बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनत्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच तिथीनां निर्णयं वक्ष्ये प्रायश्चित्तविधिं तथा । शृणुष्व तन्मुनिश्रेष्ठ कर्मसिद्धिर्यतो भवेत् ॥१॥ श्रौतं स्मार्तं व्रतं दानं यच्चान्यत्कर्म वैदिकम् । अनिर्णीतासु तिथिषु न किंचित्फलति द्विज ॥२॥ एकादश्यष्टमी षष्ठी पौर्णमासी चतुर्दशी । अमावस्या तृतीया च ह्युपवासव्रतादिषु ॥३॥ परविद्धाः प्रशस्ताः स्युर्न ग्राह्याः पूर्वसंयुताः । नागविद्धा तु या षष्ठी शिवविद्धा तु सप्तमी ॥४॥ दशम्येकादशीविद्धा नोपोष्याः स्युः कदाचन । दर्शं च पौर्णमासीं च सप्तमीं पितृवासरम् ॥५॥ पूर्वविद्धं प्रकुर्वाणो नरकायोपपद्यते । कृष्णपक्षे पूर्वविद्धां सप्तमीं च चतुर्दशीम् ॥६॥ प्रशस्तां केचिदाहुश्च तृतीयां नवमीं तथा । व्रतादीनां तु सर्वेषां शुक्लपक्षो विशिष्यते ॥७॥ अपराह्नाच्च पूर्वाह्नि ग्राह्यं श्रेष्ठतरं यतः । असंभवे व्रतादीनां यदि पौर्वाह्निकी तिथिः ॥८॥ मुहूर्तद्वितयं ग्राह्यं भगवत्युदिते रवौ । प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या तिथिनक्तव्रते सदा ॥९॥ उपोषितव्यं नक्षत्रं येनास्तं याति भास्करः । तिथिनक्षत्रसंयोगविहितव्रतकर्मणि ॥१०॥ प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या त्वन्यथा निष्फलं भवेत् । अर्धरात्रादधो या तु नक्षत्रव्यापिनी तिथिः ॥११॥ अध्याय २९ तिथियों का निर्णय **सनक बोले—**तिथियों का निर्णय और प्रायश्चित्त विधि को अब कह रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ ! उसको सुनो, जिससे कर्मसिद्धि प्राप्त होती है। द्विज ! श्रौत तथा स्मार्तव्रत, दान अथवा जो अन्य वैदिक कर्म हैं, उन्हें अनिर्णीत तिथियों में करने से कुछ भी फल नहीं होता है। एकादशी, अष्टमी, षष्ठी, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अमावस्या और तृतीया यदि पर तिथि से (आगे की तिथि से) विद्ध हो तो उपवास, व्रत आदि में प्रशस्त मानी जाती हैं; परन्तु पूर्वविद्ध ये तिथियां ग्राह्य नहीं हैं ॥१-३॥ नाग से विद्ध षष्ठी, शिव विद्ध सप्तमी, दशमी विद्ध एकादशी को कभी भी उपवास नहीं करना चाहिए । दर्श (अमावस्या), पूर्णिमा, सप्तमी और पितृदिवस ये यदि पूर्वतिथियों से विद्ध हों तो उस दिन उपवास या व्रत करने से मनुष्य नरकगामी होता है। कुछ लोग कृष्णपक्ष की पूर्वविद्ध सप्तमी, चतुर्दशी, तृतीया और नवमी को प्रशस्त मानते हैं। सब व्रत आदि शुभ कर्मों के लिए शुक्लपक्ष प्रशस्त माना जाता है ॥४-७॥ अपराह्न तिथि की अपेक्षा पूर्वाह्न की तिथि ग्राह्य है, क्योंकि वह श्रेष्ठ है। व्रतादि को पौर्वाह्निकालिक तिथि यदि असम्भव हो तो सूर्योदयकाल की दो मुहूर्त की तिथि भी व्रत के लिए ग्राह्य है। रात्रिकालीन व्रत में प्रदोषव्यापिनी तिथि ही ग्राह्य है। जिस व्रत में तिथि और नक्षत्र दोनों का संयोग विहित है उसमें जिस नक्षत्र में सूर्यास्त हो उसी नक्षत्र को मानकर उपवास करना चाहिए। प्रदोषव्यापिनी तिथि ही रात्रिकालीन व्रत के लिए ग्राह्य है, अन्यथा वह निष्फल है ॥८-१०॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो नक्षत्रव्यापिनी तिथि आधी रात के बाद तक रहती है वही नक्षत्रविहित व्रत के लिए ग्राह्य है। यदि दोनों दिन की आधी रात तक वह इष्ट २४—ना० पु०