्ठानां गंडूषैर्भानुसंमितैः ॥२७॥ मुखशुद्धिर्विधीयेत तृणपत्रसमन्वितैः । करेणादाय वामेन संचवेद्वामदंष्ट्रया ॥२८॥ द्विजान्संघर्ष्य गोदोहं ततः प्रक्षाल्य पाटयेत् । जिह्वामुल्लिख्य ताभ्यां तु दलाभ्यां नियतेन्द्रियः ॥२९॥ प्रक्षाल्य प्रक्षिपेद् दूरे भूयश्चाचम्य पूर्ववत् । ततः स्नानं प्रकुर्वीत नद्यादौ विमले जले ॥३०॥ तटं प्रक्षाल्य दर्भांश्च विन्यस्य प्रविशेज्जलम् । प्रणम्य तत्र तीर्थानि आवाह्य रविमंडलात् ॥३१॥ गंधाद्यैर्मंडलं कृत्वा ध्यात्वा देवं जनार्दनम् । स्नायान्मंत्रांन्स्मरन्पुण्यांस्तीर्थानि च विरिंचिज ॥३२॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिंधुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥३३॥ पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा । आगच्छंतु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ॥३४॥ अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्यवंतिका । पुरी द्वारावती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥३५॥ ततोऽघमर्षणं जप्त्वा यतासुर्वारिसंप्लुतः । स्नानांगं तर्पणं कृत्वाचम्यार्घ्यं भानवेऽर्पयेत् ॥३६॥ ततो ध्यात्वा विवस्वंतं जलान्निर्गत्य नारद । परिधायाहतं धौतं द्वितीयं परिवीय च ॥३७॥ कुशासने समाविश्य संध्याकर्म समारभेत् । ईशानाभिमुखो विप्र गायत्र्याचम्य वै द्विज ॥३८॥ (चिचिड़ा) नीम, आम और अर्क आदि वृक्षों की दातौन करनी चाहिए। पहले उसको पानी से धोकर मन्त्र से अभिमन्त्रित करना चाहिए। मन्त्र--वनस्पते ! तुम हमको आयु, बल, यश, तेज, संतति, पशु, धन, ज्ञान, प्रज्ञा और मेधा प्रदान करो । विप्र ! कनिष्ठा के अगले भाग के समान और दश अंगुल लम्बी मोटो दातौन करे । मुनीश्वर ! क्षत्रिय नव अंगुल लम्बी, वैश्य आठ अंगुल, शूद्र और स्त्री चार अंगुल लम्बी दतुअन करे । दातौन न मिलने पर बारह बार कुल्ली करके तृण अथवा पत्तियों से मुख शुद्धि करनी चाहिए २३-२७॥ बायें हाथ से दातौन लेकर उसको बायीं ओर के दांतों से ही चबाना चाहिए । फिर दांतों को भली भाँति रगड़कर मसूड़ों को भी धीरे-धीरे रगड़े और धोवे । उस दातौन के चीरे से जीभ को भली भाँति साफ कर उसको पानी से धोवे और उस दातौन को दूर फेंक दे । पुनः पूर्व की भाँति आचमन करे ॥२८-२६॥ इतनी क्रिया के बाद नदी या स्वच्छ जल वाले तालाब में स्नान करना चाहिए । पहले तट को धोकर उस पर कुशों को रख देना चाहिए । तब जल में नहाने के लिए घुसना चाहिए। उस जल में सब तीर्थों का आवाहन कर प्रणाम करना चाहिए । ब्रह्मा के पुत्र ! उस जल में गंध आदि से मण्डल बनाकर भगवान् जनार्दन का ध्यान करना चाहिए । तत्पश्चात् पुण्यप्रद मन्त्रों और तीर्थों का स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिए ॥३०-३२॥ मन्त्र—गंगे ! यमुने ! गोदावरि । सरस्वति ! नर्मदे ! सिन्धु और कावेरि ! इस जल में निवास करो । हे महाभाग पुष्कर आदि तीर्थों ! गंगा आदि नदियों ! सदा मेरे लिए स्नान के समय आप लोग आइए । अयोध्या मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका, और द्वारिका पुरी ये सात मोक्ष देने वाली पुरी समझी जाती हैं । इसके बाद अघमर्षण मन्त्र को जपकर उसी जल में रहकर ही स्वस्थ भाव से स्नान करे । तदनन्तर तर्पण और आच- मन कर सूर्य को अर्घ्य दे ।।३३-३६॥ इतनी क्रियायें स्नान में ही सम्मिलित हैं । नारद ! स्नान के बाद सूर्य का ध्यान कर जल से बाहर आवे । भीगे वस्त्र को छोड़कर दूसरा स्वच्छ वस्त्र पहने और कुशासन पर बैठकर सन्ध्या करे । विप्र ! ईशानाभिमुख होकर गायत्री मन्त्र से आचमन करे । बुद्धिमान् व्यक्ति 'ऋतञ्च सत्यम्' इस मन्त्र से पुनः आचमन करे । तदनन्तर जल से अपने को परिवेष्टित कर अभिषेक करे (जल छिड़के) । संकल्प करने के बाद

१७४ नारदीयपुराणम् ऋतञ्चित्यादिमन्त्रेणाथ पुनरेवाचमेद् बुधः । ततस्तु वारिणात्मानं वेष्टयित्वा समुक्ष्य च ॥३६॥ संकल्प्य प्रणवान्ते तु ऋषिच्छन्दःसुरान्स्मरन् । भूरादिभिर्व्याहृतिभिः सप्तभिः प्रोक्ष्य मस्तकम् ॥४०॥ न्यासं समाचरेन्मंत्री पृथगेव करांगयोः । विन्यस्य हृदये तारं भूः शिरस्यथ विन्यसेत् ॥४१॥ भुवः शिखायां स्वश्चैव कवचे भूर्भुवोऽक्षिषुः । भूर्भुवः स्वस्तथात्रास्त्रं दिक्षु तालत्रयं न्यसेत् ॥४२॥ तत आवाहयेत्संध्यां प्रातः कोकनदस्थिताम् । आगच्छ वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि ॥४३॥ गायत्रि च्छंदसां मातर्ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते । मध्याह्ने वृषभारूढां शुक्लाम्बरसमावृताम् ॥४४॥ सावित्रीं रुद्रयोनिं चावाहयेद्रुद्रवादिनीम् । सायं तु गरुडारूढां पीताम्बरसमावृताम् ॥४५॥ सरस्वतीं विष्णुयोनिमाह्वयेद्विष्णुवादिनीम् । तारं च व्याहतीः सप्त त्रिपदां च समुच्चरन् ॥४६॥ शिरः शिखां च संपूर्थ कुम्भयित्वा विरेचयेत् । वाममध्यात्परैर्वायुं क्रमेण प्राणसंयमे ॥४७॥ द्विराचामेत्ततः पश्चात्प्रातः सूर्यश्चमेति च । आपः पुनंतु मध्याह्ने सायमग्निश्चमेति च ॥४८॥ आपोहिष्ठेति तिसृभिर्मार्जनं च ततश्चरेत् । सुमित्रिया न इत्युक्त्वा नासास्पृष्टजलेन च ॥४६॥ द्विषद्वगं समुत्तार्य द्रुपदां शिरसि क्षिपेत् । ऋतं च सत्यमेतेन कृत्वा चैवाघमर्षणम् ॥५०॥ अंतश्चरसि मंत्रेण सकृदेव पिबेदपः । ततः सूर्याय विधिवद्गन्धं पुष्पं जलांजलिम् ॥५१॥ क्षिप्त्वोपत्तिष्ठेद्दे वर्षे भास्करं स्वस्तिकांजलिम् । ऊर्द्धबाहुरधोबाहुः क्रमात्कल्यादिके त्रिके ॥५२॥

प्रणाम करे और ऋषि, छन्द तथा देवता का स्मरण करते हुए भूः आदि सात व्याहृतियों से मस्तक पर जल छिड़के ॥३७-४०॥ मन्त्र पढ़कर भुजाओं या अन्य अंगों पर पृथक्-पृथक् न्यास करना चाहिए । हृदय पर ‘तार (ॐ) का न्यास कर शिर पर भूः, शिखा पर भुवः, कवच में (दोनों हाथों से कंधों को छूना) स्वः और दोनों नेत्रों पर भूर्भुवः का न्यास करे । और भूर्भुवः स्वः को पढ़कर अस्त्राय फट् को और दिशाओं में तीन ताल का न्यास करे अर्थात् तीन चुटकी बजावे ॥४१-४२॥ यह न्यास कर चुकने पर प्रातःकाल अरुण कमल पर बैठी हुई सन्ध्या देवी का आवाहन करे । ‘देवि ! वरदायिनि ! आओ, अक्षरे ! ब्रह्मवादिनि ! गायत्रि ! छन्दों की माता ! ब्रह्मयोनि ! (ज्ञानदात्री !) तुमको नमस्कार है । दोपहर को बैल पर चढ़ी हुई श्वेत वस्त्र से सुशोभित रुद्रयोनि और रुद्रवादिनी सावित्री का आवाहन करे । ॥४३-४४॥ सायं गरुड़ पर चढ़ी हुई पीतांबर से सुशोभित, विष्णुवादिनी, विष्णुयोनि सरस्वती का आवाहन करे । ॐ, सप्तमहाव्याहृति और त्रिपदागायत्री का उच्चारण करता हुआ शिर और शिखा को पूरक (प्राणायाम) द्वारा पूर्णकर कुम्भक और तत्पश्चात् रेचक (प्राणायाम) करे । पहले बायीं नाड़ी से (पिंगला) प्राणायाम के समय वायु को खींच कर मध्यनाड़ी (सुषुम्ना में) स्थापित करे पुनः इड़ा (दाहिनी नाड़ी दाहिना नासिका छिद्र) से उसको बाहर निकाल दे । तदनन्तर प्रातः काल 'सूर्यश्च मामन्युश्च, इस मन्त्र से दो बार आचमन करे 'मध्याह्न में 'आपः पुनन्तु, इस मन्त्र से और सायं 'अग्निश्च मामन्युश्च, इस मन्त्र से आचमन करे ॥४५-४८॥ आचमन के अनन्तर 'आपोहिष्ठामयोभुवः, इस मन्त्र से तीन बार मार्जन करना चाहिए । 'सुमित्रिया न, यह मन्त्र पढ़ कर नासिका से जल हुआ कर, शत्रुओं का ध्यान कर उनका निःसारण करना चाहिए । फिर 'द्रुपदादिव, मन्त्र पढ़कर शिर पर जल छिड़के । 'ऋतञ्च सत्यम्' इस मन्त्र से अघमर्षण करके 'अन्तश्चरसि, इस मन्त्र से एक बार आचमन करना चाहिए । तदनन्तर सूर्य को विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प और जल का अर्घ्य देकर स्वस्तिकांजलि के साथ सूर्योपस्थान करना चाहिए । सूर्योपस्थान के समय तीनों काल क्रमशः ऊर्ध्वबाहु और अधोबाहु रहना चाहिए ॥४९-५२॥ नारद ! 'उदुत्यं जात, चित्रं देवानाम्,

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सप्तविंशोऽध्यायः १७५ उदुत्यं चित्रं तच्चक्षुरित्येतत्त्रितयं जपेत् । सौराञ्छैवान् वैष्णवांश्च मंत्रानन्यांश्च नारद ॥५३॥ तेजोऽसि गायत्र्यसीति प्रार्थयेत्सवितुर्महः । ततोऽङ्गानि त्रिरादृत्य ध्यायेच्छक्तीस्तदात्मिकाः ॥५४॥ ब्रह्माणी चतुराननाक्षवलया कुम्भं करैः स्रुक्स्रुवौ, बिभ्राणा तरुणेंदुकान्तिवदना ऋग्रूपिणी बालिका । हंसारोहणकेलिखणखणमणेर्बिम्बार्चिता भूषिता, गायत्री परिभाविता भवतु नः संपत्समृद्ध्यै सदा ॥५५॥ रुद्राणी नवयौवना त्रिनयना वैयाघ्रचर्माम्बरा, खट्वांगत्रिशिखाक्षसूत्रवलयाऽभीतिश्रियै चास्तु नः । विद्युद्दामजटाकलापविलसद्बालेन्दुमौलिर्मुदा, सावित्री वृषवाहना सिततनुर्ध्येया यजूरूपिणी ॥५६॥ ध्येया सा च सरस्वती भगवती पीतांबरालंकृता, श्यामा श्यामतनुर्जरोंपरिलसद्गात्रांचिता वैष्णवी । तार्थ्यस्था मणिनूपुरांगदलसद्ग्रैवेयभूषोज्ज्वला, हस्तालंकृतशंखचक्रसुगदापद्मा श्रियै चास्तु नः ॥५७॥ एवं ध्यात्वा जपेत्तिष्ठन्प्रातर्मध्याह्नक तथा । सायंकाले समासीनो भक्त्या तद्गतमानसः ॥५८॥ सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् । त्रिपदां प्रणवोपेतां भूर्भुवः स्वश्वक्रमाम् ॥५९॥ षट्‌तारः संपुटो वापि व्रतिनश्च यतेर्जपः । गृहस्थस्य सतारः स्याज्जप्य एवंविधा मुने ॥६०॥ ततो जप्त्वा यथाशक्ति सवित्रे विनिवेद्य च। गायत्र्यै च सवित्रे च प्रक्षिपेदंजलिद्वयम् ॥६१॥ ततो विसृज्य तां विप्र उत्तरे इति मंत्रतः । ब्रह्मेशेन हरिणानुज्ञाता गच्छ सादरम् ॥६२॥ दिग्भ्यो दिग्देवताभ्यश्च नमस्कृत्य कृतांजलिः । प्रातरादेः परं कर्म कुर्यादपि विधानतः ॥६३॥ तच्चक्षुः आदि तीन मन्त्रों का जप करना चाहिए । इसके अतिरिक्त सूर्य के अथवा शिव और विष्णु के मन्त्रों का जप करना भी श्रेयस्कर है । 'तेजोसि गायत्र्यसि' इस मन्त्र से दिन में सूर्य की प्रार्थना करे । तदनन्तर अपने अंगों को तीन बार जल से परिवेष्टित कर काल के अनुरूप शक्ति का ध्यान करना चाहिए ॥५३-५४॥ ध्यान के मन्त्र— जो ब्रह्माणी चार मुख वाली, अक्ष का कंकण धारण करने वाली, हाथ में कलश, स्रुक् और स्रुवा को धारण करने वाली, बाल चन्द्रमा की कान्ति के समान मुख-कान्ति वाली, ऋक्स्वरूप और बालिका हैं, हंस पर आरोहण करते समय जिसके माला-मणियों से झन्कार की ध्वनि निकलती है, मणिबिम्बों से सुशोभित वे गायत्रीरूपिणी देवी सर्वदा हम लोगों को समृद्धि और विभव प्रदान करें ॥५५॥ नवयौवन से सुशोभित, तीन नेत्रों वाली, व्याघ्रचर्म का वस्त्र धारण करने वाली रुद्राणी--जिनके हाथों में खट्वांग अस्त्र, अग्नि और अक्षसूत्र का वलय है—हम लोगों को अभय और श्री प्रदान करें बिजली की भाँति चमकीले केशों से सुशोभित बाल चन्द्रमा को शिर पर धारण करने वाली यजुर्वेद स्वरूपिणी श्वेताङ्गी और बैल पर चढ़ी हुई सावित्रीदेवी का ध्यान करना चाहिए ॥५६॥ वह ध्यान करने योग्य, पीताम्बर से सुशोभित, मणि, नूपुर, अंगद (विजायठ) और हार से आभूषित, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म को धारण करने वाली श्यामा, वृद्धावस्था के लक्षणों से सुशोभित श्याम शरीर वाली और गरुड़ पर आरूढ़ वैष्णवी सरस्वती देवी हमारी श्री वृद्धि करें। इस विधि से गायत्री का ध्यान कर एकाग्र भाव से प्रातः और मध्याह्न काल में तो खड़ा होकर जप करे और सायंकाल आसन पर बैठकर जप करे। गायत्री का एक हजार जप परमोत्तम, एक सौ मध्यम तथा दश तृतीय श्रेणी का जप है। ओंकार और भूः भुवः स्वः से युक्त त्रिपदा गायत्री का ही जप उचित है ॥५७-५९॥ व्रतशील यति के लिए षट् ओंकार से युक्त अथवा संपुटित गायत्री मन्त्र विहित है। मुने ! गृहस्थ के लिए केवल एक ओंकार से युक्त मन्त्र को ही श्रेष्ठ माना गया है। तदनन्तर यथा शक्ति जप कर सूर्य की प्रार्थना करे और गायत्री तथा सावित्री को दो अञ्जलि प्रदान करे। विप्र! इस प्रकार संध्या समाप्त करने के बाद 'उत्तरे शिखरे' इस मन्त्र से गायत्री का विसर्जन करे और कहे कि ब्रह्मा, ईश और हरि की आज्ञा से आप आदर पूर्वक यहाँ से प्रस्थान करें । तत्पश्चात् दिशाओं और दिग्देवताओं को हाथ जोड़कर नमस्कार करे और अन्य कार्यों को विधान पूर्वक करे ॥६०-६३॥

