बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८६ नारदीयपुराणम् सैव ग्राह्या मुनिश्रेष्ठ नक्षत्रविहितव्रते । यद्यर्द्धरात्रयोर्व्याप्तं नक्षत्रं तु दिनद्वये ॥१२॥ तत्पुण्यं तिथिसंयुक्तं नक्षत्रं ग्राह्यमुच्यते । अर्द्धरात्रद्वये स्यातां नक्षत्रं च तिथिर्यदि ॥१३॥ क्षये पूर्वा प्रशस्ता स्याद्वृद्धौ कार्या तथोत्तरा । अर्द्धरात्रद्वये व्याप्ता तिथिनक्षत्रसंयुता ॥१४॥ ह्रासवृद्धिविशून्या चेद् ग्राह्या पूर्वा तथा परा । ज्येष्ठासंमिश्रितंमूलं रोहिणी वह्निसंयुता ॥१५॥ मित्रेण संयुता ज्येष्ठा संतानादिविनाशिनी । ततः स्युस्तिथयः पुण्याः कर्मानुष्ठानतो दिवा ॥१६॥ रात्रिव्रतेषु सर्वेषु रात्रियोगो विशिष्यते । तिथिनक्षत्रयोगेन या पुण्या परिकीर्तिता ॥१७॥ तस्यां तु तद्व्रतं कार्यं सैव कार्या विचक्षणैः । उदयव्यापिनी ग्राह्या श्रवणद्वादशी व्रते ॥१८॥ सूर्येन्दुग्रहणे यावत्तावद् ग्राह्या जपादिषु । संक्रांतिषु तु सर्वासु पुण्यकालो निगद्यते ॥१९॥ स्नानदानजपादीनां कुर्वतामक्षयंफलम् । तत्र कर्कटको ज्ञेयो दक्षिणायनसंक्रमः ॥२०॥ पर्वतो घटिकास्त्रिंशत्पुण्यकालं विदुबुर्धाः । वृषभे वृश्चिके चैव सिंहे कुम्भे तथैव च ॥२१॥ पूर्वमष्टमुहूर्तास्तु ग्राह्याः स्नानजपादिषु । तुलायां चैव मेषे च पूर्वतः परतस्तथा ॥२२॥ ज्ञेया दशैव घटिका दस्तास्याक्षयतावहाः । कन्यायां मिधुने चैव मीने धनुषि च द्विज ॥२३॥ घटिकाः षोडश ज्ञेया परतः पुण्यदायिकाः । माकरं संक्रमं प्राहुरुत्तरायणसंज्ञकम् ॥२४॥ परास्त्रिंशच्च घटिकाश्चत्वारिंशच्च पूर्ववत् । आदित्यशीतकिरणौ ग्राह्यावस्तंगतौ यदि ॥२५॥ स्नात्वा भुंजीत विप्रेन्द्र परेद्युः शुद्धमंडलम् । दृष्टचंद्रा सिनीवाली नष्टचंद्रा कुहूः स्मृता ॥२६॥ अमावश्या द्विधा प्रोक्ता विद्वद्भिर्धर्मलिप्सुभिः । सिनीवाली द्विजैर्ग्राह्या साग्निकैः श्राद्धकर्मणि ॥२७॥
नक्षत्र रहे तो वही तिथिसंयुक्त नक्षत्र पुण्यप्रद और ग्राह्य है। यदि दो आधी रात तक नक्षत्र और तिथि दोनों रहें तो (तिथि के) क्षय में पूर्वा तिथि प्रशस्त है और वृद्धि में उत्तरा तिथि। यदि कोई तिथि (एक) नक्षत्र से युक्त रहकर दो अर्धरात्रि तक चले और उसमें क्षय तथा वृद्धि न हो तो पूर्वा और परा दोनों तिथियाँ ग्राह्य हैं। ज्येष्ठा से युक्तमूल, वह्नि से युक्त रोहिणी और मैत्र नक्षत्र से युक्त ज्येष्ठा नक्षत्र में होने वाले कर्म संतान आदि के नाश हैं। इसके अतिरिक्त सारी तिथियाँ पुण्य तिथि हैं यदि कर्मानुष्ठान दिन को विहित हो ॥११-१६॥ सब रात्रिव्रतों में रात्रियोग ही विशिष्ट माना गया है। तिथि और नक्षत्र के योग से जो तिथि पुण्य तिथि मानी गई है उसीमें बुद्धिमान् व्यक्ति को वह व्रत करना चाहिए। व्रत में उदय व्यापिनी श्रवण द्वादशी ग्राह्य है। जप आदि कर्मों के लिए जब तक सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण रहे तब तक का काल ग्राह्य है। सब संक्रान्तियों में पुण्य काल माना जाता है ॥१७-१६॥ उस समय स्नान, दान और जप करने से अक्षय फल मिलता है। संक्रान्ति को दक्षिणायन काल समझा जाता है। बुधजन उसके पूर्व की तीस घड़ी को पुण्यकाल मानते हैं। वृष, वृश्चिक, सिंह और कुम्भ की संक्रान्ति के पूर्व के आठ मुहूर्त्त स्नान और जप के लिए ग्राह्य हैं। तुला और मेष संक्रान्ति के पूर्व और पर काल दोनों ग्राह्य हैं। द्विज ! कन्या, मिथुन, मीन और धन संक्रान्ति के पूर्व की दश ही घड़ियां ग्राह्य हैं ॥२०-२३॥ मकर संक्रान्ति को उत्तरायण काल कहते हैं उसका सोलह घड़ी का पर काल ही पुण्य काल माना जाता है। सूर्य और चन्द्रमा यदि ग्रहणावस्था में ही अस्त हो जाँय तो सूर्य के अस्त होने के बाद की तीस घड़ियाँ और चन्द्रमा के अस्त होने के पूर्व की चालीस घड़ियां पुण्यकाल मानी गई हैं ॥२४-२५॥ विप्रेन्द्र ! दूसरे दिन अपने अपने गृह-मण्डल को पवित्र कर स्नान के बाद भोजन करना चाहिए। जिस अमावस्या को चन्द्रमा दीख पड़ता है, उसको सिनीवाली और जिस दिन नहीं दिखाई पड़ता उसको कुहू कहते हैं। इस प्रकार धर्मप्रेमी विद्वानों ने दो प्रकार की अमावस्या बतलाई है। श्राद्ध कर्म में अग्निहोत्री द्विजों के लिए सिनीवाली ग्राह्य मानी गई है ॥२६-२७॥ स्त्री, शूद्र और अग्नि स्थापन न करने वाले द्विजों के लिए कुहू ही ग्राह्य है। यदि दो अपराह्न