भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

१६२ नारदीयपुराणम्

कपालध्वजहीनं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् । गुरूणां यज्ञकतूंणां धम्मिष्ठानां तथैव च ॥३८॥ श्रोत्रियाणां द्विजानां तु हृत्वा हेमैवमाचरेत् । कृतानुतापो देहे च संपूर्ण लेपयेद् घृतम् ॥४०॥ करीषच्छादितो दग्धःस्तेयपापाद्विमुच्यते । ब्रह्मस्वं क्षत्रियो हृत्वा पश्चात्तापमवाप्य च ॥४१॥ पुनर्ददाति तत्रैव तद्विधानं शृणुष्व मे । तत्र सांतपनं कृत्वा द्वादशाहोपवासतः ॥४२॥ शुद्धिमाप्नोति देवर्षे ह्यन्यथा पतितो भवेत् । रत्नासनमनुष्यस्त्रीधेनुभूम्यादिकेषु च ॥४३॥ सुवर्णसदृशेष्वे षु प्रायश्चित्तार्द्धमुच्यते । त्रसरेणुसमं हेम हृत्वा कुर्यात्समाहितः ॥४४॥ प्राणायामद्वयं सम्यक् तेन शुद्ध्यति मानवः । प्राणायामत्रयं कुर्याद्धृत्वा निष्कप्रमाणकम् ॥४५॥ प्राणायामांश्च चत्वारो राजसर्षपमात्रके । गौरसर्षपमानं तु हृत्वा हेम विचक्षणः ॥४६॥ स्नात्वा च विधिवज्जप्याद्गायत्र्यष्टसहस्रकम् । यवमात्रसुवर्णस्य स्तेयाच्छुद्धो भवेद्द्विजः ॥४७॥ आसायं प्रातरारभ्य जप्त्वा वै वेदमातरम् । हेमकृष्णलमात्रं तु हृत्वा सांतपनं चरेत् ॥४८॥ माषप्रमाणे हेम्नस्तु प्रायश्चित्तं निगद्यते । गोमूत्रपक्वयवभुग्वर्षेणैकेन शुद्ध्यति ॥४६॥ संपूर्णस्य सुवर्णस्य स्तेयं कृत्वा मुनीश्वर । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥५०॥ सुवर्णमानान्न्यूने तु रजतस्तेयकर्मणि । कुर्यात्सांतपनं सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥५१॥ दशनिष्कांतपर्यन्तमूर्ध्वं निष्कचतुष्टयात् । हृत्वा च रजतं विद्वान्कुर्याच्चांद्रायणं मुने ॥५२॥ दशादिशतनिष्कांतं यः स्तेयी रजतस्य तु । चांद्रायणद्वयं तस्य प्रोक्तं पापविशोधकम् ॥५३॥ शतादूर्ध्वं सहस्रांतं प्रोक्तं चांद्रायणत्रयम् । सहस्रादधिकस्तेये ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥५४॥

ब्राह्मण का धन चुरा लेने पर बारह वर्ष तक पूर्व की भांति ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करना चाहिए, केवल कपाल ध्वज नहीं धारण करना चाहिए ॥३७-३८॥ गुरु, यज्ञकर्त्ता, धर्मिष्ठ, श्रोत्रिय और द्विजों का सुवर्ण चुराने से इस प्रकार प्रायश्चित्त किया जाता है कि पहले अपने पाप पर पश्चात्ताप करे और अपने शरीर पर घी का लेप कर करसी की आग में जल कर मर जाय। इस प्रकार वह चोरी के पाप से छूट जाता है। क्षत्रिय यदि ब्राह्मण के धन को चुरा कर पुनः पश्चात्ताप करे और उसी ब्राह्मण को लौटा दे तब उसको जो प्रायश्चित्त करना पड़ता है उसको मुझसे सुनो ॥३९-४१॥ इस दशा में बारह दिन तक उपवासकर सान्तपन करे तभी वह शुद्ध हो सकता है देवर्षि ! अन्यथा वह पतित कहा जाता है । रत्नासन, मनुष्य, स्त्री, धेनु, और भूमि आदि का चुराना सुवर्णस्तेय के समान ही माना जाता है, परन्तु इसके लिए सुवर्णस्तेय का आधा प्रायश्चित्त कहा गया है। त्रसरेणु के बराबर सोना चुरा लेने पर एकाग्र हो दो प्राणायाम करे तभी वह मनुष्य भली भाँति शुद्ध होता है । निष्क परिमित सोना चुराने पर तीन प्राणायाम करे । राजसर्षप मात्र सोना चुराने पर चार प्राणायाम करे । विज्ञ व्यक्ति गौर सर्षप परिमित सोना चुरा लेने पर विधिवूर्वक स्नान कर आठ हजार गायत्री का जप करे ॥४२-४६॥ यव मात्र सोना चुराने पर द्विज प्रातः काल से लेकर सायङ्काल वेदमाता गायत्री का जप करने पर शुद्ध होता है । कृष्णल (गुंजा) मात्र सोना चुराने पर सान्तपन व्रत करे । माष प्रमाण सुवर्ण की चोरी करने पर प्रायश्चित्त कहा गया है कि वह व्यक्ति एक वर्ष तक गोमूत्र में यव पकाकर खाय तभी वह शुद्ध होता है ॥४७-४६॥ मुनीश्वर ! सम्पूर्ण सुवर्ण के चुराने पर सावधान हो बारह वर्ष तक ब्रह्महत्या व्रत करे । सुवर्णमान से कम चाँदी के चुराने पर विधिवत् सान्तपन व्रत करे अन्यथा वह पतित हो जाता है। मुने ! चार निष्क (१६ माशे का परिमाण) से दश निष्क तक चाँदी की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करे । दश निष्क से लेकर सौ निष्क तक की चाँदी जो चुराता है उसके पापों का संशोधन दो चान्द्रायण व्रत करने से ही होता है ॥५०-५२॥ सौ निष्क से अधिक हजार निष्क तक चुराने पर तीन बार चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। हजार निष्क से अधिक चुराने पर ब्रह्महत्या व्रत करना पड़ता है । कोईम्,