१७६ | नारदीयपुराणम् प्रातर्मध्यंदिने चैव गृहस्थः स्नानमाचरेत् । वानप्रस्थश्च देवर्षे स्नायात्त्रिसवणं यतिः ॥६४॥ आतुराणां तु रोगाद्यैः पांथानां च सकृन्मतम् । ब्रह्म यज्ञं ततः कुर्याद्धर्भापाणिर्मुनीश्वर ॥६५॥ दिवोदितानि कर्माणि प्रमादादकृतानि चेत् । शर्वर्याः प्रथमे यामे तानि कुर्याद्यथाक्रमम् ॥६६॥ नोपास्ते यो द्विजः संध्यां धूर्तबुद्धिरनापदि । पाषंडः स हि विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥६७॥ यस्तु संध्यादिकर्माणि कूटयुक्तिविशारदः । परित्यजति तं विद्यान्महापातकिनां वरम् ॥६८॥ ये द्विजा अभिभाषन्ते त्यक्तसंध्यादिकर्मणः । ते यांति नरकान्घोरान्यावच्चंद्रार्कतारकम् ॥६९॥ देवार्चनं ततः कुर्याद्वैश्वदेवं यथाविधि । तत्रत्यमतिथिं सम्यगन्नाद्यैश्च प्रपूजयेत् ॥७०॥ वक्तव्या मधुरा वाणी तेष्वभ्यागतेषु तु । जलान्नकंदमूलैर्वा गृहदानेन चार्चयेत् ॥७१॥ अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥७२॥ अज्ञातगोत्रनामानमन्यग्रामादुपागतम् । विपश्चितोऽतिथिं प्राहुर्विष्णुवत्तं प्रपूजयेत् ॥७३॥ स्वग्रामवासिनं त्वेकं श्रोत्रियं विष्णुतत्परम् । अन्नाद्यैः प्रत्यहं विप्रं पितॄनुद्दिश्य तर्पयेत् ॥७४॥ पंचयज्ञपरित्यागी ब्रह्महेत्युच्यते बुधैः । कुर्यादहरहस्तस्मात्पंचयज्ञान्प्रयत्नतः ॥७५॥ देवयज्ञो भूतयज्ञः पितृयज्ञस्तथैव च । नृयज्ञो ब्रह्मयज्ञश्च पंचयज्ञाःप्रचक्षते ॥७६॥ भृत्यमित्रादिसंयुक्तः स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः । द्विजानां भोज्यमश्नीयात्पात्रं नैव परित्यजेत् ॥७७॥ संस्थाप्य स्वासने पादौ वस्त्रार्द्धं परिधाय च । मुखेन वमितं भुक्त्वा सुरापीत्युच्यते बुधैः ॥७८॥ खादिताद्धं पुनः खादेन्मोदकांश्च फलानि च । प्रत्यक्षं लवणं चैव गोमांसाशीति गद्यते ॥७६॥ गृहस्थ प्रातः और दोपहर को स्नान करे, परन्तु देवर्षि ! यति और वानप्रस्थाश्रमी तीनों काल स्नान करे। रोग आदि से पीड़ित और पथिक के लिए एक काल का स्नान भी मान्य है। मुनीश्वर ! इसके अनन्तर हाथ में कुशा लेकर ब्रह्मयज्ञ करना चाहिए। यदि प्रमाद वश दैनिक कर्म न हो पायें तो उन कर्मों को रात्रि के प्रथम प्रहर में क्रम पूर्वक करना चाहिए ॥६४-६६॥ जो धूर्त बुद्धि स्वस्थ रहकर भी सन्ध्योपासना नहीं करता उसको पाखण्डी और सब धर्मों से बहिष्कृत समझना चाहिए। जो कूटनीतिज्ञ सन्ध्यादि नित्य कर्मों को नहीं करता है उसको बहुत बड़ा महापातकी समझना चाहिए। जो द्विज सन्ध्या आदि कर्मों को त्यागे हुए द्विजों से बात करते हैं वे कल्पान्त तक घोर नरक में रहते हैं। सन्ध्या करने के अनन्तर यथा विधि वैश्व देव और देव पूजन करना चाहिए। और यदि कोई अतिथि आ जाय तो विधिवत् अन्न आदि सामग्री से उसकी सेवा करनी चाहिए ॥६७-७०॥ अतिथियों के आने पर मधुरवाणी द्वारा स्वागत करना चाहिए और जल, अन्न कन्द, मूल, फल अथवा अपने यहाँ रहने के लिए स्थान देकर उनकी सेवा करनी चाहिए। जिसके घर से कोई अतिथि निराश होकर चला जाता है वह उस गृहस्थ को अपना पाप दे देता और स्वयं उसके पुण्य को लेकर चला जाता है। दूसरे गाँव से आये हुए अज्ञात गोत्र और नाम वाले, व्यक्ति को ही विद्वान् लोग अतिथि कहते हैं। उसको विष्णु के समान समझकर सत्कार करना चाहिए ॥७१-७३॥ अपने ग्राम के एक श्रोत्रिय और विष्णुभक्त विप्र को प्रति दिन पितरों की तृप्ति के उद्देश्य से अन्न आदि से तृप्त करना चाहिए। पंच यज्ञ को न करने वाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहा जाता है। इसलिए प्रतिदिन यत्न पूर्वक पंच यज्ञों को करना चाहिए। देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, नृयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ ये ही पंचयज्ञ कहे जाते हैं। स्वयं मौन होकर भृत्य और मित्र आदि के साथ भोजन करना चाहिए। द्विजों का भोज्य अन्न ही भोजन करना चाहिए। सत्पात्र का अनादर नहीं करना चाहिए ॥७४-७७॥ अपने आसन पर दोनों पैरों को रखकर, आधा वस्त्र पहन कर भोजन करने से और उगले हुए अन्न को पुनः खाने से मनुष्य मद्यप कहा जाता है, ऐसा पंडित लोग कहते हैं। मिठाई फल आदि को पहले आधा खाकर

सप्तविंशोऽध्यायः १७७ अपोशाने वाचमने अद्यद्रव्येषु च द्विजः । शब्दं न कारयेद्विप्रस्तं कुर्वन्नारकी भवेत् ॥८०॥ पथ्यमन्नं प्रभुञ्जीत वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् । अमृतोपस्तरणमसि अपोशानं भुजेः पुरः ॥८१॥ अमृतापिधानमसि भोज्यान्तेऽपः सकृत्पिबेत् । प्राणाया आहुतीर्दत्त्वाचास्य भोजनमाचरेत् ॥८२॥ ततश्चाचम्य विप्रेन्द्र शास्त्रचिन्तापरो भवेत् । रात्रावपि यथाशक्ति शयनासनभोजनैः ॥८३॥ एवं गृही सदाचारं कुर्यात्प्रतिदिनं मुने । यदाऽऽचारपरित्यागो प्रायश्चित्ती तदा भवेत् ॥८४॥ दूषितां स्वतनुं दृष्ट्वा पलिताद्यैश्च सत्तम । पुत्रेषु भार्यां निःक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥८५॥ भवेत्त्रिववणस्नायी नखश्मश्रुजटाधरः । अधःशायी ब्रह्मचारी पञ्चयज्ञपरायणः ॥८६॥ फलमूलाशनो नित्यं स्वाध्यायनिरतस्तथा । दयावान्सर्वभूतेषु नारायणपरायणः ॥८७॥ वर्जयेद्ग्रामजातानि पुष्पाणि च फलानि च । अष्टौ ग्रासांश्च भुञ्जीत न कुर्याद्रात्रिभोजनम् ॥८८॥ अत्यन्तं वर्जयेत्तैलं वानप्रस्थसमाश्रमी । व्यवायं वर्जयेच्चैव निद्रालस्ये तथैव च ॥८९॥ शंखचक्रगदापाणिं नित्यं नारायणं स्मरेत् । वानप्रस्थः प्रकुर्वीत तपश्चांद्रायणादिकम् ॥६०॥ सहेत शीतातपादिं वह्निं परिचरेत्सदा । यदा मनसि वैराग्यं जातं सर्वेषु वस्तुषु ॥६१॥ तदैव संन्यसेद्विप्र पतितस्त्वन्यथा भवेत् । वेदांताभ्यासनिरतः शांतो दांतो जितेंद्रियः ॥६२॥ निर्द्वन्द्वो निरहंकारो निर्ममः सर्वदा भवेत् । शमादिगुणसंयुक्तः कामक्रोधविवर्जितः ॥६३॥ नग्नो वा जीर्णकौपीनो भवेन्मुंडो यतिर्द्विजः । समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ॥६४॥

फिर उसको दोबारा खाने वाला और नमक को बिना किसी भोज्य पदार्थ में मिलाकर खाने वाला व्यक्ति गोमांस- भोजी समझा जाता है ॥७८-७६॥ आपोशान (आचमन) करते समय भोजन और जल पीते समय किसी प्रकार की बातचीत न करे अन्यथा वह व्यक्ति पापी होता है। मौन होकर स्वास्थ्यप्रद भोजन करना चाहिए। भोज्य अन्न की निन्दा नहीं करनी चाहिए। भोजन के पहले 'अमृतोपस्तरणमसि' इस मन्त्र से आचमन करना चाहिए। भोजन के बाद 'अमृतापिधानमसि' इस मन्त्र को पढ़कर एक बार जल पीना चाहिए। 'प्राणाय स्वाहा' आदि मन्त्र पढ़कर पाँच बार अग्नि में आहुति देकर भोजन करना चाहिए ॥८०-८३॥ भोजनोपरान्त आचमन कर शास्त्र चिन्तन करना चाहिए। रात्रि में भी यथाशक्ति शयन, आसन और भोजन के साथ साथ नियमों का पालन करना चाहिए। मुने ! इस प्रकार गृहस्थ प्रति दिन सदाचार का पालन करे। जिस समय गृहस्थ आचार का त्याग कर देता है उस समय वह प्रायश्चित्त का भागी होता है। मुनिवर्य ! अपने शरीर में बुढ़ापे का लक्षण दिखाई पड़े तब अपने पुत्र पर स्त्री का भार छोड़कर या उसको साथ लेकर वन में चला जाय ॥८३-८५॥ वानप्रस्थाश्रम ग्रहण कर लेने पर तीनों काल स्नान करे, नख, जटा और दाढ़ी रखे, भूमि पर ही सोये और ब्रह्म- चर्य का पालन करे। पंचयज्ञों को करता हुआ नित्य फलमूल भोजन करे और स्वाध्याय में लगा रहे । नारायण का ध्यान करता हुआ सब प्राणियों पर दया भाव रखे। ग्राम्य पुष्पों और फलों का उपयोग न करे, केवल आठ कौर भोजन करे। रात्रि में भोजन करना उसके लिए सर्वथा निषिद्ध है। वानप्रस्थाश्रमी तैल का स्पर्श तक न करे, (मैथुन) निद्रा और आलस्य का सर्वथा परित्याग कर दे ॥८६-८६॥ नित्यप्रति शंख-चक्र-गदाधारी नारायण का स्मरण करे। वानप्रस्थ में चान्द्रायण आदि का तप करना चाहिए। सदा शीत, आतप आदि सहे और अग्नि परिचर्या (हवन) करे ॥६४-१०॥ विप्र ! जिस समय सब वस्तुओं से मन में वैराग्य हो जाय उसी समय संन्यास लेना चाहिए अन्यथा वह व्यक्ति पतित हो जाता है। संन्यासी वेदान्त के अध्ययन और मनन में लगा रहे। वह शान्त, दान्त, जितेन्द्रिय अहंकार रहित, निर्द्वन्द्व और निर्मम रहे। यति द्विज शम, दम आदि गुणों से युक्त होकर काम क्रोध आदि से दूर रहे ॥९०-६३॥ या तो वह नग्न रहे या पुराने वस्त्रों का कौपीन पहने और सर्वदा मुण्डी रहे । शत्रु और मित्र के २३--ना० पु०

