भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

१६४ नारदीयपुराणम् अत्यंतहव्यशून्यश्चेत्स्वशक्त्या तु तृणं गवाम् । स्नात्वा च विधिवद्विप्र कुर्याद्वा तिलतर्पणम् ॥७६॥ अथवा रोदनं कुर्यादित्युच्चैर्विजने वने । दरिद्रोऽहं महापापी वदन्निति विचक्षणः ॥८०॥ परेद्युः श्राद्धकृन्मर्त्यो यो न तर्पयते पितॄन् । तत्कुलं नाशमायाति ब्रह्महत्यां च विंदति ॥८१॥ श्राद्धं कुर्वंति ये मर्त्याः श्रद्धावंतो मुनीश्वर । न तेषां संततिच्छेदः संपन्नास्ते भवंति च ॥८२॥ पितॄन्यजंति ये श्राद्धे तैस्तु विष्णुः प्रपूजितः । तस्मिंस्तुष्टे जगन्नाथे सर्वास्तुष्यंति देवताः ॥८३॥ पितरो देवताश्चैव गंधर्वाप्सरसस्तथा । यक्षाश्च सिद्धा मनुजा हरिरैव सनातनः ॥८४॥ येनेदमखिलं जातं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माद्दाता च भोक्ता च सर्वं विष्णुः सनातनः ॥८५॥ यदस्ति विप्र यन्नास्ति दृश्यं चादृश्यमेव च । सर्वं विष्णुमयं ज्ञेयं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥८६॥ आधारभूतो विश्वस्य सर्वभूतात्मकोऽव्ययः । अनौपम्यस्वभावश्च भगवान्हव्यकव्यभुक् ॥८७॥ परब्रह्माभिधेयो य एक एव जनार्दनः । कर्त्ता कारयिता चैव सर्वं विष्णुः सनातनः ॥८८॥ इत्येवं ते मुनिश्रेष्ठ श्राद्धस्य विधिरुत्तमः । कथितः कुर्वतामेवं पापं सद्यो विलीयते ॥८६॥ य इदं पठते भक्त्या श्राद्धकाले द्विजोत्तमः । पितरस्तस्य तुष्यंति संततिश्चैव वर्द्धते ॥६०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे श्राद्धक्रियावर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥ पर स्वयं केवल अन्न पकावे और वह विचक्षण व्यक्ति पैतृक सूक्त से हवन करे । यदि किसी भी प्रकार हवन करने में असमर्थ हो तो अपनी शक्ति के अनुसार गायों को घास खिला दे अथवा विप्र स्नान करके विधिपूर्वक तिल से तर्पण कर दे ॥७६-७९॥ अथवा किसी विजन वन में जाकर वह बुद्धिमान् व्यक्ति 'मैं महापापी हूँ दरिद्र हूँ' यह कहता हुआ उच्च स्वर से रोये । जो श्राद्धकर्त्ता दूसरे दिन पुनः पितरों का तर्पण नहीं करता है उसका कुल नष्ट हो जाता और वह ब्रह्महत्या का भागी होता है। मुनीश्वर ! जो श्रद्धालु व्यक्ति श्राद्ध करते हैं उनका वंशच्छेद कभी नहीं होता और वे सदा धनवान् रहते हैं। जो श्राद्ध में पितरों की पूजा करते हैं वे स्वयं विष्णु की पूजा करते हैं और विष्णु के प्रसन्न रहने पर सभी देवता स्वयं प्रसन्न हो जाते हैं ॥८०-८३॥ पितर, देवता, गन्धर्व, अप्सरायें, यक्ष, सिद्ध और सभी मनुष्य, ये सनातन हरि के ही रूप हैं। जिससे यह सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् उत्पन्न हुआ है, अतएव दाता या भोक्ता सब कुछ वही सनातन विष्णु ही हैं। विप्र ! इस संसार में जो कुछ भाव या अभाव दृश्य या अदृश्य पदार्थ है, सबको विष्णुमय ही समझना चाहिए । इसलिए विष्णु के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस विश्व के आधारभूत वे ही सर्वभूतात्मक, अव्यय, अनुपम प्रकृति वाले, हव्यकव्यभोजी भगवान् विष्णु हैं ॥८४-८७॥ परब्रह्म कहाने वाले जो जनार्दन हैं वे एक ही हैं। कर्त्ता और कारयिता सब कुछ वही सनातन विष्णु हैं। मुनिश्रेष्ठ ! यही श्राद्ध की उत्तम विधि है जो तुम्हारे सामने मैंने व्यक्त कर दी। जो इस विधि से श्राद्ध करते हैं उनके पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। जो द्विजश्रेष्ठ श्राद्ध के समय भक्तिपूर्वक इस (अध्याय) का पाठ करता है उसके पितर प्रसन्न होते हैं और उसकी सन्तान-वृद्धि होती है ॥८८-६०॥ श्रीनारदीयमहापुराण में श्राद्धवर्णन नामक अट्ठाईसवां अध्याय समाप्त ॥२८॥