भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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१८२ नारदीयपुराणम् करवै करवाणीति चापृष्टा ब्राह्मणा मुने । कुरुष्व क्रियतां वेति कुर्विति ब्रूयुरेव च ॥४७॥ उपासनाग्निमाधाय स्वागृह्योक्तविधानतः । सोमाय च पितृमते स्वधा नम इतीरयेत् ॥४८॥ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नम इतीह वा । स्वाहान्तेनापि वा प्राज्ञो जुहुयात्पितृयज्ञवत् ॥४९॥ आभ्यामेवाहुतिभ्यां तु पितॄणां तृप्तिरक्षया । अग््न्यभावे तु विप्रस्य पाणौ होमो विधीयते ॥५०॥ यथाचारं प्रकुर्वीत पाणावग्नौ च वा द्विज । नह्यग्निद्दूरगः कार्यः पार्वणे समुपस्थिते ॥५१॥ संधायाग्निं ततः कार्यं कृत्वा तं विसृजेत्कृती । यद्यग्निद्दूरगो विप्र पार्वणे समुपस्थिते ॥५२॥ भ्रातृभिः कारयेच्छ्राद्धं साग्निकैर्विधिवाद्धिजैः । क्षयाहे चैव संप्राप्ते स्वस्याग्निद्दूरगो यदि ॥५३॥ तथैव भ्रातरस्तत्र लौकिकाग्नावपि स्थिताः । उपासनाग्नौ दूरस्थे समीपे भ्रातरि स्थिते ॥५४॥ यद्यग्नौ जुहुयाद्वापि पाणौ वा स हि पातकी । उपासनाग्नौ दूरस्थे केचिदिच्छन्ति वै द्विजाः ॥५५॥ तच्छेषं विप्रपात्रेषु विकिरेत्संस्मरन्हरिम् । भक्ष्यैर्भोज्यैश्च लेह्यैश्च स्वाद्यैर्विप्रान्प्रपूजयेत् ॥५६॥ अन्नत्यागं ततः कुर्यादुभयत्र समाहितः । आगच्छंतु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः ॥५७॥ ये यत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवंतु ते । इति संप्राथर्येद्देवान्ये देवास ऋचा नु वै ॥५८॥ तथा संप्राथर्येद्विप्रान्ये च हेति ऋचा पितॄन् । अमृतानां मृतानां च पितॄणां दीप्ततेजसाम् ॥५९॥ नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां योगचक्षुषाम् । एवं पितॄन्नमस्कृत्य नारायणपरायणः ॥६०॥ दत्तं हविश्च तत्कर्म विष्णवे विनिवेदयेत् । ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे भुञ्जीरन्वाग्यता द्विजाः ॥६१॥ पूर्व की भाँति अर्घ्य दे । मुनिश्रेष्ठ ! गन्ध, पुष्प, धूप, वस्त्र, आभूषण आदि से अपने विभव के अनुसार उन आबाहित पितरों की सविधि पूजा करे । तत्पश्चात् वह विचक्षण घी मिला अन्नाग्र लेकर 'अग्नौ करिष्ये' (अग्नि में हवन करना चाहता हूँ) यह कहकर उनसे आज्ञा प्राप्त करे । मुने ! 'करवै या करवाणि' (क्या मैं करूँ) यह कहकर ब्राह्मण से पूछे । कुरुष्व क्रियताम् अथवा कुरु (करो) ऐसा वे ब्राह्मण कहें ॥४४-४७॥ अपने गृह्य सूत्र के विधान से उपासना-अग्नि का आधान कर 'सोमाय नमः' और 'पितृमते स्वधा' ऐसा कहे । 'अग्नये नमः' 'कव्यवाहनाय स्वधा' ऐसा कहकर अथवा स्वाहान्त मन्त्र से (अग्नये स्वाहा, कव्यवाहनाय स्वाहा) पितृयज्ञ के समान हवन करे । इन्हीं दो आहुतियों को पितरों की तृप्ति के लिए अग्नि में हवन करे । अग्नि के अभाव में विप्र के हाथ में भी हवन करने की विधि है ॥४८-५०॥ द्विज ! आचार के अनुसार अग्नि अथवा ब्राह्मण के हाथ में हवन करना चाहिए । पार्वण श्राद्ध के समय अग्नि दूर नहीं रहनी चाहिए । कृती अग्नि-स्थापन के अनन्तर हवन कर उसका विसर्जन कर दे । विप्र ! पार्वण श्राद्ध के दिन यदि अग्नि दूर रहे तो अग्निहोत्री ब्राह्मणों और भाइयों से विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए । क्षयाह के आ जाने पर यदि उपासनाग्नि दूर हो और उसी प्रकार भाई भी दूर रहें तो लौकिक अग्नि में भी हवन कर ले । यदि उपासनाग्नि दूर हो और भाई समीप हो तो जो व्यक्ति अग्नि में या ब्राह्मण के हाथ में हवन करे वह पातकी है। कोई द्विज उपासनाग्नि को दूर रखना ही पसन्द करते हैं ॥५१-५५॥ शेष अन्न को हरि का स्मरण करते हुए विप्रपात्रों में छोड़ देना चाहिए । भक्ष्य, भोज्य और लेह्य आदि स्वादिष्ट पदार्थों से विप्रों की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर दोनों पात्रों में अन्न छोड़े और 'महाभाग महाबल विश्वेदेव आयें । श्राद्ध में जो जिस स्थान के अधिकारी माने गये हैं वे अपने स्थान पर श्राद्धकर्म को सुचारू रूप से सम्पन्न करने के लिए सावधान हो जायं, इस मन्त्रवाक्य से प्रार्थना कर 'ये देवास-इस ऋचा से देवों की प्रार्थना करे । 'ये च हेति' इस मन्त्र से विप्रों की और 'अमूर्तं, मूर्त और दीप्त तेज वाले, और योगचक्षु ध्यान परायण पितरों को नमस्कार करता हूँ ॥५६-५९॥ इस वाक्य से पितरों को नमस्कार कर स्वयं नारायण का स्मरण करते हुए दी हुई आहुति को और उस श्राद्ध कर्म को विष्णु के निमित्त अर्पण कर दे । इसके पश्चात् वे निमन्त्रित ब्राह्मण वाणी को संयत कर उस श्राद्धान्न को खायें । यदि भोजन के समय कोई हँसे या बातचीत करे तो वह हविष्यान्न