१७८ नारदीयपुराणम् एकरात्रं वसेद्ग्रामे त्रिरात्रं नगरे तथा । भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्यतिः ॥९५॥ अनिन्दितद्विजगृहे व्यंगारे भुक्तवर्जिते । विवादरहिते चैव भिक्षार्थं पर्यटेद्यतिः ॥९६॥ भवेत्त्रिसवणस्नायी नारायणपरायणः । जपेच्च प्रणवं नित्यं जितात्मा विजितेन्द्रियः ॥९७॥ एकान्नादी भवेद्यस्तु कदाचिल्लंपटो यतिः । न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा प्रायश्चित्तायुतैरपि ॥९८॥ लोभाद्यदि यतिर्विप्र तनुपोषणपरो भवेत् । स चंडालसमो ज्ञेयो वर्णाश्रमविगर्हितः ॥९९॥ आत्मानं चिंतयेद्देवं नारायणमनामयम् । निर्द्वंद्वं निर्ममं शांतं मायातीतममत्सरम् ॥१००॥ अव्ययं परिपूर्णं च सदानन्दैकविग्रहम् । ज्ञानस्वरूपममलं परं ज्योतिः सनातनम् ॥१०१॥ अविकारमनाद्यंतं जगच्चैतन्यकारणम् । निर्गुणं परमं ध्यायेदात्मानं परतः परम् ॥१०२॥ पठेदुपनिषद्वाक्यं वेदान्तार्थांश्च चिंतयेत् । सहस्रशीर्षं देवं च सदा ध्यायेज्जितेन्द्रियः ॥१०३॥ एवं ध्यानपरो यस्तु यतिर्विगतमत्सरः । स याति परमानंदं परं ज्योतिः सनातनम् ॥१०४॥ इत्येवमाश्रमाचाराञ्यः करोति द्विजः क्रमात् । स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥१०५॥ वर्णाश्रमाचाररताः सर्वपापविवर्जिताः । नारायणपरा यांति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१०६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सदाचारेषु गृहस्थवानप्रस्थयति- धर्मनिरूपणं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७॥ प्रति एवं मान एवं अपमान में सम भाव रखे । किसी भी ग्राम में एक रात ही रहे । नगर में तीन रात तक रह सकता है। वह नित्य प्रति भिक्षा द्वारा ही अपना भोजन प्राप्त करे, एकान्न भोजन न करे। यति अनिन्दित द्विज के घर, व्यंगार (रसोई बनने के बाद) भोजन के उपरान्त जहाँ किसी प्रकार का कलह न हो भिक्षा के लिए जाय ।९४-९६॥ वह जितात्मा संयमपूर्वक नारायण के ध्यान में मग्न हो तीनों काल स्नान करे और ओंकार का जप करे। जो एक प्रकार का ही अन्न भोजन करने वाला यदि कदाचित् लम्पट हो जाय तो उसका निस्तार दश हजार प्रायश्चित्तों के द्वारा भी नहीं हो सकता । विप्र ! जो यति लोभ वश केवल अपने शरीर के भरण पोषण में ही लगा रहता है वह वर्णाश्रम धर्म को कलंकित करता है और वह चाण्डाल के समान पतित है ॥९७-९९॥ संन्यासी सर्वदा आत्मस्वरूप, अनामय, निर्द्वन्द्व, निर्मम, शान्त, मायातीत, मात्सर्यरहित, सदानन्द स्वरूप, ज्ञानरूप, अमल, पर और सनातन, ज्योतिः स्वरूप नारायण का चिन्तन करे । अविकार, आदिवन्तोहीन, जगत् चैतन्य का एक मात्र कारण, निर्गुण, परम, परात्पर आत्मा का ध्यान करे ॥१००-१०२॥ सर्वदा उपनिषद् वाक्यों को पढ़े और वेदान्तार्थ का चिन्तन करे । जितेन्द्रिय संन्यासी सहस्र शिर वाले देव का सदा ध्यान करे। जो उदार संन्यासी इस भाँति ध्यानमग्न रहता है वह परमानन्द स्वरूप परम सनातन ज्योति को प्राप्त करता है । जो द्विज इस प्रकार कहे गए आश्रमाचारों का पालन करता है, वह उस परमस्थान को प्राप्त करता है जहाँ जाकर किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रह जाती । वर्णाश्रमाचारों का पालन करने वाले, सब पापों से रहित और नारायण परायण व्यक्ति विष्णु के परमधाम को प्राप्त करते हैं ॥१०३-१०६॥ श्रीनारदीयमहापुराण में आश्रमधर्मनिरूपण नामक सत्ताईसवां अध्याय समाप्त ॥२७॥

अष्टाविंशोऽध्यायः सनक उवाच शृणुष्व मुनिशार्दूल श्राद्धस्य विधिमुत्तमम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥१॥ क्षयाहपूर्वदिवसे स्नात्वा चैकाशनी भवेत् । अधःशायी ब्रह्मचारी निशि विप्रान्निमंत्रयेत् ॥२॥ दन्तधावनताम्बूले तैलाभ्यंगं तथैव च । रत्योषधिपरान्नानि श्राद्धकर्त्ता विवर्जयेत् ॥३॥ अध्वानं कलहं क्रोधं व्यवायं च धुरं तथा । श्राद्धकर्त्ता च भोक्ता च दिवास्वापं च वर्जयेत् ॥४॥ श्राद्धे निमंत्रितो यस्तु व्यवायं कुरुते यदि । ब्रह्महत्यामवाप्नोति नरकं चापि गच्छति ॥५॥ श्राद्धे नियोजयेद्विप्रं श्रोत्रियं विष्णुतत्परम् । यथास्वाचारनिरतं प्रशांतं सत्कुलोद्भवम् ॥६॥ रागद्वेषविहीनं च पुराणार्थविशारदम् । त्रिमधुत्रिसुपर्णज्ञं सर्वभूतदयापरम् ॥७॥ देवपूजारतं चैव स्मृतितत्त्वविशारदम् । वेदांततत्त्वसंपन्नं सर्वलोकहिते रतम् ॥८॥ कृतज्ञं गुणसंपन्नं गुरुशुश्रूषणे रतम् । परोपदेशनिरतं सच्छास्त्रकथनंस्तथा ॥६॥ एते नियोजितव्या वै श्राद्धे विप्रा मुनीश्वर । श्राद्धे वर्ज्यान्प्रवक्ष्यामि शृणु तान्सुसमाहितः ॥१०॥ न्यूनांगश्चाधिकांगश्च कदर्यो रोगितस्तथा । कुष्ठी च कुनखी चैव लंबकर्णः क्षतव्रतः ॥११॥ नक्षत्रपाठजीवी च तथा च शवदाहकः । कुवादी परिवेत्ता च तथा देवलकः खलः ॥१२॥ निंदकोऽमर्षणो धूर्तस्तथैव ग्रामयाजकः । असच्छास्त्राभिनिरतः परान्ननिरतस्तथा ॥१३॥ अध्याय २८ सनक बोले—मुनिशार्दूल ! सुनो। अब मैं श्राद्ध की उत्तम विधि का वर्णन कर रहा हूँ। जिसको सुन कर निःसन्देह मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। क्षयाह (निधन तिथि) के पूर्व दिन स्नान कर एक समय ही भोजन करे, रात में भूमि पर सोये और उसी दिन ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे। श्राद्ध करने वाला दातौन, पान, तेल मर्दन, रति, ओषधि और परान्न भोजन छोड़ दे। श्राद्धकर्त्ता और श्राद्धभोजी दोनों के लिए, मार्ग (रास्ता) चलना), कलह, क्रोध, मैथुन भार (वहन) और दिन का सोना वर्जित है ॥१-४॥ श्राद्ध में निमन्त्रित होने पर भी यदि वह व्यक्ति स्त्री संभोग करता है तो वह ब्रह्म-हत्या का भागी और नरक गामी होता है। श्राद्ध में वेदा- ध्यायी, विष्णुभक्त, कुलीन, सदाचारी और शान्त ब्राह्मण को निमन्त्रित करना चाहिए। मुनीश्वर ! राग-द्वेष से हीन, पुराणवेत्ता त्रिमधु (ऋग्वेद का एक अंश) और त्रिसुपर्ण ऋग्वेद के दशम मंडल के तीन विशिष्ट मन्त्र का ज्ञाता, सब पर दया करने वाला, देव पूजा में निरत रहने वाला, स्मृतितत्त्वज्ञ, वेदान्त के तत्त्वों का ज्ञाता, लोक- हितैषी, कृतज्ञ, गुणी, गुरु-सेवक, सत् शास्त्रों का उपदेशक—इतने विप्र श्राद्ध में निमन्त्रित करने के योग्य हैं। अब श्राद्ध में किनको निमन्त्रण नहीं देना चाहिए, इसको कह रहा हूँ, सावधान होकर सुनो ॥५-१०॥ हीनाङ्ग, अधिकांग, कायर, रोगी, कोढ़ी, कुनखी, लंबकर्ण, व्रत को भंग करने वाला, ज्योतिषी, शवदाह करने वाला, कुतर्क करने वाला, परिवेत्ता (अविवाहित बड़े भाई के रहते विवाहित छोटा भाई ) पुजारी, दुष्ट, निंदक, क्रोधी, धूर्त, ग्राम-पुरोहित, असत् शास्त्रों (के अध्ययन) में निरत, परान्नभोजी, शूद्रा की सन्तानों का

१६० नारदीयपुराणम् वृषलीसतिपोष्टा च वृषलीपतिरेव च । कुंडश्च गोलकश्चैव ह्याज्यानां च याजकः ॥१४॥ दंभाचारो वृथामुंडी ह्यन्यस्त्रीधनतत्परः । विष्णुभक्तिविहीनश्च शिवभक्तिपराङ्मुखः ॥१५॥ वेदविक्रयिणश्चैव व्रतविक्रयिणस्तथा । स्मृतिविक्रयिणश्चैव मंत्रविक्रयिणस्तथा ॥१६॥ गायकाः काव्यकर्त्तारो भिषक्छास्त्रोपजीविनः । वेदनिंदापरश्चैव ग्रामारण्यप्रदाहकः ॥१७॥ तथातिकामुकश्चैव रसविक्रयकारकः । कूटयुक्तिरतश्चैव श्राद्धे वर्ज्याः प्रयत्नतः ॥१८॥ निमंत्रयीत पूर्वेद्युस्तस्मिन्नेव दिनेऽथवा । निमंत्रितो भवेद्विप्रो ब्रह्मचारी जितेंद्रियः ॥१९॥ श्राद्धे क्षणस्तु कर्तव्यः प्रसादश्चेति सतम । निमंत्रयेद्द्विजं प्राज्ञं दर्भपाणिर्जितेंद्रियः ॥२०॥ ततः प्रातः समुत्थाय प्रातःकृत्ये समाप्य च । श्राद्धं समाचरेद्विद्वान्काले कुतपसंज्ञिते ॥२१॥ दिवसस्याष्टमे काले यदा मंदायते रविः । स कालः कुतपस्तत्र पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥२२॥ अपराह्नः पितॄणां तु दत्तः कालः स्वयंभुवा । तत्काल एव दातव्यं कव्यं तस्माद्द्विजोत्तमैः ॥२३॥ यत्कव्यं दीयते द्रव्यैरकाले मुनिसत्तम । राक्षसं तद्धि विज्ञेयं पितॄणां नोपतिष्ठति ॥२४॥ कव्यं दत्तं तु सायाह्ने राक्षसं तद्भवेदपि । दाता नरकमाप्नोति भोक्ता च नरकं व्रजेत् ॥२५॥ क्षयाहस्य तिथेर्विप्र यदि दंडमितिंर्भवेत् । विद्धापराह्निकायां तु श्राद्धं कार्यं विजानता ॥२६॥ क्षयाहस्य तिथिर्या तु ह्यपराह्नद्वये यदि । पूर्वे क्षये तु कर्त्तव्या वृद्धौ कार्या तथोत्तरा ॥२७॥ मुहूर्त्तद्वितये पूर्वदिने स्यादपरेऽहनि । तिथिः सायाह्नगा यत्र परा कव्यस्य विश्रुता ॥२८॥ किंचित्पूर्वदिने प्राहुर्मुहूर्त्तद्वितये सति । नैतन्मतं हि सर्वेषां कव्यदाने मुनीश्वर ॥२९॥

