भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

१८० नारदीयपुराणम् तदभावे मुनिश्रेष्ठ कपालं चान्यमेव वा । तद्द्रव्यं ध्वजदण्डे तु धृत्वा वनचरो भवेत् ॥८॥ वन्याहारो वसेत्तत्र वाग्यतो नियताशनः । सन्धवत्स्यामुपासीत त्रिकालं स्नानमाचरेत् ॥६॥ अध्ययनाध्यापनादीन्वजयेत्सस्मरेद्धरिम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं गंधमाल्यादि वर्जयेत् ॥१०॥ तीर्थान्यनुवसेच्चैव पुण्यांश्चत्वाश्रमांस्तथा । यदि वन्येनं जीवेन ग्रामे भिक्षां समाचरेत् ॥११॥ द्वादशाब्दं व्रतं कुर्यादेवं हरिपरायणः । ब्रह्महा शुद्धिमाप्नोति कर्मार्हश्चैव जायते ॥१२॥ व्रतमध्य मृगैर्र्वापि रोगैर्वापि विपद्यितः । गोनिमित्तं द्विजार्थं वा प्राणान्वापि परित्यजेत् ॥१३॥ यद्वा दद्याद्विजेन्द्राणां गवामयुतमुत्तमम् । एतेष्वन्यतमं कृत्वा ब्रह्महा शुद्धिमाप्नुयात् ॥१४॥ दीक्षितं क्षत्रियं हत्वा चरेद्धि ब्रह्महव्रतम् । अग्निप्रवेशने वापि मरुत्प्रपतनं तथा ॥१५॥ दीक्षितं ब्राह्मणं हत्वा द्विगुणं व्रतमाचरेत् । आचार्यादिवधे चैव व्रतमुक्तं चतुर्गुणम् ॥१६॥ हत्वा तु विप्रमात्रं च चरेत्संवत्सरं व्रतम् । एवं विप्रस्य गदितः प्रायश्चित्तविधिद्विज ॥१७॥ द्विगुणं क्षत्रियस्योक्तं त्रिगुणं तु विशः स्मृतम् । ब्राह्मणं हन्ति यः शूद्रस्तं मुशल्यं विदुर्बुधाः ॥१८॥ राज्ञैव शिक्षा कर्तव्या इति शास्त्रेषु निश्चयः । ब्राह्मणीनां वधे त्वद्धं पादः स्यात्कन्यकावधे ॥१९॥ हत्वा त्वनुपनीतांश्च तथा पादव्रतं चरेत् । हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः षडब्दं कृच्छ्रमाचरेत् ॥२०॥ संवत्सरत्रयं वैश्यं शूद्रं हत्वा तु वत्सरम् । दीक्षितस्य स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणीं चाष्टवत्सरान् ॥२१॥ ब्रह्महत्याव्रतं कृत्वा शुद्धो भवति निश्चितम् । प्रायश्चित्तविधानं तु सर्वत्र मुनिसत्तम ॥२२॥ कपाल अथवा अन्य वस्तु को ध्वज दण्ड में बांधकर रख ओर वनवासी हो जाय। और दिन में एक बार थोड़ा सा वन्य-फल मूलों का ही आहार करता हुआ वनवासी जीवन वितावे ॥७-८॥ त्रिकाल स्नान और सन्ध्योपासना करे, अध्ययन, अध्यापन आदि से मुख मोड़कर केवल हरि स्मरण में ही लगा रहे। नित्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे और सुगन्धित पदार्थ या माला का सर्वथा त्याग कर दे। सर्वदा पवित्र तीर्थों और आश्रमों में रहे। यदि वन्य फलों से जीना असम्भव हो तो गांव में भिक्षा मांगकर जीवन वितावे ॥६-११॥ इस प्रकार हरिपरणय होकर बारह वर्ष तक व्रत पालन करने से ब्रह्मघाती शुद्ध ओर कर्मों का अधिकारी हो जाता है। व्रत पालन-काल में यदि किसी वन्य पशु के द्वारा या रोग से मृत्यु हो जाय, गौ अथवा ब्राह्मण-रक्षार्थ प्राण त्याग कर दे अथवा ब्राह्मणों को दश हजार उत्तम गायों का दान कर दे तो वह ब्रह्मघाती शुद्ध हो जाता है। यज्ञदीक्षित क्षत्रिय की हत्या करने पर ब्रह्महत्या के समान ही प्रायश्चित करना चाहिए ॥१२-१४३॥ अग्नि में प्रवेश कर (जलकर) व पहाड़ से गिरकर अथवा प्राणवायु को रोककर प्राणत्याग करना इसके लिए उत्तम प्रायश्चित्त है। दीक्षित ब्राह्म की हत्या करने से दुगुना प्रायश्चित करना चाहिए और आचार्य आदि के वध करने पर चौगुना। द्विज ! विप्र की हत्या करने पर उक्त संवत्सर व्रत करना चाहिए। विप्र के लिए इस प्रकार का प्रायश्चित विहित है। क्षत्रिय लिए दूना, वैश्य के लिए तिगुने प्रायश्चित का विधान है। जो शूद्र ब्राह्मण का वध करता है उसको पंडितों मुशल्य (मुशल से मारकर चूर्ण करने योग्य) माना है ॥१५-१८॥ राजा ही दण्ड (शिक्षा) का निर्णय करे ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। ब्राह्मणीवध में आधा प्रायश्चित (छह वर्ष तक) और कन्यावध में चौथाई (तीन वर्ष तक) प्रायश्चित्त करना चाहिए। अविवाहित की हत्या कर देने पर चौथाई प्रायश्चित्त का ही विधान है ॥१९॥ ब्राह्मण यदि क्षत्रिय की हत्या कर दे तो उसको छह वर्ष तक कृच्छ्र चान्द्रायण करना चाहिए। वैश्य का वध कर तीन वर्ष और शूद्र की हत्या करने पर एक वर्ष का प्रायश्चित्त करना शास्त्रों में विहित है। यज्ञदीक्षित व्यक्ति की ब्राह्मणी पत्नी की हत्या करने पर आठ वर्ष तक ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करने से ही मनुष्य शुद्ध होता है। मुनिसत्तम सर्वत्र मुनियों ने बूढ़ा रोगी और स्त्री के लिए आधा ही प्रायश्चित्त कहा है ॥२०-२२॥