बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः १८६ एवं तिथिं विनिश्चित्य स्मृतिमार्गेण पण्डितः । यः करोति व्रतादीनि तस्य स्यादक्षयं फलम् ॥६१॥ वेदप्रणिहितो धर्मो धर्मे स्तुष्यति केशवः । तस्माद्धर्मपरा यांति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६२॥ धर्मान्ये कर्त्तुमिच्छंति ते वै कृष्णस्वरूपिणः । तस्मातांस्तु भवव्याधिः कदाचिन्नैव बाधते ॥६३॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे तिथ्यादिनिर्णयो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥२६॥ त्रिंशोऽध्यायः सनक उवाच प्रायश्चित्तविधिं वक्ष्ये शृणु नारद सांप्रतम् । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥१॥ प्रायश्चित्तविहीनैस्तु यत्कर्म क्रियते मुने । तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं राक्षसैः परिसेवितम् ॥२॥ कामक्रोधविहीनैश्र्च धर्मशास्त्रविशारदैः । प्रष्टव्या ब्राह्मणा धर्मं सर्वधर्मफलेच्छुभिः ॥३॥ प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराङ्मुखैः । न निष्पुनंति विप्रेन्द्र सुराभांडमिवापगाः ॥४॥ ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी च गुरुतल्पगः । महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पंचमः ॥५॥ यस्तु संवत्सरं ह्येतैः शयनासनभोजनैः । संवसेत्सह तं विद्यात्पतितं सर्वकर्मसु ॥६॥ अज्ञानाद्ब्राह्मणं हत्वा चीरवासाजटी भवेत् । स्वेनैव हतविप्रस्य कपालमपि धारयेत् ॥७॥ आसत्येनो द्वयम्' इस मन्त्र से हवन करना चाहिए। यही सूर्य के तीन मंत्र बतलाए गए हैं ॥५७-६०॥ इस प्रकार स्मृति के अनुसार तिथियों का निर्णय कर जो पंडित व्रत आदि करता है, उसको अक्षय फल मिलता है। धर्म वेद- विहित है। केशव धर्म से ही प्रसन्न होते हैं। इसलिए धर्मपरायणजन विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं। जो धर्माचरण करना चाहते हैं वे कृष्णस्वरूप हैं। इसलिए उनको सांसारिक व्याधियों से कुछ भी कभी भी पीड़ा नहीं होती ॥६१-६३॥ श्रीनारदीयमहापुराण में तिथिनिर्णयवर्णन नामक उनतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥ अध्याय ३० प्रायश्चित्त विधि का निरूपण सनक बोले— नारद ! अब प्रायश्चित्त विधि बता रहा हूँ। प्रायश्चित्त के द्वारा विशुद्ध आत्मा वाले सब कर्म फलों को प्राप्त करते हैं। मुने ! प्रायश्चित्त के बिना मनुष्य जो कुछ कर्म करता है सब निष्फल जाता है और उसके सब कर्म राक्षसों से घिरे रहते हैं। काम क्रोध से हीन, धर्मशास्त्रज्ञ और सब धर्मों के फल के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वे ब्राह्मणों से ही धर्म की बातें पूछें ॥१-३॥ विप्रेन्द्र ! जिस प्रकार नदियाँ मदिरापात्र को पवित्र करने में सर्वथा असमर्थ हैं, उसी प्रकार नारायण से विमुख रहने वाले व्यक्तियों को उनके किये हुए प्रायश्चित्त भी। ब्रह्मघातक, मदिरा पान करने वाला, चोर, गुरुपत्नीगामी ये चार महापातकी हैं और इनके संसर्ग में रहने वाला व्यक्ति भी पाँचवां महापापी है ॥४-५॥ जो इन महापातकियों के साथ एक वर्ष तक सोता, बैठता और भोजन करता है उसको सब कर्मों से च्युत समझना चाहिए ॥६॥ अज्ञान से किसी ब्राह्मण की हत्या कर देने पर उस हत्यारे को जटा और वल्कलधारी होना चाहिए। यदि जानबूझ कर उसने ब्राह्मणवध किया हो तब तो उसको कपाल भी धारण करना चाहिए। अन्यथा वह