पालन करने वाला, वृषली-पति, कुंड (पति के जीवित रहते अन्य पुरुष से उत्पन्न किया हुआ पुत्र), गोलक (पति के मर जाने पर अन्य से उत्पन्न किया हुआ पुत्र ) अपात्रों से यज्ञ करने वाला, दम्भी, व्यर्थ ही मुण्डन कराने वाला अन्यस्त्रीधनलोलुप, विष्णुभक्तिशून्य, शिवभक्ति-पराङ्मुख, वेदविक्रयी, व्रतविक्रयी, स्मृति और मंत्र विक्रयी, गायक, भाट, वैद्य, वेद-निन्दक, गांव और वन में आग लगाने वाला, अति कामुक, रस-विक्रेता, कूटनीतिपरा- यण, इतने लोगों को श्राद्ध में किसी भी प्रकार से निमन्त्रण नहीं देना चाहिए ॥११-१८॥ श्राद्ध के एक दिन पहले अथवा उसी दिन निमन्त्रण दे देना चाहिए । निमन्त्रित विप्र को भी ब्रह्मचारी और संयमी होना चाहिए। मुनि- वर्य ! श्राद्ध में उत्सव और आनन्द भी मनाना चाहिए। जितेन्द्रिय श्राद्धकर्त्ता हाथ में कुशा लेकर विज्ञ ब्राह्मण को निमन्त्रण दे । तदनन्तर प्रातः काल उठकर प्रातः कालीन क्रिया समाप्त करने के बाद विद्वान् व्यक्ति कुतप नामक काल में श्राद्ध करे ॥१९-२१॥ आठ घड़ी दिन बीतने पर जब सूर्य मन्द होने लगता तब वही काल कुतप कहलाता है। उस समय पितरों के उद्देश्य से दिया हुआ पदार्थ अक्षय हो जाता है। ब्रह्मा ने पितरों के लिए अपराह्न काल ही निश्चित किया। इसलिए उत्तम द्विज उसी समय पितरों को कव्य (पितरों को देय पदार्थ) प्रदान करें । मुनिश्रेष्ठ ! जो कव्य पदार्थ अकाल में दिये जाते हैं वे राक्षसों के योग्य हो जाते हैं और पितरों को प्राप्त नहीं होते ॥२२-२४॥ सायंकाल का दिया हुआ कव्य राक्षसों के योग्य तो हो ही जाता है साथ ही उसका दाता और भोक्ता भी नरकलोक में जाता है । यदि क्षयाह तिथि केवल एक दण्ड ही रहे तो विद्वान् व्यक्ति उसी दिन अपराह्न काल में श्राद्ध करें । क्षयाह की तिथि यदि दो अपराह्नकाल में हो तो पूर्व क्षयाह तिथि में कुछ श्राद्ध किया कर दे और शेष कर्म दूसरे दिन अपराह्न में करे । यदि क्षयाह की तिथि पहले दिन अपराह्न में दो मुहूर्त्त हो तो सायंकाल में पड़ने वाली तिथि के दिन ही कव्य दान श्रेष्ठ माना गया है ॥२५-२८॥ मुनीश्वर ! कुछ लोग पहले दिन को ही दो मुहूर्त्त क्षयतिथि के रहने पर भी कव्य के लिए श्रेष्ठ मानते हैं परन्तु यह सर्वमान्य मत नहीं है।

१८१ अष्टाविंशोऽध्यायः निमंत्रितेषु विप्रेषु मिलितेषु द्विजोत्तम । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा तेभ्योऽनुज्ञां समाहरेत् ॥३०॥ श्राद्धार्थं समनुज्ञातो विप्रांन्भूयो निमंत्रयेत् । उभौ च विश्वेदेवार्थं पित्रर्थं त्रीन्यथाविधि ॥३१॥ देवतार्थं च पित्रर्थमेकैकं वा निमंत्रयेत् । श्राद्धार्थं समनुज्ञातः कारयेन्मंडलद्वयम् ॥३२॥ चतुरस्रं ब्राह्मणस्य त्रिकोणं क्षत्रियस्य वै । वैश्यस्य वर्तुलं ज्ञेयं शूद्रस्याभ्युक्षणं भवेत् ॥३३॥ ब्राह्मणानामभावे तु भ्रातरं पुत्रमेव च । आत्मानं वा नियुंजीत न विप्रं वेदवर्जितम् ॥३४॥ प्रक्षाल्य विप्रपादांश्च ह्याचांतानुपवेश्य च । यथावदर्चनं कुर्यात्स्मरन्नारायणं प्रभुम् ॥३५॥ ब्राह्मणानां तु मध्ये च द्वारदेशे तथैव च । अपहता इत्यृचा वै कर्त्ता तु विकिरेत्तिलान् ॥३६॥ यवैर्दभैश्च विश्वेषां देवानामिदमासनम् । दत्तेवेति भूयो दद्याच्च दैवे क्षणप्रतीक्षणम् ॥३७॥ अक्षय्यासनयोः षष्ठी द्वितीयावाहने स्मृता । अन्नदाने चतुर्थी स्याच्छेषाः संबुद्धयः स्मृताः ॥३८॥ आसाद्य पात्रद्वितयं दर्भशाखासमन्वितम् । तत्पात्रे सेचयेत्तोयं शन्नोदेवीत्यृचा ततः ॥३९॥ यवोसीति यवान् क्षिप्त्वा गंधपुष्पे च वाग्यतः । आवाहयेत्ततो देवान्विश्वे देवास इत्यृचा ॥४०॥ या दिव्या इतिमंत्रेण दद्यादर्घ्यं समाहितः । गंधैश्च पत्रपुष्पैश्च धूपैदीपैरथार्चयेत् ॥४१॥ देवैश्च समनुज्ञातो यजेत्पितृगणांस्तथा । तिलसंयुक्तदर्भैश्च दद्यात्तेषां सदासनम् ॥४२॥ पात्राण्यासादयेत्त्रीणि ह्यर्थाय पूर्ववद्द्विजः । शन्नो देव्या जलं क्षिप्त्वा तिलोसीति तिलान्क्षिपेत् ॥४३॥ उशन्त इत्यृचावाह्य पितॄन्विप्रः समाहितः । या दिव्या इति मंत्रेण दद्यादर्घ्यं च पूर्ववत् ॥४४॥ गंधैश्च पत्रपुष्पैश्च धूपैदीपैश्च सत्तम । वासोभिर्भूषणैश्चैव यथाविभवमर्चयेत् ॥४५॥ ततोऽन्नाग्रं तमादाय घृतयुक्तं विचक्षणः । अग्नौ करिष्य इत्युक्त्वा तेभ्योऽनुज्ञां समाहरेत् ॥४६॥ द्विजोत्तम ! निमन्त्रित विप्रों के आने पर प्रायश्चित्त से शुद्ध आत्मा वाला वह श्राद्ध-कर्त्ता उनसे आदेश प्राप्त करे । श्राद्ध के लिए अनुमति पा लेने पर पुनः उन विप्रों को निमन्त्रित करे । विधि के अनुसार विश्वेदेव के लिए दो और पितृकार्य के लिए तीन विप्रों को निमन्त्रण दे ॥२९-३१॥ अथवा देवता और पितृकार्य के लिए एक-एक ब्राह्मण को ही निमन्त्रण दे । श्राद्ध के निमित्त आज्ञा पाकर दो मण्डलों को बनाना चाहिए । ब्राह्मण का मण्डल चौकोना, क्षत्रिय के लिए त्रिकोना, वैश्य का गोल और शूद्र के लिए तो केवल जलसिंचन से पवित्र की हुई भूमि हो पर्याप्त है । यदि श्राद्ध- कार्य के लिए कोई ब्राह्मण न मिले तो अपने भाई या पुत्र को ही उस पद पर नियुक्त करे। अथवा स्वयं ही श्राद्धकर्म करे परन्तु किसी वेद विमुख विप्र को उस कार्य में न लगावे ॥३२-३४॥ पहले ब्राह्मण के चरण धोये फिर आचमन कराकर आसन पर बैठाये तत्पश्चात् प्रभु नारायण का स्मरण करता हुआ यथाविधि उसकी पूजा करे । कर्त्ता ब्राह्मणों के मध्य में और द्वार देश पर 'अपहता............' इस ऋचा से इधर-उधर तिल फेंक दे । सब देवताओं को यव और कुशों का आसन दे । इसके अनन्तर पुनः दैवेक्षण, और प्रतीक्षण (देख-रेख) करने का दायित्व सौंपे । अक्षय्य पान और आसन प्रदान करने में षष्ठी तिथि विहित है । आवाहन में द्वितीया, अन्नदान में चतुर्थी और सम्बोधन करने में अन्य तिथियों का उपयोग करना चाहिए । कुशशाखा से युक्त दो पात्रों को लेकर 'शन्नो देवी' इस मन्त्र को पढ़कर उस पात्र में जल छोड़े । 'यवोऽसि' इस मन्त्र से यव छिड़ककर मौन होकर गन्ध और पुष्प अर्पित करे । तदनन्तर 'विश्वे देवाःस्म' इस ऋचा से देवों का आवाहन करे ॥३५-३९॥ एकाग्र होकर 'या दिव्या' इस मन्त्र से अर्घ्य दे । फिर गन्ध, पत्र, पुष्प, धूप और दीप से उन आवाहित देवों को पूजा करे । देवों की पूजा से निवृत्त होकर उनसे आदेश लेकर पितरों की पूजा प्रारम्भ करे । पहले इनको तिल से युक्त कुशा का आसन दे । वह द्विज पूर्व की भाँति अर्घ्य के लिए तीन पात्रों को रखे । 'शन्नो देव्या' इस मन्त्र से जल छिड़ककर 'तिलोऽसि' इस मन्त्र से तिल छिड़के ॥४०-४३॥ सावधान होकर वह विप्र 'उशन्तः' इस ऋचा से पितरों का आवाहन कर 'या देव्या' इस मंत्र से

१८२ नारदीयपुराणम् करवै करवाणीति चापृष्टा ब्राह्मणा मुने । कुरुष्व क्रियतां वेति कुर्विति ब्रूयुरेव च ॥४७॥ उपासनाग्निमाधाय स्वागृह्योक्तविधानतः । सोमाय च पितृमते स्वधा नम इतीरयेत् ॥४८॥ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नम इतीह वा । स्वाहान्तेनापि वा प्राज्ञो जुहुयात्पितृयज्ञवत् ॥४९॥ आभ्यामेवाहुतिभ्यां तु पितॄणां तृप्तिरक्षया । अग््न्यभावे तु विप्रस्य पाणौ होमो विधीयते ॥५०॥ यथाचारं प्रकुर्वीत पाणावग्नौ च वा द्विज । नह्यग्निद्दूरगः कार्यः पार्वणे समुपस्थिते ॥५१॥ संधायाग्निं ततः कार्यं कृत्वा तं विसृजेत्कृती । यद्यग्निद्दूरगो विप्र पार्वणे समुपस्थिते ॥५२॥ भ्रातृभिः कारयेच्छ्राद्धं साग्निकैर्विधिवाद्धिजैः । क्षयाहे चैव संप्राप्ते स्वस्याग्निद्दूरगो यदि ॥५३॥ तथैव भ्रातरस्तत्र लौकिकाग्नावपि स्थिताः । उपासनाग्नौ दूरस्थे समीपे भ्रातरि स्थिते ॥५४॥ यद्यग्नौ जुहुयाद्वापि पाणौ वा स हि पातकी । उपासनाग्नौ दूरस्थे केचिदिच्छन्ति वै द्विजाः ॥५५॥ तच्छेषं विप्रपात्रेषु विकिरेत्संस्मरन्हरिम् । भक्ष्यैर्भोज्यैश्च लेह्यैश्च स्वाद्यैर्विप्रान्प्रपूजयेत् ॥५६॥ अन्नत्यागं ततः कुर्यादुभयत्र समाहितः । आगच्छंतु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः ॥५७॥ ये यत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवंतु ते । इति संप्राथर्येद्देवान्ये देवास ऋचा नु वै ॥५८॥ तथा संप्राथर्येद्विप्रान्ये च हेति ऋचा पितॄन् । अमृतानां मृतानां च पितॄणां दीप्ततेजसाम् ॥५९॥ नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां योगचक्षुषाम् । एवं पितॄन्नमस्कृत्य नारायणपरायणः ॥६०॥ दत्तं हविश्च तत्कर्म विष्णवे विनिवेदयेत् । ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे भुञ्जीरन्वाग्यता द्विजाः ॥६१॥ पूर्व की भाँति अर्घ्य दे । मुनिश्रेष्ठ ! गन्ध, पुष्प, धूप, वस्त्र, आभूषण आदि से अपने विभव के अनुसार उन आबाहित पितरों की सविधि पूजा करे । तत्पश्चात् वह विचक्षण घी मिला अन्नाग्र लेकर 'अग्नौ करिष्ये' (अग्नि में हवन करना चाहता हूँ) यह कहकर उनसे आज्ञा प्राप्त करे । मुने ! 'करवै या करवाणि' (क्या मैं करूँ) यह कहकर ब्राह्मण से पूछे । कुरुष्व क्रियताम् अथवा कुरु (करो) ऐसा वे ब्राह्मण कहें ॥४४-४७॥ अपने गृह्य सूत्र के विधान से उपासना-अग्नि का आधान कर 'सोमाय नमः' और 'पितृमते स्वधा' ऐसा कहे । 'अग्नये नमः' 'कव्यवाहनाय स्वधा' ऐसा कहकर अथवा स्वाहान्त मन्त्र से (अग्नये स्वाहा, कव्यवाहनाय स्वाहा) पितृयज्ञ के समान हवन करे । इन्हीं दो आहुतियों को पितरों की तृप्ति के लिए अग्नि में हवन करे । अग्नि के अभाव में विप्र के हाथ में भी हवन करने की विधि है ॥४८-५०॥ द्विज ! आचार के अनुसार अग्नि अथवा ब्राह्मण के हाथ में हवन करना चाहिए । पार्वण श्राद्ध के समय अग्नि दूर नहीं रहनी चाहिए । कृती अग्नि-स्थापन के अनन्तर हवन कर उसका विसर्जन कर दे । विप्र ! पार्वण श्राद्ध के दिन यदि अग्नि दूर रहे तो अग्निहोत्री ब्राह्मणों और भाइयों से विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए । क्षयाह के आ जाने पर यदि उपासनाग्नि दूर हो और उसी प्रकार भाई भी दूर रहें तो लौकिक अग्नि में भी हवन कर ले । यदि उपासनाग्नि दूर हो और भाई समीप हो तो जो व्यक्ति अग्नि में या ब्राह्मण के हाथ में हवन करे वह पातकी है। कोई द्विज उपासनाग्नि को दूर रखना ही पसन्द करते हैं ॥५१-५५॥ शेष अन्न को हरि का स्मरण करते हुए विप्रपात्रों में छोड़ देना चाहिए । भक्ष्य, भोज्य और लेह्य आदि स्वादिष्ट पदार्थों से विप्रों की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर दोनों पात्रों में अन्न छोड़े और 'महाभाग महाबल विश्वेदेव आयें । श्राद्ध में जो जिस स्थान के अधिकारी माने गये हैं वे अपने स्थान पर श्राद्धकर्म को सुचारू रूप से सम्पन्न करने के लिए सावधान हो जायं, इस मन्त्रवाक्य से प्रार्थना कर 'ये देवास-इस ऋचा से देवों की प्रार्थना करे । 'ये च हेति' इस मन्त्र से विप्रों की और 'अमूर्तं, मूर्त और दीप्त तेज वाले, और योगचक्षु ध्यान परायण पितरों को नमस्कार करता हूँ ॥५६-५९॥ इस वाक्य से पितरों को नमस्कार कर स्वयं नारायण का स्मरण करते हुए दी हुई आहुति को और उस श्राद्ध कर्म को विष्णु के निमित्त अर्पण कर दे । इसके पश्चात् वे निमन्त्रित ब्राह्मण वाणी को संयत कर उस श्राद्धान्न को खायें । यदि भोजन के समय कोई हँसे या बातचीत करे तो वह हविष्यान्न

