भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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त्रिंशोऽध्यायः १८३ कांस्यपित्तलमुख्येषु ह्ययस्कांते तथैव च । सहस्रनिष्कमाने तु पराकं परिकीर्तितम् ॥५५॥ प्रायश्चित्तं तु रत्नानां स्तेये रजतवत्स्मृतम् । गुरुतल्पगतानां च प्रायश्चित्तमुदीर्यते ॥५६॥ अज्ञानान्मातरं गत्वा तत्सपत्नीमथापि वा । स्वयमेव स्वमुष्कं तु च्छित्त्वापापमुदीरयन् ॥५७॥ हस्ते गृहीत्वा मुष्कं तु गच्छेद्वै नैर्ऋतीं दिशम् । गच्छन्मार्गे सुखं दुःखं न कदाचिद्विचारयेत् ॥५८॥ अपश्यन्गच्छतो गच्छेत्प्राणान्तं यः स शुद्ध्यति । महत्प्रपतनं वापि कुर्यात्पापमुदाहरन् ॥५९॥ स्ववर्णोत्तमवर्णस्त्रीगमने त्वविचारतः । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥६०॥ अमत्याभ्यासतो गच्छेत्सवणीं चोत्तमां तथा । कारीषाग्निना दग्धः शुद्धिं याति द्विजोत्तम ॥६१॥ रेतःसेकात्पूर्वमेव निवृत्तो यदि मातरि । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्रेतःसेकेऽग्निदाहनम् ॥६२॥ सवर्णोत्तमवर्णासु निवृत्तो वीर्यसेचनात् । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यान्नवब्दान्विष्णुतत्परः ॥६३॥ वैश्यायां पितृपत्न्यां तु षडब्दं व्रतमाचरेत् । गत्वा शूद्रां गुरोर्भार्यां त्रिवर्षं व्रतमाचरेत् ॥६४॥ मातृष्वसारं च पितृष्वसारमाचार्यभार्यां श्वशुरस्य पत्नीम् । ॥६५॥ पितृव्यभार्यामथ मातुलीनीं पुत्रीं च गच्छेदयदि काममुग्धः दिनद्वये ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्यथाविधि । एकस्मिन्नेव दिवसे बहुवारं त्रैवार्षिकम् ॥६६॥ एकं वारं गते ह्यब्दं व्रतं कृत्वा विशुद्ध्यति । दिनत्रये गते वह्निदग्धः शुध्येत नान्यथा ॥६७॥ चांडालीं पुक्कसीं चैव स्नुषां च भगिनीं तथा । मित्रस्त्रियं शिष्यपत्नीं यस्तु वै कामतो व्रजेत् ॥६८॥ ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यात्स षडब्दं मुनीश्वर । अकामतो व्रजेद्यस्तु सोऽब्दकृच्छ्रं समाचरेत् ॥६९॥ महापातकिसंसर्गे प्रायश्चित्तं निगद्यते । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥७०॥ पित्तल और अयस्कान्त आदि की यदि हजार निष्क मात्रा में चोरी की जाय तो उस चोर को पराक व्रत करना चाहिए । रत्नों की चोरी में भी चाँदी की चोरी के समान ही प्रायश्चित्त कहा गया है ॥५३-५६॥ गुरुतल्प गमन का प्रायश्चित्त कह रहा हूँ सुनो । अनजाने माता या माता की सौत से मैथुन करने वाला व्यक्ति स्वयं अपने पापों की घोषणा करते हुए अपने अण्डकोश को काट दे । अविचार अज्ञानवश अपने वर्ण से उत्तम वर्ण वाली स्त्री से संभोग करने पर बारह वर्ष तक सावधानी से ब्रह्म हत्या व्रत करना चाहिए ॥५७-६०॥ द्विजोत्तम । अविवेक और अभ्यास के कारण यदि सवर्णा या उत्तम वर्ण की कन्या से सम्भोग करे तो वह करसी की आग में जल कर ही शुद्ध हो सकता है । मातृयोनि में वीर्य पात करने के पूर्व ही यदि मैथुन त्याग कर दे तब तो वह ब्रह्म हत्या व्रत करे और वीर्य पात करने पर तो अग्नि में भस्म हो जाना ही प्रायश्चित्त है । सवर्ण अथवा उत्तम वर्ण में वीर्य पात करने के पूर्व ही मैथुन से हट जाने पर नव वर्ष तक भगवान् की पूजा में एकनिष्ठ हो ब्रह्महत्या व्रत करे ॥६१-६३॥ पिता की वैश्या पत्नी से व्यभिचार करने पर छह वर्ष तक व्रत पालन करे और गुरु की शूद्र भार्या से भोग करने पर तीन वर्ष तक, मौसी, फुआ, आचार्य-भार्या, श्वशुर की स्त्री, चाचा की स्त्री, मामी और पुत्री से यदि कामविह्वल होकर दो दिन मैथुन कर दे तो यथा विधि ब्रह्महत्या व्रत करे । एक ही दिन कई बार संभोग करने पर तीन वर्ष तक और एक बार करने पर एक वर्ष तक व्रत करे तभी वह शुद्ध हो सकता है । तीन दिन मैथुन करने पर केवल अग्नि में भस्म होने पर ही शुद्धि हो सकती है, अन्यथा नहीं ॥६४-६७॥ मुनीश्वर ! चाण्डाली, पुक्कसी पुत्रवधू, बहिन, मित्रस्त्री, शिष्यपत्नी से जो काम-भावना से भोग करता है वह छह वर्ष तक ब्रह्म-हत्या व्रत करे, जो अकामभाव से ऐसा करे, वह एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करे ॥६८-६९॥ अब महापापी की संगति से जो-जो पाप लगते हैं उनके लिए प्रायश्चित्त कह रहा हूँ । प्रायश्चित्त करने से मनुष्य का आत्मा शुद्ध होता है और वह सब कर्म फलों का अधिकारी होता है । जिसका उपर्युक्त चार प्रकार के २५ नारदीयपुराण