भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 1008 में से

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त्रिशोऽध्यायः १६१ वृद्धातुरस्त्रीबालानामर्दमुक्तं मनीषिभिः । गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ॥२३॥ चातुर्वर्ण्यैरपेया स्यात्तथा स्त्रीभिश्च नारद । क्षीरं घृतं वा गोमूत्रमेतेष्वन्यतमं मुने ॥२४॥ स्नात्वाऽऽर्द्रवासा नियतो नारायणमनुस्मरन् । पक्वायसनिभं कृत्वा पिवेच्चैवोदकं ततः ॥२५॥ तत्तु लोहेन पात्रेण ह्यायसेनायवा पिवेत् । ताम्रेण वाथ पात्रेण तत्पीत्वा मरणं व्रजेत् ॥२६॥ सुरापी शुद्धिमाप्नोति नान्या शुद्धिर्विधीयते । अज्ञानादात्मबुद्ध्या तु सुरां पीत्वा द्विजश्चरेत् ॥२७॥ ब्रह्महत्याव्रतं सम्यक्तच्चिह्नपरिवर्जितः । यदि रोगा निवृत्त्यर्थमौषधार्थं सुरा पिवेत् ॥२८॥ तस्योपनयनं भूयस्तथा चान्द्रायणद्वयम् । सुरासंसृष्टपात्रं तु सुराभांडोदकं तथा ॥२९॥ सुरापानसमं प्राहुस्तथा चन्द्रस्य भक्षणम् । तालं च पानसं चैव द्राक्षं खार्जूरसंभवम् ॥३०॥ माधुकं शैलमारिष्टं मैरेयं नालिकेरजम् । गौडो माध्वी सुरा मद्यमेवमेकादश स्मृताः ॥३१॥ एतेष्वन्यतमं विप्रो न पिवेदं कदाचन । एतेष्वन्यतमं यस्तु पिवेदज्ञानतो द्विजः ॥३२॥ तस्योपनयनं भूयस्तप्तकृच्छ्रं चरेत्तथा । समक्षं वा परोक्षं वा बलाच्चौर्येण वा तथा ॥३३॥ परस्वानामापुादानं स्तेयमित्युच्यते बुधैः । सुवर्णस्य प्रमाणं तु मन्वाद्यैः परिभाषितम् ॥३४॥ वक्ष्ये शृणुष्व विप्रेंद्र प्रायश्चित्तौकसाधनम् । गवाक्षान्तमार्तण्डरश्मिमण्डो प्रदृश्यते ॥३५॥ त्रसरेणुप्रमाणं तु रज इत्युच्यते बुधैः । त्रसरेण्वष्टकं निष्कस्तत्त्रयं राजसर्षपः ॥३६॥ गौरसर्षपस्तत्त्रयं स्यात्तत्षट्कं यव उच्यते । यवत्रयं कृष्णलः स्यान्माषस्तत्पंचकं स्मृतः ॥३७॥ माषषोडशमानं स्यात्सुवर्णमिति नारद । हृत्वा ब्रह्मस्वमज्ञानाद्द्वादशाब्दं तु पूर्ववत् ॥३८॥ गौडी, पैष्टी माध्वी ये तीन प्रकार की मदिरायें मानी गई हैं। नारद ! ये सब प्रकार की मदिरायें चारो वर्गों और स्त्रियों के लिए अपेय हैं । मुने ! मदिरा पान करने पर दूध, घी या गोमूत्र इनमें से किसी को जलते हुए लोहे के समान गरम कर, स्नान करने के बाद भीगी धोती पहने हो एकाग्र भाव से हरि का स्मरण करता हुआ पी जावे ऊपर से पानी भी पी ले । उस जलते हुए पदार्थ को लोहे के पात्र या ताँवे के पात्र से पीकर प्राण छोड़ दे ॥२३-२६॥ सुरा पान करने वाला इसी प्रकार शुद्ध होता है और दूसरा शुद्धि का उपाय इसके लिए उपयुक्त नहीं । कोई द्विज यदि अज्ञान वश मदिरा पी ले तो पैरों में बेड़ियाँ लगाकर ब्रह्महत्या के समान प्रायश्चित करे, केवल उसके चिह्न (कपाल आदि) न धारण करे । यदि रोग से छूटने के लिए या ओषधि के रूप में मदिरा पान करना पड़े तो पुनः उसका यज्ञोपवीत हो और दो चान्द्रायण व्रत करे । सुरा से छुये गए पात्र, मदिरा पात्र का जल या आर्द्र भक्षण ये भी सुरा पान के समान ही माने जाते हैं ॥२७-२९३॥ ताल, पानस (कटहल की बनी मदिरा) द्राक्षा, खजूर, मधु और पत्थर से बनी मदिरा, आरिष्ट, मैरेय, नारिकेल से बनी गुड़, मधु से बना हुआ मद्य, ये ग्यारह प्रकार की मदिरायें होती हैं । ब्राह्मण इनमें से किसी प्रकार की मदिरा न पीये ॥३०-३१३॥ कोई द्विज यदि इनमें से किसी को अज्ञान वश पी ले तो पुनः उसका यज्ञोपवीत हो और वह तप्त कृच्छ्र व्रत करे ॥३२३॥ पंडितों ने दूसरे के धन को प्रत्यक्ष या गुप्त रूप से, बलात् या चोरी से ले लेने को ही 'स्तेय' कहा है। मनु आदि स्मृतिकारों ने सुवर्ण के प्रमाण की परिभाषा बताई है । विप्रेन्द्र ! उसी के अनुसार मैं प्रायश्चित्त कह रहा हूँ, सुनो । खिड़की से होकर आने वाली सूर्य की किरणों के बीच जो त्रसरेणु प्रमाण का धूलि कण दिखाई देता है उसको पंडितों ने रज कहा है। आठ त्रसरेणु के बराबर निष्क और तीन निष्क का राजसर्षप होता है ॥३३-३६॥ तीन राजसर्षप का एक गौर सर्षप और छः गौर सर्षप का एक यव होता है । तीन यव का एक कृष्णल और पाँच कृष्णल का एक माष होता है । नारद ! सोलह माष के बराबर सुवर्ण होता है । अज्ञानवश

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