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अष्टाविंशोऽध्यायः हसते वदते कोऽपि राक्षसे तद्भवेद्विः । यथाचारं प्रदेयं च मधुमांसादिकं तथा ॥६२॥ पाकादि च प्रशंसेरन् वाग्यता धृतभाजनाः । यदि पात्रं त्यजेत्कोऽपि ब्राह्मणः श्राद्धयोजितः ॥६३॥ श्राद्धहंता स विज्ञेयो नरकायोपपद्यते । भुंजानेषु च विप्रेषु ह्यान्योन्यं संस्पृशेयदि ॥६४॥ तदन्नमत्स्यजम्भुक्त्वा गायत्र्यष्टशतं जपेत् । भुज्यमानेषु विप्रेषु कर्त्ता श्रद्धापरायणः ॥६५॥ स्मरेन्नारायणं देवमनंतमपराजितम् । रक्षोघ्नान्वैष्णवांश्चैव पैतृकांश्च विशेषतः ॥६६॥ जपेच्च पौरुषं सूक्तं नाचिकेतत्रयं तथा । त्रिमधु त्रिसपर्णं च पावमानं यजूंषि च ॥६७॥ सामान्याप तथोक्तानि वदेत्पुण्यप्रदांस्तथा । इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि चैव हि ॥६८॥ भुंजीरन्ब्राह्मणा यावत्तावेताञ्जपेद्विज्ज । ब्राह्मणेपु च भुक्तेषु विकिरं विक्षिपेत्तथा ॥६६॥ शेषमन्नं वदेच्चैव मधुसूक्तं च वै जपेत् । स्वयं च पादौ प्रक्षाल्य सम्यगाचम्य नारद ॥७०॥ आचांतेषु च विप्रेषु पिंडं निर्वापयेत्ततः । स्वस्तिवाचनकं कुर्यादक्षय्योदकमेव व ॥७१॥ दत्त्वा समाहितः कुर्यात्तथा विप्राभिवादनम् । अचालयित्वा पात्रं तु स्वस्ति कुर्वंति ये द्विजाः ॥७२॥ वत्सरं पितरस्तेषां भवंत्युच्छिष्टभोजिनः । दातारो नोऽभिवर्द्धन्तामित्याद्यैः स्मृतिभाषितैः ॥७३॥ आशीर्वचो लभेत्तेभ्यो नमस्कारं चरेत्ततः । दद्याच्च दक्षिणां शक्त्या तांबूलं गंधसंयुतम् ॥७४॥ न्युब्जपात्रमथानीय स्वधाकारमुदीरयेत् । वाजेवाजे इति ऋचा पितॄन्देवान्विसर्जयेत् ॥७५॥ भोक्ता च श्राद्धकृत्तस्यां राजन्यां मैथुनं त्यजेत् । तथा स्वाध्यायमध्वानं प्रयत्नेन परित्यजेत् ॥७६॥ अध्वगश्चातुरश्चैव विहीनश्च धनैस्तथा । आमश्राद्धं प्रकुर्वीत हेम्ना वास्पृश्यभार्यकः ॥७७॥ द्रव्याभावे द्विजाभावे ह्यन्नमात्रं च पाचयेत् । पैतृकेन तु सूक्तेन होमं कुर्याद्विचक्षणः ॥७८॥

राक्षस हो जाता है। उस समय उन विप्रों को आचारानुसार मधु, मांस आदि भी दिया जा सकता है ॥६०-६२॥ वे विप्र उन भोजन-पात्रों को हाथ में लेकर पाक आदि की प्रशंसा करते हुये, मौन होकर भोजन करें। यदि श्राद्ध-निमन्त्रित कोई ब्राह्मण उस पात्र को भोजन के समय छोड़ दे तो वह नरकगामी होता है। भोजन करते समय यदि वे ब्राह्मण एक दूसरे को छू दें तो उस अन्न को खा लेने के बाद एक सौ आठ बार गायत्री का जप करे ॥६३-६४३॥ उन विप्रों के भोजन करते समय श्राद्धकर्त्ता श्रद्धापूर्वक अपराजित अनन्त नारायणदेव का स्मरण करे, विशेष रूप से राक्षसीय बाधाओं को दूर करने वाले वैष्णव और पितर सम्बन्धी मन्त्रों को जपे। पुरुष सूक्त, नाचिकेतत्रय, त्रिमधु, त्रिसुपर्ण, पावमान और यजुर्मन्त्रों का अथवा साममन्त्रों और पुण्यप्रद मन्त्रों का पाठ करे। द्विज ! जब तक ब्राह्मण भोजन करते रहें तब तक इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और पूर्व कथित मन्त्रों का जप करना चाहिए। ब्राह्मण जब भोजन कर चुकें तब शेष अन्न का विकिर दे (अर्थात् शेषात्न को बिखेर दे) और मधुसूक्त का जप करे। नारद ! स्वयं पैर धोकर और आचमन कर जब वे ब्राह्मण भी आचमन कर लें तब पिंड निर्वण करे ॥६५-७०३॥ स्वस्तिपाठ और अक्षय्योदक करने के अनन्तर सावधान हो विप्रों का अभिवादन करे। जो द्विज पात्र को बिना हिलाये स्वस्ति, ऐसा कहते हैं उनके पितर एक वर्ष तक जूठा भोजन करते हैं। श्राद्ध कर्त्ता उन ब्राह्मणों से 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम्' (हमारे दाता सदा विभवशाली रहें) आदि स्मृति में कहे गए आशीर्वाद प्राप्त करे और उनको नमस्कार करे। आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद यथाशक्ति उन ब्राह्मणों की ताम्बूल और सुगन्धित पदार्थ के सहित दक्षिणा दे। न्युब्जपात्र को लाकर स्वधाकार कहे और 'वाजे बाजे' इस ऋचा से पितरों और देवों का विसर्जन करे ॥७१-७५॥ श्राद्ध भोजन करने वाला और श्राद्धकर्त्ता उस रात्रि को मैथुन न करें, स्वाध्याय और मार्ग का चलना विशेष रूप से छोड़ दें। रास्ता चलने वाला, रोगी और धनहीन श्राद्धकर्त्ता आम श्राद्ध (कच्चे अन्न से किया जाने बाला श्राद्ध) करे अथवा भार्या सहित सोने का स्पर्श करे। द्रव्य के अभाव में अथवा किसी ब्राह्मण के न मिलने

१६४ नारदीयपुराणम् अत्यंतहव्यशून्यश्चेत्स्वशक्त्या तु तृणं गवाम् । स्नात्वा च विधिवद्विप्र कुर्याद्वा तिलतर्पणम् ॥७६॥ अथवा रोदनं कुर्यादित्युच्चैर्विजने वने । दरिद्रोऽहं महापापी वदन्निति विचक्षणः ॥८०॥ परेद्युः श्राद्धकृन्मर्त्यो यो न तर्पयते पितॄन् । तत्कुलं नाशमायाति ब्रह्महत्यां च विंदति ॥८१॥ श्राद्धं कुर्वंति ये मर्त्याः श्रद्धावंतो मुनीश्वर । न तेषां संततिच्छेदः संपन्नास्ते भवंति च ॥८२॥ पितॄन्यजंति ये श्राद्धे तैस्तु विष्णुः प्रपूजितः । तस्मिंस्तुष्टे जगन्नाथे सर्वास्तुष्यंति देवताः ॥८३॥ पितरो देवताश्चैव गंधर्वाप्सरसस्तथा । यक्षाश्च सिद्धा मनुजा हरिरैव सनातनः ॥८४॥ येनेदमखिलं जातं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माद्दाता च भोक्ता च सर्वं विष्णुः सनातनः ॥८५॥ यदस्ति विप्र यन्नास्ति दृश्यं चादृश्यमेव च । सर्वं विष्णुमयं ज्ञेयं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥८६॥ आधारभूतो विश्वस्य सर्वभूतात्मकोऽव्ययः । अनौपम्यस्वभावश्च भगवान्हव्यकव्यभुक् ॥८७॥ परब्रह्माभिधेयो य एक एव जनार्दनः । कर्त्ता कारयिता चैव सर्वं विष्णुः सनातनः ॥८८॥ इत्येवं ते मुनिश्रेष्ठ श्राद्धस्य विधिरुत्तमः । कथितः कुर्वतामेवं पापं सद्यो विलीयते ॥८६॥ य इदं पठते भक्त्या श्राद्धकाले द्विजोत्तमः । पितरस्तस्य तुष्यंति संततिश्चैव वर्द्धते ॥६०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे श्राद्धक्रियावर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥ पर स्वयं केवल अन्न पकावे और वह विचक्षण व्यक्ति पैतृक सूक्त से हवन करे । यदि किसी भी प्रकार हवन करने में असमर्थ हो तो अपनी शक्ति के अनुसार गायों को घास खिला दे अथवा विप्र स्नान करके विधिपूर्वक तिल से तर्पण कर दे ॥७६-७९॥ अथवा किसी विजन वन में जाकर वह बुद्धिमान् व्यक्ति 'मैं महापापी हूँ दरिद्र हूँ' यह कहता हुआ उच्च स्वर से रोये । जो श्राद्धकर्त्ता दूसरे दिन पुनः पितरों का तर्पण नहीं करता है उसका कुल नष्ट हो जाता और वह ब्रह्महत्या का भागी होता है। मुनीश्वर ! जो श्रद्धालु व्यक्ति श्राद्ध करते हैं उनका वंशच्छेद कभी नहीं होता और वे सदा धनवान् रहते हैं। जो श्राद्ध में पितरों की पूजा करते हैं वे स्वयं विष्णु की पूजा करते हैं और विष्णु के प्रसन्न रहने पर सभी देवता स्वयं प्रसन्न हो जाते हैं ॥८०-८३॥ पितर, देवता, गन्धर्व, अप्सरायें, यक्ष, सिद्ध और सभी मनुष्य, ये सनातन हरि के ही रूप हैं। जिससे यह सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है, अतएव दाता या भोक्ता सब कुछ वही सनातन विष्णु ही हैं। विप्र ! इस संसार में जो कुछ भाव या अभाव दृश्य या अदृश्य पदार्थ है, सबको विष्णुमय ही समझना चाहिए । इसलिए विष्णु के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस विश्व के आधारभूत वे ही सर्वभूतात्मक, अव्यय, अनुपम प्रकृति वाले, हव्यकव्यभोजी भगवान् विष्णु हैं ॥८४-८७॥ परब्रह्म कहाने वाले जो जनार्दन हैं वे एक ही हैं। कर्त्ता और कारयिता सब कुछ वही सनातन विष्णु हैं। मुनिश्रेष्ठ ! यही श्राद्ध की उत्तम विधि है जो तुम्हारे सामने मैंने व्यक्त कर दी। जो इस विधि से श्राद्ध करते हैं उनके पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। जो द्विजश्रेष्ठ श्राद्ध के समय भक्तिपूर्वक इस (अध्याय) का पाठ करता है उसके पितर प्रसन्न होते हैं और उसकी सन्तान-वृद्धि होती है ॥८८-६०॥ श्रीनारदीयमहापुराण में श्राद्धवर्णन नामक अट्ठाईसवां अध्याय समाप्त ॥२८॥

एकोनत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच तिथीनां निर्णयं वक्ष्ये प्रायश्चित्तविधिं तथा । शृणुष्व तन्मुनिश्रेष्ठ कर्मसिद्धिर्यतो भवेत् ॥१॥ श्रौतं स्मार्तं व्रतं दानं यच्चान्यत्कर्म वैदिकम् । अनिर्णीतासु तिथिषु न किंचित्फलति द्विज ॥२॥ एकादश्यष्टमी षष्ठी पौर्णमासी चतुर्दशी । अमावस्या तृतीया च ह्युपवासव्रतादिषु ॥३॥ परविद्धाः प्रशस्ताः स्युर्न ग्राह्याः पूर्वसंयुताः । नागविद्धा तु या षष्ठी शिवविद्धा तु सप्तमी ॥४॥ दशम्येकादशीविद्धा नोपोष्याः स्युः कदाचन । दर्शं च पौर्णमासीं च सप्तमीं पितृवासरम् ॥५॥ पूर्वविद्धं प्रकुर्वाणो नरकायोपपद्यते । कृष्णपक्षे पूर्वविद्धां सप्तमीं च चतुर्दशीम् ॥६॥ प्रशस्तां केचिदाहुश्च तृतीयां नवमीं तथा । व्रतादीनां तु सर्वेषां शुक्लपक्षो विशिष्यते ॥७॥ अपराह्नाच्च पूर्वाह्नि ग्राह्यं श्रेष्ठतरं यतः । असंभवे व्रतादीनां यदि पौर्वाह्निकी तिथिः ॥८॥ मुहूर्तद्वितयं ग्राह्यं भगवत्युदिते रवौ । प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या तिथिनक्तव्रते सदा ॥९॥ उपोषितव्यं नक्षत्रं येनास्तं याति भास्करः । तिथिनक्षत्रसंयोगविहितव्रतकर्मणि ॥१०॥ प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या त्वन्यथा निष्फलं भवेत् । अर्धरात्रादधो या तु नक्षत्रव्यापिनी तिथिः ॥११॥ अध्याय २९ तिथियों का निर्णय **सनक बोले—**तिथियों का निर्णय और प्रायश्चित्त विधि को अब कह रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ ! उसको सुनो, जिससे कर्मसिद्धि प्राप्त होती है। द्विज ! श्रौत तथा स्मार्तव्रत, दान अथवा जो अन्य वैदिक कर्म हैं, उन्हें अनिर्णीत तिथियों में करने से कुछ भी फल नहीं होता है। एकादशी, अष्टमी, षष्ठी, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अमावस्या और तृतीया यदि पर तिथि से (आगे की तिथि से) विद्ध हो तो उपवास, व्रत आदि में प्रशस्त मानी जाती हैं; परन्तु पूर्वविद्ध ये तिथियां ग्राह्य नहीं हैं ॥१-३॥ नाग से विद्ध षष्ठी, शिव विद्ध सप्तमी, दशमी विद्ध एकादशी को कभी भी उपवास नहीं करना चाहिए । दर्श (अमावस्या), पूर्णिमा, सप्तमी और पितृदिवस ये यदि पूर्वतिथियों से विद्ध हों तो उस दिन उपवास या व्रत करने से मनुष्य नरकगामी होता है। कुछ लोग कृष्णपक्ष की पूर्वविद्ध सप्तमी, चतुर्दशी, तृतीया और नवमी को प्रशस्त मानते हैं। सब व्रत आदि शुभ कर्मों के लिए शुक्लपक्ष प्रशस्त माना जाता है ॥४-७॥ अपराह्न तिथि की अपेक्षा पूर्वाह्न की तिथि ग्राह्य है, क्योंकि वह श्रेष्ठ है। व्रतादि को पौर्वाह्निकालिक तिथि यदि असम्भव हो तो सूर्योदयकाल की दो मुहूर्त की तिथि भी व्रत के लिए ग्राह्य है। रात्रिकालीन व्रत में प्रदोषव्यापिनी तिथि ही ग्राह्य है। जिस व्रत में तिथि और नक्षत्र दोनों का संयोग विहित है उसमें जिस नक्षत्र में सूर्यास्त हो उसी नक्षत्र को मानकर उपवास करना चाहिए। प्रदोषव्यापिनी तिथि ही रात्रिकालीन व्रत के लिए ग्राह्य है, अन्यथा वह निष्फल है ॥८-१०॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो नक्षत्रव्यापिनी तिथि आधी रात के बाद तक रहती है वही नक्षत्रविहित व्रत के लिए ग्राह्य है। यदि दोनों दिन की आधी रात तक वह इष्ट २४—ना० पु०

