भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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पृष्ठ 206

१८७ एकोनत्रिंशोऽध्यायः कुहूः स्त्रीभिस्तथा शूद्रैरपि वानग्निकैस्तथा । अपराह्नद्वयव्यापिन्यमावास्या तिथैर्यदि ॥२८॥ क्षये पूर्वा तु कर्त्तव्या वृद्धौ कार्या तथोत्तरा । अमावास्या प्रतीता चेन्मध्याह्नात्परतो यदि ॥२६॥ भूतविद्धेति विख्याता सद्भिः शास्त्रविशारदैः । अत्यन्तक्षयपक्षे तु परेद्युरपराह्नगा ॥३०॥ तत्र ग्राह्या सिनीवाली सायाह्नव्यापिनी तिथिः । अर्वाचीनक्षये चैव सायाह्नव्यापिनी तथा ॥३१॥ सिनीवाली परा ग्राह्या सर्वथा श्राद्धकर्मणि । अत्यन्ततिथिवृद्धौ तु भूतविद्धां परित्यजेत् ॥३२॥ ग्राह्या स्यादपराह्नस्था कुहूः पैतृककर्मणि । यथार्वाचीनवृद्धौ तु संत्याज्या भूतसंयुता ॥३३॥ परेद्युर्विबुधश्रेष्ठैः कुहूर्ग्राह्या पराह्नगा । मध्याह्नद्वितये व्याप्ता ह्यमावस्या तिथैर्यदि ॥३४॥ तत्रेच्छया च संग्राद्या पूर्वा वाथ पराथवा । अन्वाधानं प्रवक्ष्यामि सन्तः संपूर्णपर्वणि ॥३५॥ प्रतिपद्दिवसे कुर्याद्यागं च मुनिसत्तम । पर्वणो यश्चतुर्थांश आद्यः प्रतिपदस्त्रयः ॥३६॥ यागकालः स विज्ञेयः प्रातरुक्तो मनीषिभिः । मध्याह्नद्वितये स्याताममावस्या च पूर्णिमा ॥३७॥ परेद्युरेव विप्रेन्द्र सद्यः कालो विधीयते ॥३८॥ पूर्वद्वये परेद्युः स्यात्संगवात्परतो यदि । सद्यः कालः परेद्युः स्याज्ज्ञेयमेवं तिथिक्षये ॥३६॥ सर्वैरेकादशी ग्राह्या दशमीपरिवर्जिता । दशमीसंयुता हंति पुण्यं जन्मत्रयार्जितम् ॥४०॥ एकादशी कलामात्रा द्वादश्यां तु प्रतीयते । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति चेत्सा परा स्मृता ॥४१॥ संपूर्णैकादशी शुद्धा द्वादश्यां च प्रतीयते । त्रयोदशी च रात्र्यंते तत्र वक्ष्यामि निर्णयम् ॥४२॥ पूर्वा गृहस्थैः सा कार्या ह्युत्तरा यतिभिस्तथा । गृहस्थाः सिद्धिरिच्छंति यतो मोक्षं यतीश्वराः ॥४३॥ द्वादश्यां तु कलायां वा यदि लभ्येत पारणा । तदानीं दशमीविद्धाप्युपोष्यैकादशी तिथिः ॥४४॥


काल तक अमावस्या रहे तो क्षयाह श्राद्ध पूर्व अपराह्न में और वृद्धि श्राद्ध दूसरे अपराह्न में करना चाहिए । यदि मध्याह्न के बाद अमावस्या तिथि पड़ती हो तो शास्त्रविज्ञों ने उसको भूतविद्धा कहा है । अत्यन्त क्षय पक्ष में दूसरे दिन की अमावस्या तिथि ही ग्राह्य है अपराह्न वालो नहीं। वहाँ सायंकाल तक रहने वालो सिनीवाली तिथि लेनी चाहिए । उसी प्रकार नवीन क्षय पक्ष में भी सायंकाल तक रहने वाली सिनीवाली तिथि ग्राह्य है ॥२८-३१॥ श्राद्धकर्म में परा सिनीवाली सर्वथा ग्राह्य है, अत्यन्त तिथि की वृद्धि होने पर भूतविद्धा तिथि को छोड़ देना चाहिए । पितृकर्म में अपराह्नस्थ कुहू ग्राह्य है । नवीन वृद्धि में चतुर्दशी से विद्ध सिनीवाली सर्वथा त्याज्य है । पर दिन में पराह्न में आने वाली कुहू श्रेष्ठ पंडितों द्वारा ग्राह्य है । यदि अमावस्या तिथि दो मध्याह्न तक हो तो इच्छानुसार पूर्व या पर दोनों का ग्रहण किया जा सकता है । मुनिवर्य ! अन्वाधान कर्म को अब बता रहा हूँ—संपूर्ण पर्व में प्रतिपदा के दिन यज्ञ करना चाहिए । पर्व के चौथे भाग को प्रतिपदा के आदि के तीन चरण को विद्वानों ने यज्ञ काल कहा है ॥३२-३६॥ अमावस्या और पूर्णिमा यदि दो मध्याह्न तक रहे तो विप्रेन्द्र ! पर दिन हो पुण्य काल माना जाता है । किन्तु दो दिनों में पर दिन तब लिया जाय जब प्रातः स्नान के तीन मुहूर्त्त बाद तक उक्त तिथि रहे । इस प्रकार सभी तिथि क्षयों में पर दिन ग्रहण के सम्बन्ध में समझना चाहिए । दशमी से अविद्ध एकादशी सबके लिए ग्राह्य है, दशमी से युक्त एकादशी तीन जन्म के अर्जित पुण्य को भी नष्ट कर देती है । यदि द्वादशी में कलामात्र भी एकादशी की प्रतीति हो और द्वादशी त्रयोदशी में कलामात्र संयुक्त हो तो वह परा कही गई है ॥३७-४१॥ सम्पूर्णा एकादशी यदि द्वादशी में मिली जान पड़ती हो और रात्रि के अन्त में त्रयोदशी हो तो उसका निर्णय मैं कह रहा हूँ । गृहस्थ पूर्व एकादशी व्रत को करे और यति के लिए उत्तर एकादशी हो ग्राह्य है क्योंकि गृहस्थ इष्ट सिद्धि चाहते और यति लोग मुक्ति । यदि द्वादशी में पारण हो जाय तो दशमीविद्धा एकादशी भी उपवास के