बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete text extracted from the image:
अष्टाविंशोऽध्यायः हसते वदते कोऽपि राक्षसे तद्भवेद्विः । यथाचारं प्रदेयं च मधुमांसादिकं तथा ॥६२॥ पाकादि च प्रशंसेरन् वाग्यता धृतभाजनाः । यदि पात्रं त्यजेत्कोऽपि ब्राह्मणः श्राद्धयोजितः ॥६३॥ श्राद्धहंता स विज्ञेयो नरकायोपपद्यते । भुंजानेषु च विप्रेषु ह्यान्योन्यं संस्पृशेयदि ॥६४॥ तदन्नमत्स्यजम्भुक्त्वा गायत्र्यष्टशतं जपेत् । भुज्यमानेषु विप्रेषु कर्त्ता श्रद्धापरायणः ॥६५॥ स्मरेन्नारायणं देवमनंतमपराजितम् । रक्षोघ्नान्वैष्णवांश्चैव पैतृकांश्च विशेषतः ॥६६॥ जपेच्च पौरुषं सूक्तं नाचिकेतत्रयं तथा । त्रिमधु त्रिसपर्णं च पावमानं यजूंषि च ॥६७॥ सामान्याप तथोक्तानि वदेत्पुण्यप्रदांस्तथा । इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि चैव हि ॥६८॥ भुंजीरन्ब्राह्मणा यावत्तावेताञ्जपेद्विज्ज । ब्राह्मणेपु च भुक्तेषु विकिरं विक्षिपेत्तथा ॥६६॥ शेषमन्नं वदेच्चैव मधुसूक्तं च वै जपेत् । स्वयं च पादौ प्रक्षाल्य सम्यगाचम्य नारद ॥७०॥ आचांतेषु च विप्रेषु पिंडं निर्वापयेत्ततः । स्वस्तिवाचनकं कुर्यादक्षय्योदकमेव व ॥७१॥ दत्त्वा समाहितः कुर्यात्तथा विप्राभिवादनम् । अचालयित्वा पात्रं तु स्वस्ति कुर्वंति ये द्विजाः ॥७२॥ वत्सरं पितरस्तेषां भवंत्युच्छिष्टभोजिनः । दातारो नोऽभिवर्द्धन्तामित्याद्यैः स्मृतिभाषितैः ॥७३॥ आशीर्वचो लभेत्तेभ्यो नमस्कारं चरेत्ततः । दद्याच्च दक्षिणां शक्त्या तांबूलं गंधसंयुतम् ॥७४॥ न्युब्जपात्रमथानीय स्वधाकारमुदीरयेत् । वाजेवाजे इति ऋचा पितॄन्देवान्विसर्जयेत् ॥७५॥ भोक्ता च श्राद्धकृत्तस्यां राजन्यां मैथुनं त्यजेत् । तथा स्वाध्यायमध्वानं प्रयत्नेन परित्यजेत् ॥७६॥ अध्वगश्चातुरश्चैव विहीनश्च धनैस्तथा । आमश्राद्धं प्रकुर्वीत हेम्ना वास्पृश्यभार्यकः ॥७७॥ द्रव्याभावे द्विजाभावे ह्यन्नमात्रं च पाचयेत् । पैतृकेन तु सूक्तेन होमं कुर्याद्विचक्षणः ॥७८॥
राक्षस हो जाता है। उस समय उन विप्रों को आचारानुसार मधु, मांस आदि भी दिया जा सकता है ॥६०-६२॥ वे विप्र उन भोजन-पात्रों को हाथ में लेकर पाक आदि की प्रशंसा करते हुये, मौन होकर भोजन करें। यदि श्राद्ध-निमन्त्रित कोई ब्राह्मण उस पात्र को भोजन के समय छोड़ दे तो वह नरकगामी होता है। भोजन करते समय यदि वे ब्राह्मण एक दूसरे को छू दें तो उस अन्न को खा लेने के बाद एक सौ आठ बार गायत्री का जप करे ॥६३-६४३॥ उन विप्रों के भोजन करते समय श्राद्धकर्त्ता श्रद्धापूर्वक अपराजित अनन्त नारायणदेव का स्मरण करे, विशेष रूप से राक्षसीय बाधाओं को दूर करने वाले वैष्णव और पितर सम्बन्धी मन्त्रों को जपे। पुरुष सूक्त, नाचिकेतत्रय, त्रिमधु, त्रिसुपर्ण, पावमान और यजुर्मन्त्रों का अथवा साममन्त्रों और पुण्यप्रद मन्त्रों का पाठ करे। द्विज ! जब तक ब्राह्मण भोजन करते रहें तब तक इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और पूर्व कथित मन्त्रों का जप करना चाहिए। ब्राह्मण जब भोजन कर चुकें तब शेष अन्न का विकिर दे (अर्थात् शेषात्न को बिखेर दे) और मधुसूक्त का जप करे। नारद ! स्वयं पैर धोकर और आचमन कर जब वे ब्राह्मण भी आचमन कर लें तब पिंड निर्वण करे ॥६५-७०३॥ स्वस्तिपाठ और अक्षय्योदक करने के अनन्तर सावधान हो विप्रों का अभिवादन करे। जो द्विज पात्र को बिना हिलाये स्वस्ति, ऐसा कहते हैं उनके पितर एक वर्ष तक जूठा भोजन करते हैं। श्राद्ध कर्त्ता उन ब्राह्मणों से 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम्' (हमारे दाता सदा विभवशाली रहें) आदि स्मृति में कहे गए आशीर्वाद प्राप्त करे और उनको नमस्कार करे। आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद यथाशक्ति उन ब्राह्मणों की ताम्बूल और सुगन्धित पदार्थ के सहित दक्षिणा दे। न्युब्जपात्र को लाकर स्वधाकार कहे और 'वाजे बाजे' इस ऋचा से पितरों और देवों का विसर्जन करे ॥७१-७५॥ श्राद्ध भोजन करने वाला और श्राद्धकर्त्ता उस रात्रि को मैथुन न करें, स्वाध्याय और मार्ग का चलना विशेष रूप से छोड़ दें। रास्ता चलने वाला, रोगी और धनहीन श्राद्धकर्त्ता आम श्राद्ध (कच्चे अन्न से किया जाने बाला श्राद्ध) करे अथवा भार्या सहित सोने का स्पर्श करे। द्रव्य के अभाव में अथवा किसी ब्राह्मण के न मिलने