१८६ नारदीयपुराणम् सैव ग्राह्या मुनिश्रेष्ठ नक्षत्रविहितव्रते । यद्यर्द्धरात्रयोर्व्याप्तं नक्षत्रं तु दिनद्वये ॥१२॥ तत्पुण्यं तिथिसंयुक्तं नक्षत्रं ग्राह्यमुच्यते । अर्द्धरात्रद्वये स्यातां नक्षत्रं च तिथिर्यदि ॥१३॥ क्षये पूर्वा प्रशस्ता स्याद्वृद्धौ कार्या तथोत्तरा । अर्द्धरात्रद्वये व्याप्ता तिथिनक्षत्रसंयुता ॥१४॥ ह्रासवृद्धिविशून्या चेद् ग्राह्या पूर्वा तथा परा । ज्येष्ठासंमिश्रितंमूलं रोहिणी वह्निसंयुता ॥१५॥ मित्रेण संयुता ज्येष्ठा संतानादिविनाशिनी । ततः स्युस्तिथयः पुण्याः कर्मानुष्ठानतो दिवा ॥१६॥ रात्रिव्रतेषु सर्वेषु रात्रियोगो विशिष्यते । तिथिनक्षत्रयोगेन या पुण्या परिकीर्तिता ॥१७॥ तस्यां तु तद्व्रतं कार्यं सैव कार्या विचक्षणैः । उदयव्यापिनी ग्राह्या श्रवणद्वादशी व्रते ॥१८॥ सूर्येन्दुग्रहणे यावत्तावद् ग्राह्या जपादिषु । संक्रांतिषु तु सर्वासु पुण्यकालो निगद्यते ॥१९॥ स्नानदानजपादीनां कुर्वतामक्षयंफलम् । तत्र कर्कटको ज्ञेयो दक्षिणायनसंक्रमः ॥२०॥ पर्वतो घटिकास्त्रिंशत्पुण्यकालं विदुबुर्धाः । वृषभे वृश्चिके चैव सिंहे कुम्भे तथैव च ॥२१॥ पूर्वमष्टमुहूर्तास्तु ग्राह्याः स्नानजपादिषु । तुलायां चैव मेषे च पूर्वतः परतस्तथा ॥२२॥ ज्ञेया दशैव घटिका दस्तास्याक्षयतावहाः । कन्यायां मिधुने चैव मीने धनुषि च द्विज ॥२३॥ घटिकाः षोडश ज्ञेया परतः पुण्यदायिकाः । माकरं संक्रमं प्राहुरुत्तरायणसंज्ञकम् ॥२४॥ परास्त्रिंशच्च घटिकाश्चत्वारिंशच्च पूर्ववत् । आदित्यशीतकिरणौ ग्राह्यावस्तंगतौ यदि ॥२५॥ स्नात्वा भुंजीत विप्रेन्द्र परेद्युः शुद्धमंडलम् । दृष्टचंद्रा सिनीवाली नष्टचंद्रा कुहूः स्मृता ॥२६॥ अमावश्या द्विधा प्रोक्ता विद्वद्भिर्धर्मलिप्सुभिः । सिनीवाली द्विजैर्ग्राह्या साग्निकैः श्राद्धकर्मणि ॥२७॥


नक्षत्र रहे तो वही तिथिसंयुक्त नक्षत्र पुण्यप्रद और ग्राह्य है। यदि दो आधी रात तक नक्षत्र और तिथि दोनों रहें तो (तिथि के) क्षय में पूर्वा तिथि प्रशस्त है और वृद्धि में उत्तरा तिथि। यदि कोई तिथि (एक) नक्षत्र से युक्त रहकर दो अर्धरात्रि तक चले और उसमें क्षय तथा वृद्धि न हो तो पूर्वा और परा दोनों तिथियाँ ग्राह्य हैं। ज्येष्ठा से युक्तमूल, वह्नि से युक्त रोहिणी और मैत्र नक्षत्र से युक्त ज्येष्ठा नक्षत्र में होने वाले कर्म संतान आदि के नाश हैं। इसके अतिरिक्त सारी तिथियाँ पुण्य तिथि हैं यदि कर्मानुष्ठान दिन को विहित हो ॥११-१६॥ सब रात्रिव्रतों में रात्रियोग ही विशिष्ट माना गया है। तिथि और नक्षत्र के योग से जो तिथि पुण्य तिथि मानी गई है उसीमें बुद्धिमान् व्यक्ति को वह व्रत करना चाहिए। व्रत में उदय व्यापिनी श्रवण द्वादशी ग्राह्य है। जप आदि कर्मों के लिए जब तक सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण रहे तब तक का काल ग्राह्य है। सब संक्रान्तियों में पुण्य काल माना जाता है ॥१७-१६॥ उस समय स्नान, दान और जप करने से अक्षय फल मिलता है। संक्रान्ति को दक्षिणायन काल समझा जाता है। बुधजन उसके पूर्व की तीस घड़ी को पुण्यकाल मानते हैं। वृष, वृश्चिक, सिंह और कुम्भ की संक्रान्ति के पूर्व के आठ मुहूर्त्त स्नान और जप के लिए ग्राह्य हैं। तुला और मेष संक्रान्ति के पूर्व और पर काल दोनों ग्राह्य हैं। द्विज ! कन्या, मिथुन, मीन और धन संक्रान्ति के पूर्व की दश ही घड़ियां ग्राह्य हैं ॥२०-२३॥ मकर संक्रान्ति को उत्तरायण काल कहते हैं उसका सोलह घड़ी का पर काल ही पुण्य काल माना जाता है। सूर्य और चन्द्रमा यदि ग्रहणावस्था में ही अस्त हो जाँय तो सूर्य के अस्त होने के बाद की तीस घड़ियाँ और चन्द्रमा के अस्त होने के पूर्व की चालीस घड़ियां पुण्यकाल मानी गई हैं ॥२४-२५॥ विप्रेन्द्र ! दूसरे दिन अपने अपने गृह-मण्डल को पवित्र कर स्नान के बाद भोजन करना चाहिए। जिस अमावस्या को चन्द्रमा दीख पड़ता है, उसको सिनीवाली और जिस दिन नहीं दिखाई पड़ता उसको कुहू कहते हैं। इस प्रकार धर्मप्रेमी विद्वानों ने दो प्रकार की अमावस्या बतलाई है। श्राद्ध कर्म में अग्निहोत्री द्विजों के लिए सिनीवाली ग्राह्य मानी गई है ॥२६-२७॥ स्त्री, शूद्र और अग्नि स्थापन न करने वाले द्विजों के लिए कुहू ही ग्राह्य है। यदि दो अपराह्न

१८७ एकोनत्रिंशोऽध्यायः कुहूः स्त्रीभिस्तथा शूद्रैरपि वानग्निकैस्तथा । अपराह्नद्वयव्यापिन्यमावास्या तिथैर्यदि ॥२८॥ क्षये पूर्वा तु कर्त्तव्या वृद्धौ कार्या तथोत्तरा । अमावास्या प्रतीता चेन्मध्याह्नात्परतो यदि ॥२६॥ भूतविद्धेति विख्याता सद्भिः शास्त्रविशारदैः । अत्यन्तक्षयपक्षे तु परेद्युरपराह्नगा ॥३०॥ तत्र ग्राह्या सिनीवाली सायाह्नव्यापिनी तिथिः । अर्वाचीनक्षये चैव सायाह्नव्यापिनी तथा ॥३१॥ सिनीवाली परा ग्राह्या सर्वथा श्राद्धकर्मणि । अत्यन्ततिथिवृद्धौ तु भूतविद्धां परित्यजेत् ॥३२॥ ग्राह्या स्यादपराह्नस्था कुहूः पैतृककर्मणि । यथार्वाचीनवृद्धौ तु संत्याज्या भूतसंयुता ॥३३॥ परेद्युर्विबुधश्रेष्ठैः कुहूर्ग्राह्या पराह्नगा । मध्याह्नद्वितये व्याप्ता ह्यमावस्या तिथैर्यदि ॥३४॥ तत्रेच्छया च संग्राद्या पूर्वा वाथ पराथवा । अन्वाधानं प्रवक्ष्यामि सन्तः संपूर्णपर्वणि ॥३५॥ प्रतिपद्दिवसे कुर्याद्यागं च मुनिसत्तम । पर्वणो यश्चतुर्थांश आद्यः प्रतिपदस्त्रयः ॥३६॥ यागकालः स विज्ञेयः प्रातरुक्तो मनीषिभिः । मध्याह्नद्वितये स्याताममावस्या च पूर्णिमा ॥३७॥ परेद्युरेव विप्रेन्द्र सद्यः कालो विधीयते ॥३८॥ पूर्वद्वये परेद्युः स्यात्संगवात्परतो यदि । सद्यः कालः परेद्युः स्याज्ज्ञेयमेवं तिथिक्षये ॥३६॥ सर्वैरेकादशी ग्राह्या दशमीपरिवर्जिता । दशमीसंयुता हंति पुण्यं जन्मत्रयार्जितम् ॥४०॥ एकादशी कलामात्रा द्वादश्यां तु प्रतीयते । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति चेत्सा परा स्मृता ॥४१॥ संपूर्णैकादशी शुद्धा द्वादश्यां च प्रतीयते । त्रयोदशी च रात्र्यंते तत्र वक्ष्यामि निर्णयम् ॥४२॥ पूर्वा गृहस्थैः सा कार्या ह्युत्तरा यतिभिस्तथा । गृहस्थाः सिद्धिरिच्छंति यतो मोक्षं यतीश्वराः ॥४३॥ द्वादश्यां तु कलायां वा यदि लभ्येत पारणा । तदानीं दशमीविद्धाप्युपोष्यैकादशी तिथिः ॥४४॥


काल तक अमावस्या रहे तो क्षयाह श्राद्ध पूर्व अपराह्न में और वृद्धि श्राद्ध दूसरे अपराह्न में करना चाहिए । यदि मध्याह्न के बाद अमावस्या तिथि पड़ती हो तो शास्त्रविज्ञों ने उसको भूतविद्धा कहा है । अत्यन्त क्षय पक्ष में दूसरे दिन की अमावस्या तिथि ही ग्राह्य है अपराह्न वालो नहीं। वहाँ सायंकाल तक रहने वालो सिनीवाली तिथि लेनी चाहिए । उसी प्रकार नवीन क्षय पक्ष में भी सायंकाल तक रहने वाली सिनीवाली तिथि ग्राह्य है ॥२८-३१॥ श्राद्धकर्म में परा सिनीवाली सर्वथा ग्राह्य है, अत्यन्त तिथि की वृद्धि होने पर भूतविद्धा तिथि को छोड़ देना चाहिए । पितृकर्म में अपराह्नस्थ कुहू ग्राह्य है । नवीन वृद्धि में चतुर्दशी से विद्ध सिनीवाली सर्वथा त्याज्य है । पर दिन में पराह्न में आने वाली कुहू श्रेष्ठ पंडितों द्वारा ग्राह्य है । यदि अमावस्या तिथि दो मध्याह्न तक हो तो इच्छानुसार पूर्व या पर दोनों का ग्रहण किया जा सकता है । मुनिवर्य ! अन्वाधान कर्म को अब बता रहा हूँ—संपूर्ण पर्व में प्रतिपदा के दिन यज्ञ करना चाहिए । पर्व के चौथे भाग को प्रतिपदा के आदि के तीन चरण को विद्वानों ने यज्ञ काल कहा है ॥३२-३६॥ अमावस्या और पूर्णिमा यदि दो मध्याह्न तक रहे तो विप्रेन्द्र ! पर दिन हो पुण्य काल माना जाता है । किन्तु दो दिनों में पर दिन तब लिया जाय जब प्रातः स्नान के तीन मुहूर्त्त बाद तक उक्त तिथि रहे । इस प्रकार सभी तिथि क्षयों में पर दिन ग्रहण के सम्बन्ध में समझना चाहिए । दशमी से अविद्ध एकादशी सबके लिए ग्राह्य है, दशमी से युक्त एकादशी तीन जन्म के अर्जित पुण्य को भी नष्ट कर देती है । यदि द्वादशी में कलामात्र भी एकादशी की प्रतीति हो और द्वादशी त्रयोदशी में कलामात्र संयुक्त हो तो वह परा कही गई है ॥३७-४१॥ सम्पूर्णा एकादशी यदि द्वादशी में मिली जान पड़ती हो और रात्रि के अन्त में त्रयोदशी हो तो उसका निर्णय मैं कह रहा हूँ । गृहस्थ पूर्व एकादशी व्रत को करे और यति के लिए उत्तर एकादशी हो ग्राह्य है क्योंकि गृहस्थ इष्ट सिद्धि चाहते और यति लोग मुक्ति । यदि द्वादशी में पारण हो जाय तो दशमीविद्धा एकादशी भी उपवास के

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१८८ नारदीयपुराणम् शुक्ले वा यदि वा कृष्णे भवेदेकादशीद्वयम् । गृहस्थानां तु पूर्वोक्ता यतीनामुत्तरा स्मृता ॥४२॥ द्वादश्यां विद्यते किंचिद्दशमीसंयुता यदि । दिनक्षये द्वितीयैव सर्वेषां परिकीर्तिता ॥४३॥ विद्धाप्येकादशी ग्राह्या परतो द्वादशी न चेत् । अविद्धापि निषिद्धैव परतो द्वादशी यदि ॥४४॥ एकादशी द्वादशी च रात्रिशेषे त्रयोदशी । द्वादशद्वादशीपुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणे ॥४५॥ एकादशी कलामात्रा विद्यते द्वादशीदिने । द्वादशी च त्रयोदश्यां नास्ति वा विद्यतेऽथवा ॥४६॥ विद्धाप्येकादशी तत्र पूर्वा स्याद्गृहिणां तदा । यतिभिश्चोत्तरा ग्राह्या ह्यवीराभिस्तथैव च ॥४७॥ संपूर्णांकादशी शुद्धा द्वादश्यां नास्ति किंचन । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति तत्र कथं भवेत् ॥५१॥ पूर्वा गृहस्थैः कार्यात्र यतिभिश्चोत्तरा तिथिः । उपोष्यैव द्वितीयेति केचिदाहुश्च भक्तितः ॥५२॥ एकादशी यदा विद्धा द्वादश्यां न प्रतीयते । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति तत्रैव चापरे ॥५३॥ उपोष्या द्वादशी शुद्धा सर्वैरेव न संशयः । केचिदाहुश्च पूर्वा तु तन्मतं न समंजसम् ॥५४॥ संक्रांतौ रविवारे च पातग्रहणयोस्तथा । पारणं चोपवासं च न कुर्यात्पुत्रवान्गृही ॥५५॥ अर्कऽह्नि पर्वरात्रौ च चतुर्दश्यष्टमी दिवा । एकादश्यामहोरात्रं भुक्त्वा चांद्राsurface: चांद्रायणं चरेत् ॥५६॥ आदित्यग्रहणे प्राप्ते पूर्वयामत्रये तथा । नाद्याद्रवै यदि भुंजीत सुरापेन समो भवेत् ॥५७॥ अन्वाधानेष्टिमध्ये तु ग्रहणं चंद्रसूर्ययोः । प्रायश्चित्तं मुनिश्रेष्ठ कर्त्तव्यं तत्र याज्ञिकैः ॥५८॥ चंद्रोपरागे जुहुयाद्दशमे सोम इत्यृचा । आप्यायस्व ऋचा चैव सोमपास्त इति द्विज ॥५९॥ सूर्योपरागे जुहुयादुदुत्यं जातवेदसम् । आसत्येनोद्द्वयं चैव त्रयो मंत्रा उदाहृताः ॥६०॥ लिए ग्राह्य है । शुक्ल पक्ष में अथवा कृष्ण पक्ष में यदि दो दिन एकादशी हो तो पूर्व की एकादशी गृहस्थों के लिए और पर यतियों के लिए ग्राह्य मानी गई है ॥४२-४५॥ यदि दशमी से युक्त एकादशी द्वादशी के दिन भी पड़े तो उस दिन सूर्यास्त द्वादशी में होने के कारण वह सम्पूर्ण तिथि द्वादशी ही मानी जाती है ऐसा सभी मानते हैं । विद्धा एकादशी भी ग्राह्य होती है यदि पर काल में द्वादशी न हो और अविद्धा एकादशी भी अग्राह्य है यदि पर काल में द्वादशी हो । यदि एक ही दिन एकादशी द्वादशी दोनों हों और रात्रि के अन्त में त्रयोदशी हो तथा पारण भी त्रयोदशी में ही जाय तो उस दिन व्रत रहने से बाहर द्वादशी का पुण्य मिलता है ॥४६-४८॥ द्वादशी के दिन एकादशी कला मात्र भी हो और द्वादशी त्रयोदशी के दिन हो या न हो, तो विद्धा एकादशी भी गृहस्थों के लिए ग्राह्य है । यतियों और पति-पुत्र-रहित स्त्रियों के लिए पर एकादशी ही ग्राह्य मानी गई है । पूरे दिन तक रहने वाली शुद्ध एकादशी यदि द्वादशी से सर्वथा अविद्ध हो और द्वादशी त्रयोदशी में हो तो वहाँ क्या निर्णय होगा इसको सुनो ॥४९-५१॥ उसमें पूर्व तिथि गृहस्थों के लिए और यतियों के लिए उत्तर तिथि ग्राह्य है । कुछ लोग कहते हैं कि द्वितीय तिथि ही भक्ति पूर्वक उपवास के लिए ग्राह्य है । विद्धा एकादशी यदि द्वादशी में थोड़ी भी न हो और उसी दिन द्वादशी त्रयोदशी में हो तो अपर व्यक्ति कहते हैं कि वह द्वादशी सब के लिए ग्राह्य है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । कुछ लोग पूर्व को ही ग्राह्य मानते हैं परन्तु उनका मत उचित नहीं जान पड़ता ॥५२-५४॥ संक्रान्ति और रविवार के दिन यदि पात और ग्रहण हो तो पुत्रवान् गृहस्थ के लिए उस दिन पारण या उपवास करना उचित नहीं है । रविवार, पर्व की रात्रि, चतुर्दशी और अष्टमी के दिन में, एकादशी को रात्रि और दिन दोनों समय भोजन करने से चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥५५-५६॥ सूर्य ग्रहण लगने पर ग्रहण के पूर्व तीन पहर के भीतर भोजन नहीं करना चाहिए । यदि भोजन करे तो वह मदिरा पान के समान होता है । मुनिश्रेष्ठ ! अन्वाधान, इष्टि, चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय याज्ञिक प्रायश्चित्त अवश्य करें । चन्द्र ग्रहण के समय 'दशमे सोम, इस मन्त्र से या 'आप्यायस्व' अथवा 'सोमपास्त' इस मन्त्र से हवन करना चाहिए । सूर्य ग्रहण में 'उदुत्यं जातवेदसम्,

त्रिंशोऽध्यायः १८६ एवं तिथिं विनिश्चित्य स्मृतिमार्गेण पण्डितः । यः करोति व्रतादीनि तस्य स्यादक्षयं फलम् ॥६१॥ वेदप्रणिहितो धर्मो धर्मे स्तुष्यति केशवः । तस्माद्धर्मपरा यांति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६२॥ धर्मान्ये कर्त्तुमिच्छंति ते वै कृष्णस्वरूपिणः । तस्मातांस्तु भवव्याधिः कदाचिन्नैव बाधते ॥६३॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे तिथ्यादिनिर्णयो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥२६॥ त्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच प्रायश्चित्तविधिं वक्ष्ये शृणु नारद सांप्रतम् । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥१॥ प्रायश्चित्तविहीनैस्तु यत्कर्म क्रियते मुने । तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं राक्षसैः परिसेवितम् ॥२॥ कामक्रोधविहीनैश्र्च धर्मशास्त्रविशारदैः । प्रष्टव्या ब्राह्मणा धर्मं सर्वधर्मफलेच्छुभिः ॥३॥ प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराङ्मुखैः । न निष्पुनंति विप्रेन्द्र सुराभांडमिवापगाः ॥४॥ ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी च गुरुतल्पगः । महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पंचमः ॥५॥ यस्तु संवत्सरं ह्येतैः शयनासनभोजनैः । संवसेत्सह तं विद्यात्पतितं सर्वकर्मसु ॥६॥ अज्ञानाद्ब्राह्मणं हत्वा चीरवासाजटी भवेत् । स्वेनैव हतविप्रस्य कपालमपि धारयेत् ॥७॥ आसत्येनो द्वयम्' इस मन्त्र से हवन करना चाहिए। यही सूर्य के तीन मंत्र बतलाए गए हैं ॥५७-६०॥ इस प्रकार स्मृति के अनुसार तिथियों का निर्णय कर जो पंडित व्रत आदि करता है, उसको अक्षय फल मिलता है। धर्म वेद- विहित है। केशव धर्म से ही प्रसन्न होते हैं। इसलिए धर्मपरायणजन विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं। जो धर्माचरण करना चाहते हैं वे कृष्णस्वरूप हैं। इसलिए उनको सांसारिक व्याधियों से कुछ भी कभी भी पीड़ा नहीं होती ॥६१-६३॥ श्रीनारदीयमहापुराण में तिथिनिर्णयवर्णन नामक उनतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥ अध्याय ३० प्रायश्चित्त विधि का निरूपण सनक बोले— नारद ! अब प्रायश्चित्त विधि बता रहा हूँ। प्रायश्चित्त के द्वारा विशुद्ध आत्मा वाले सब कर्म फलों को प्राप्त करते हैं। मुने ! प्रायश्चित्त के बिना मनुष्य जो कुछ कर्म करता है सब निष्फल जाता है और उसके सब कर्म राक्षसों से घिरे रहते हैं। काम क्रोध से हीन, धर्मशास्त्रज्ञ और सब धर्मों के फल के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वे ब्राह्मणों से ही धर्म की बातें पूछें ॥१-३॥ विप्रेन्द्र ! जिस प्रकार नदियाँ मदिरापात्र को पवित्र करने में सर्वथा असमर्थ हैं, उसी प्रकार नारायण से विमुख रहने वाले व्यक्तियों को उनके किये हुए प्रायश्चित्त भी। ब्रह्मघातक, मदिरा पान करने वाला, चोर, गुरुपत्नीगामी ये चार महापातकी हैं और इनके संसर्ग में रहने वाला व्यक्ति भी पाँचवां महापापी है ॥४-५॥ जो इन महापातकियों के साथ एक वर्ष तक सोता, बैठता और भोजन करता है उसको सब कर्मों से च्युत समझना चाहिए ॥६॥ अज्ञान से किसी ब्राह्मण की हत्या कर देने पर उस हत्यारे को जटा और वल्कलधारी होना चाहिए। यदि जानबूझ कर उसने ब्राह्मणवध किया हो तब तो उसको कपाल भी धारण करना चाहिए। अन्यथा वह

१८० नारदीयपुराणम् तदभावे मुनिश्रेष्ठ कपालं चान्यमेव वा । तद्द्रव्यं ध्वजदण्डे तु धृत्वा वनचरो भवेत् ॥८॥ वन्याहारो वसेत्तत्र वाग्यतो नियताशनः । सन्धवत्स्यामुपासीत त्रिकालं स्नानमाचरेत् ॥६॥ अध्ययनाध्यापनादीन्वजयेत्सस्मरेद्धरिम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं गंधमाल्यादि वर्जयेत् ॥१०॥ तीर्थान्यनुवसेच्चैव पुण्यांश्चत्वाश्रमांस्तथा । यदि वन्येनं जीवेन ग्रामे भिक्षां समाचरेत् ॥११॥ द्वादशाब्दं व्रतं कुर्यादेवं हरिपरायणः । ब्रह्महा शुद्धिमाप्नोति कर्मार्हश्चैव जायते ॥१२॥ व्रतमध्य मृगैर्र्वापि रोगैर्वापि विपद्यितः । गोनिमित्तं द्विजार्थं वा प्राणान्वापि परित्यजेत् ॥१३॥ यद्वा दद्याद्विजेन्द्राणां गवामयुतमुत्तमम् । एतेष्वन्यतमं कृत्वा ब्रह्महा शुद्धिमाप्नुयात् ॥१४॥ दीक्षितं क्षत्रियं हत्वा चरेद्धि ब्रह्महव्रतम् । अग्निप्रवेशने वापि मरुत्प्रपतनं तथा ॥१५॥ दीक्षितं ब्राह्मणं हत्वा द्विगुणं व्रतमाचरेत् । आचार्यादिवधे चैव व्रतमुक्तं चतुर्गुणम् ॥१६॥ हत्वा तु विप्रमात्रं च चरेत्संवत्सरं व्रतम् । एवं विप्रस्य गदितः प्रायश्चित्तविधिद्विज ॥१७॥ द्विगुणं क्षत्रियस्योक्तं त्रिगुणं तु विशः स्मृतम् । ब्राह्मणं हन्ति यः शूद्रस्तं मुशल्यं विदुर्बुधाः ॥१८॥ राज्ञैव शिक्षा कर्तव्या इति शास्त्रेषु निश्चयः । ब्राह्मणीनां वधे त्वद्धं पादः स्यात्कन्यकावधे ॥१९॥ हत्वा त्वनुपनीतांश्च तथा पादव्रतं चरेत् । हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः षडब्दं कृच्छ्रमाचरेत् ॥२०॥ संवत्सरत्रयं वैश्यं शूद्रं हत्वा तु वत्सरम् । दीक्षितस्य स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणीं चाष्टवत्सरान् ॥२१॥ ब्रह्महत्याव्रतं कृत्वा शुद्धो भवति निश्चितम् । प्रायश्चित्तविधानं तु सर्वत्र मुनिसत्तम ॥२२॥ कपाल अथवा अन्य वस्तु को ध्वज दण्ड में बांधकर रख ओर वनवासी हो जाय। और दिन में एक बार थोड़ा सा वन्य-फल मूलों का ही आहार करता हुआ वनवासी जीवन वितावे ॥७-८॥ त्रिकाल स्नान और सन्ध्योपासना करे, अध्ययन, अध्यापन आदि से मुख मोड़कर केवल हरि स्मरण में ही लगा रहे। नित्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे और सुगन्धित पदार्थ या माला का सर्वथा त्याग कर दे। सर्वदा पवित्र तीर्थों और आश्रमों में रहे। यदि वन्य फलों से जीना असम्भव हो तो गांव में भिक्षा मांगकर जीवन वितावे ॥६-११॥ इस प्रकार हरिपरणय होकर बारह वर्ष तक व्रत पालन करने से ब्रह्मघाती शुद्ध ओर कर्मों का अधिकारी हो जाता है। व्रत पालन-काल में यदि किसी वन्य पशु के द्वारा या रोग से मृत्यु हो जाय, गौ अथवा ब्राह्मण-रक्षार्थ प्राण त्याग कर दे अथवा ब्राह्मणों को दश हजार उत्तम गायों का दान कर दे तो वह ब्रह्मघाती शुद्ध हो जाता है। यज्ञदीक्षित क्षत्रिय की हत्या करने पर ब्रह्महत्या के समान ही प्रायश्चित करना चाहिए ॥१२-१४३॥ अग्नि में प्रवेश कर (जलकर) व पहाड़ से गिरकर अथवा प्राणवायु को रोककर प्राणत्याग करना इसके लिए उत्तम प्रायश्चित्त है। दीक्षित ब्राह्म की हत्या करने से दुगुना प्रायश्चित करना चाहिए और आचार्य आदि के वध करने पर चौगुना। द्विज ! विप्र की हत्या करने पर उक्त संवत्सर व्रत करना चाहिए। विप्र के लिए इस प्रकार का प्रायश्चित विहित है। क्षत्रिय लिए दूना, वैश्य के लिए तिगुने प्रायश्चित का विधान है। जो शूद्र ब्राह्मण का वध करता है उसको पंडितों मुशल्य (मुशल से मारकर चूर्ण करने योग्य) माना है ॥१५-१८॥ राजा ही दण्ड (शिक्षा) का निर्णय करे ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। ब्राह्मणीवध में आधा प्रायश्चित (छह वर्ष तक) और कन्यावध में चौथाई (तीन वर्ष तक) प्रायश्चित्त करना चाहिए। अविवाहित की हत्या कर देने पर चौथाई प्रायश्चित्त का ही विधान है ॥१९॥ ब्राह्मण यदि क्षत्रिय की हत्या कर दे तो उसको छह वर्ष तक कृच्छ्र चान्द्रायण करना चाहिए। वैश्य का वध कर तीन वर्ष और शूद्र की हत्या करने पर एक वर्ष का प्रायश्चित्त करना शास्त्रों में विहित है। यज्ञदीक्षित व्यक्ति की ब्राह्मणी पत्नी की हत्या करने पर आठ वर्ष तक ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करने से ही मनुष्य शुद्ध होता है। मुनिसत्तम सर्वत्र मुनियों ने बूढ़ा रोगी और स्त्री के लिए आधा ही प्रायश्चित्त कहा है ॥२०-२२॥

त्रिशोऽध्यायः १६१ वृद्धातुरस्त्रीबालानामर्दमुक्तं मनीषिभिः । गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ॥२३॥ चातुर्वर्ण्यैरपेया स्यात्तथा स्त्रीभिश्च नारद । क्षीरं घृतं वा गोमूत्रमेतेष्वन्यतमं मुने ॥२४॥ स्नात्वाऽऽर्द्रवासा नियतो नारायणमनुस्मरन् । पक्वायसनिभं कृत्वा पिवेच्चैवोदकं ततः ॥२५॥ तत्तु लोहेन पात्रेण ह्यायसेनायवा पिवेत् । ताम्रेण वाथ पात्रेण तत्पीत्वा मरणं व्रजेत् ॥२६॥ सुरापी शुद्धिमाप्नोति नान्या शुद्धिर्विधीयते । अज्ञानादात्मबुद्ध्या तु सुरां पीत्वा द्विजश्चरेत् ॥२७॥ ब्रह्महत्याव्रतं सम्यक्तच्चिह्नपरिवर्जितः । यदि रोगा निवृत्त्यर्थमौषधार्थं सुरा पिवेत् ॥२८॥ तस्योपनयनं भूयस्तथा चान्द्रायणद्वयम् । सुरासंसृष्टपात्रं तु सुराभांडोदकं तथा ॥२९॥ सुरापानसमं प्राहुस्तथा चन्द्रस्य भक्षणम् । तालं च पानसं चैव द्राक्षं खार्जूरसंभवम् ॥३०॥ माधुकं शैलमारिष्टं मैरेयं नालिकेरजम् । गौडो माध्वी सुरा मद्यमेवमेकादश स्मृताः ॥३१॥ एतेष्वन्यतमं विप्रो न पिवेदं कदाचन । एतेष्वन्यतमं यस्तु पिवेदज्ञानतो द्विजः ॥३२॥ तस्योपनयनं भूयस्तप्तकृच्छ्रं चरेत्तथा । समक्षं वा परोक्षं वा बलाच्चौर्येण वा तथा ॥३३॥ परस्वानामापुादानं स्तेयमित्युच्यते बुधैः । सुवर्णस्य प्रमाणं तु मन्वाद्यैः परिभाषितम् ॥३४॥ वक्ष्ये शृणुष्व विप्रेंद्र प्रायश्चित्तौकसाधनम् । गवाक्षान्तमार्तण्डरश्मिमण्डो प्रदृश्यते ॥३५॥ त्रसरेणुप्रमाणं तु रज इत्युच्यते बुधैः । त्रसरेण्वष्टकं निष्कस्तत्त्रयं राजसर्षपः ॥३६॥ गौरसर्षपस्तत्त्रयं स्यात्तत्षट्कं यव उच्यते । यवत्रयं कृष्णलः स्यान्माषस्तत्पंचकं स्मृतः ॥३७॥ माषषोडशमानं स्यात्सुवर्णमिति नारद । हृत्वा ब्रह्मस्वमज्ञानाद्द्वादशाब्दं तु पूर्ववत् ॥३८॥ गौडी, पैष्टी माध्वी ये तीन प्रकार की मदिरायें मानी गई हैं। नारद ! ये सब प्रकार की मदिरायें चारो वर्गों और स्त्रियों के लिए अपेय हैं । मुने ! मदिरा पान करने पर दूध, घी या गोमूत्र इनमें से किसी को जलते हुए लोहे के समान गरम कर, स्नान करने के बाद भीगी धोती पहने हो एकाग्र भाव से हरि का स्मरण करता हुआ पी जावे ऊपर से पानी भी पी ले । उस जलते हुए पदार्थ को लोहे के पात्र या ताँवे के पात्र से पीकर प्राण छोड़ दे ॥२३-२६॥ सुरा पान करने वाला इसी प्रकार शुद्ध होता है और दूसरा शुद्धि का उपाय इसके लिए उपयुक्त नहीं । कोई द्विज यदि अज्ञान वश मदिरा पी ले तो पैरों में बेड़ियाँ लगाकर ब्रह्महत्या के समान प्रायश्चित करे, केवल उसके चिह्न (कपाल आदि) न धारण करे । यदि रोग से छूटने के लिए या ओषधि के रूप में मदिरा पान करना पड़े तो पुनः उसका यज्ञोपवीत हो और दो चान्द्रायण व्रत करे । सुरा से छुये गए पात्र, मदिरा पात्र का जल या आर्द्र भक्षण ये भी सुरा पान के समान ही माने जाते हैं ॥२७-२९३॥ ताल, पानस (कटहल की बनी मदिरा) द्राक्षा, खजूर, मधु और पत्थर से बनी मदिरा, आरिष्ट, मैरेय, नारिकेल से बनी गुड़, मधु से बना हुआ मद्य, ये ग्यारह प्रकार की मदिरायें होती हैं । ब्राह्मण इनमें से किसी प्रकार की मदिरा न पीये ॥३०-३१३॥ कोई द्विज यदि इनमें से किसी को अज्ञान वश पी ले तो पुनः उसका यज्ञोपवीत हो और वह तप्त कृच्छ्र व्रत करे ॥३२३॥ पंडितों ने दूसरे के धन को प्रत्यक्ष या गुप्त रूप से, बलात् या चोरी से ले लेने को ही 'स्तेय' कहा है। मनु आदि स्मृतिकारों ने सुवर्ण के प्रमाण की परिभाषा बताई है । विप्रेन्द्र ! उसी के अनुसार मैं प्रायश्चित्त कह रहा हूँ, सुनो । खिड़की से होकर आने वाली सूर्य की किरणों के बीच जो त्रसरेणु प्रमाण का धूलि कण दिखाई देता है उसको पंडितों ने रज कहा है। आठ त्रसरेणु के बराबर निष्क और तीन निष्क का राजसर्षप होता है ॥३३-३६॥ तीन राजसर्षप का एक गौर सर्षप और छः गौर सर्षप का एक यव होता है । तीन यव का एक कृष्णल और पाँच कृष्णल का एक माष होता है । नारद ! सोलह माष के बराबर सुवर्ण होता है । अज्ञानवश

१६२ नारदीयपुराणम्

कपालध्वजहीनं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् । गुरूणां यज्ञकतूंणां धम्मिष्ठानां तथैव च ॥३८॥ श्रोत्रियाणां द्विजानां तु हृत्वा हेमैवमाचरेत् । कृतानुतापो देहे च संपूर्ण लेपयेद् घृतम् ॥४०॥ करीषच्छादितो दग्धःस्तेयपापाद्विमुच्यते । ब्रह्मस्वं क्षत्रियो हृत्वा पश्चात्तापमवाप्य च ॥४१॥ पुनर्ददाति तत्रैव तद्विधानं शृणुष्व मे । तत्र सांतपनं कृत्वा द्वादशाहोपवासतः ॥४२॥ शुद्धिमाप्नोति देवर्षे ह्यन्यथा पतितो भवेत् । रत्नासनमनुष्यस्त्रीधेनुभूम्यादिकेषु च ॥४३॥ सुवर्णसदृशेष्वे षु प्रायश्चित्तार्द्धमुच्यते । त्रसरेणुसमं हेम हृत्वा कुर्यात्समाहितः ॥४४॥ प्राणायामद्वयं सम्यक् तेन शुद्ध्यति मानवः । प्राणायामत्रयं कुर्याद्धृत्वा निष्कप्रमाणकम् ॥४५॥ प्राणायामांश्च चत्वारो राजसर्षपमात्रके । गौरसर्षपमानं तु हृत्वा हेम विचक्षणः ॥४६॥ स्नात्वा च विधिवज्जप्याद्गायत्र्यष्टसहस्रकम् । यवमात्रसुवर्णस्य स्तेयाच्छुद्धो भवेद्द्विजः ॥४७॥ आसायं प्रातरारभ्य जप्त्वा वै वेदमातरम् । हेमकृष्णलमात्रं तु हृत्वा सांतपनं चरेत् ॥४८॥ माषप्रमाणे हेम्नस्तु प्रायश्चित्तं निगद्यते । गोमूत्रपक्वयवभुग्वर्षेणैकेन शुद्ध्यति ॥४६॥ संपूर्णस्य सुवर्णस्य स्तेयं कृत्वा मुनीश्वर । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥५०॥ सुवर्णमानान्न्यूने तु रजतस्तेयकर्मणि । कुर्यात्सांतपनं सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥५१॥ दशनिष्कांतपर्यन्तमूर्ध्वं निष्कचतुष्टयात् । हृत्वा च रजतं विद्वान्कुर्याच्चांद्रायणं मुने ॥५२॥ दशादिशतनिष्कांतं यः स्तेयी रजतस्य तु । चांद्रायणद्वयं तस्य प्रोक्तं पापविशोधकम् ॥५३॥ शतादूर्ध्वं सहस्रांतं प्रोक्तं चांद्रायणत्रयम् । सहस्रादधिकस्तेये ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥५४॥

ब्राह्मण का धन चुरा लेने पर बारह वर्ष तक पूर्व की भांति ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करना चाहिए, केवल कपाल ध्वज नहीं धारण करना चाहिए ॥३७-३८॥ गुरु, यज्ञकर्त्ता, धर्मिष्ठ, श्रोत्रिय और द्विजों का सुवर्ण चुराने से इस प्रकार प्रायश्चित्त किया जाता है कि पहले अपने पाप पर पश्चात्ताप करे और अपने शरीर पर घी का लेप कर करसी की आग में जल कर मर जाय। इस प्रकार वह चोरी के पाप से छूट जाता है। क्षत्रिय यदि ब्राह्मण के धन को चुरा कर पुनः पश्चात्ताप करे और उसी ब्राह्मण को लौटा दे तब उसको जो प्रायश्चित्त करना पड़ता है उसको मुझसे सुनो ॥३९-४१॥ इस दशा में बारह दिन तक उपवासकर सान्तपन करे तभी वह शुद्ध हो सकता है देवर्षि ! अन्यथा वह पतित कहा जाता है । रत्नासन, मनुष्य, स्त्री, धेनु, और भूमि आदि का चुराना सुवर्णस्तेय के समान ही माना जाता है, परन्तु इसके लिए सुवर्णस्तेय का आधा प्रायश्चित्त कहा गया है। त्रसरेणु के बराबर सोना चुरा लेने पर एकाग्र हो दो प्राणायाम करे तभी वह मनुष्य भली भाँति शुद्ध होता है । निष्क परिमित सोना चुराने पर तीन प्राणायाम करे । राजसर्षप मात्र सोना चुराने पर चार प्राणायाम करे । विज्ञ व्यक्ति गौर सर्षप परिमित सोना चुरा लेने पर विधिवूर्वक स्नान कर आठ हजार गायत्री का जप करे ॥४२-४६॥ यव मात्र सोना चुराने पर द्विज प्रातः काल से लेकर सायङ्काल वेदमाता गायत्री का जप करने पर शुद्ध होता है । कृष्णल (गुंजा) मात्र सोना चुराने पर सान्तपन व्रत करे । माष प्रमाण सुवर्ण की चोरी करने पर प्रायश्चित्त कहा गया है कि वह व्यक्ति एक वर्ष तक गोमूत्र में यव पकाकर खाय तभी वह शुद्ध होता है ॥४७-४६॥ मुनीश्वर ! सम्पूर्ण सुवर्ण के चुराने पर सावधान हो बारह वर्ष तक ब्रह्महत्या व्रत करे । सुवर्णमान से कम चाँदी के चुराने पर विधिवत् सान्तपन व्रत करे अन्यथा वह पतित हो जाता है। मुने ! चार निष्क (१६ माशे का परिमाण) से दश निष्क तक चाँदी की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करे । दश निष्क से लेकर सौ निष्क तक की चाँदी जो चुराता है उसके पापों का संशोधन दो चान्द्रायण व्रत करने से ही होता है ॥५०-५२॥ सौ निष्क से अधिक हजार निष्क तक चुराने पर तीन बार चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। हजार निष्क से अधिक चुराने पर ब्रह्महत्या व्रत करना पड़ता है । कोईम्,